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जवाई लेपर्ड सेंक्चुरी क्षेत्र के वन्यजीवों को भीषण गर्मी से बचा रहे हैं कांजी मेवाड़ा

पानी न मिलने पर कई बार जानवर पानी की खोज में गांव तक चले आते है। इन घटनाओं से एनिमल-ह्यूमन कंफ्लिक्ट का खतरा बढ़ जाता है। इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए एक चायवाले, कानजी मेवाड़ा ने स्थानीय लोगों के सहयोग से जवाई वन क्षेत्र में बड़ा काम किया है।

By Chandrapratap Tiwari
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पश्चिमी राजस्थान के पाली जिले में बड़ा वन क्षेत्र है। इस क्षेत्र की पहचान यहां की जवाई लेपर्ड सैंक्चुअरी (Jawai leopard sanctuary) है, जहां दुनिया भर से पर्यटक आते हैं। आमतौर पर यहां पहाड़ियां, गुफाएं, और अरावली से सटे होने के कारण ठीक ठाक मात्रा में वृक्ष हैं। लेकिन यहां के जानवरों को सबसे अधिक समस्या गर्मी में पानी को लेकर होती है। पानी न मिलने पर कई बार यहां के जानवर पानी की खोज में गांव तक चले आते है। इन घटनाओं से एनिमल-ह्यूमन कंफ्लिक्ट का खतरा बढ़ जाता है। इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए एक चायवाले, कानजी मेवाड़ा ने स्थानीय लोगों के सहयोग से जवाई वन क्षेत्र में बड़ा काम किया है। ग्राउंड रिपोर्ट ने कानजी से इस विषय में बात की और जाना उनके काम और उसके प्रभाव के बारे में। 

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जानवरों के लिए बनाते हैं वाटरहोल 

कानजी (Kanji Mewada) ने बताया की उन्होंने जंगल के लगभग 45 किलोमीटर के दायरे में 7-8 वाटरहोल बनाए हैं। ये आमतौर पर 3 से 4 फीट गहरे होते हैं। कानजी ने अपनी सहूलियत के हिसाब से कच्चे और पक्के वाटरहोल बनवाए हैं, जो गर्मी और बारिश दोनों में मददगार सिद्ध होते हैं। 

इन वाटरहोल के निर्माण में बड़ा खर्च आता है। कानजी ने बताया कि पक्के वाटरहोल के निर्माण में 50 हजार और कच्चे वाटरहोल के लिए लगभग 20 हजार का खर्च आता है। कानजी के अनुसार मुंबई के पर्यावरण कार्यकर्ता दिलीप जैन की संस्था DJED फाउंडेशन इन वाटरहोल के निर्माण में सहयोग करती है। लेकिन इस के बाद की जिम्मेदारी कानजी और पूरा ग्राम समुदाय लेता है। 

जंगल के जानवरों की प्यास बुझाने के लिए पूरी गर्मी चलता है यह कार्यक्रम 

कानजी अप्रैल से लेकर जुलाई तक अपना यह कार्यक्रम चलाते हैं। उन्होंने वन क्षेत्र के 15-20 गांवों में लोगों से संपर्क स्थापित किया है। उनके पास जैसे ही किसी ने खबर पहुंचाई कि, अमुक स्थान पर पानी नहीं उपलब्ध है, तो कानजी तुरंत इसे संज्ञान में लेते हैं। उस स्थान पर वाटरहोल बनवा कर टैंकर से पानी भरते हैं। कानजी ने बताया कि आमतौर पर गांव का ही कोई सदस्य अपनी ओर से टैंकर का खर्च वहन करता है। ऐसे परिवार/व्यक्ति को कानजी की टीम भामाशाह की उपाधि से सम्मानित करते हुए उन्हें प्रोत्साहित करती है। 

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कानजी हर 10-15 दिन में सभी वाटरहोल का निरीक्षण करते हैं। कानजी कुछ दिनों के अंतराल में पानी साफ करवाते, उन्हें लगातार भरवाकर रखते हैं। इसके अलावा कानजी जानवर विशेष की सहूलियत का भी ख्याल रखते हैं। इसकी मिसाल के तौर पर कानजी ने बताया कि गिलहरियों को पानी पीने में समस्या हुआ करती थी, जिसके लिए उन्होंने वाटरहोल की ढाल में विशेष लकड़ी की युक्ति लगाई है जिससे वह आसानी से पानी पी सकती है। 

इसके अलावा कानजी वाटरहोल के करीब की जमीन को सींच कर गीला कर देते हैं, ताकि जानवर ठंडक में बैठ सकें। जवाई क्षेत्र में तेंदुए और अन्य कई ऐसे जानवर हैं जो रात में पानी पीने निकलते हैं, कानजी के इस प्रयास से उन्हें जंगल की जमीन शीतल मिलती है।  

गांव के लोग जंगल और जानवरों को लेकर सजग हैं 

कानजी ने बताया कि उनके इलाके में यह आम प्रचलन है। जानवरों को गर्मी में प्यास से बचाने के अपने अनुभवों को लेकर कानजी ने कहा कि,

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मुझे गांव में किसी तरह की परेशानी नहीं आई। किसी ने वाटरहोल बनाने को लेकर जमीन का विवाद नहीं किया। यहां पर कई ऐसे लोग हैं जो अपने खेत सींचते वक्त पानी गड्ढे में भर देते हैं, और जानवरों के लिए जमीन सींचकर ठंडी कर देते हैं। इन्हे  इसकी परवाह होती कि कोई उनका काम देख रहा है या नहीं।

इस बार की भयानक गर्मी और हीटवेव (Heatwave) की स्थितयों को लेकर कानजी ने कहा कि,

हालांकि हमने अप्रैल से पहले ही अपनी तैयारियां शुरू ली थीं, लेकिन इस बार की गर्मी काफी भीषण और अप्रत्याशित थी। लेकिन हमें खुशी है कि हमारे इलाके से किसी भी जानवर की हीटवेव से मृत्यु कि खबर सामने नहीं आई है। इसका पूरा श्रेय गांव के लोगों और दिलीप जैन जी के प्रयासों को जाता है। मैं आम तौर पर अपनी दुकान के सामने एक पानी की बाल्टी रखता हूं जिससे आवारा जानवर पानी पी सकें। अगर यह बाल्टी मैं कभी भरना भूल भी जाऊं तो कोई न कोई व्यक्ति उसे खुद से भर देता है। शायद गांव वालों के इसी निश्चय की वजह से ही हमारा यह काम सफल रहा है।  

कानजी का प्रयास कई ग्राम समुदायों के लिए एक मिसाल हो सकता है कि कैसे बिना किसी सरकारी सहयोग के एक गांव ने अपने जानवरों को भीषण गर्मी और हीटवेव से बचाया है। कानजी के गांव के पास (Wildlife) तेंदुए, हिरण, भालू, और कई दुर्लभ पक्षी विचरण करते हुए एक अनूठी जैव-विविधता की झलक देते हैं। और कानजी और उनके गांव वालों का प्रयास बताता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का एहसास काफी है।  

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