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मध्यप्रदेश में सरकार को गेंहूं बेचने से क्यों कतरा रहा है किसान?

हिंदी | मध्यप्रदेश में सरकारी गेंहूं की खरीद उसके लक्ष्य से काफी कम रही है। जहां मध्यप्रदेश का लक्ष्य 80 लाख टन गेंहूं की खरीद का था वो 18 मई तक 47.2 लाख टन तक ही पहंच पाई है।

By Chandrapratap Tiwari
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Source: X(@airnewsalerts)

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मध्यप्रदेश की कुल सरकारी गेंहूं की खरीद उसके लक्ष्य से काफी कम रही है। मध्यप्रदेश का लक्ष्य 80 लाख टन गेंहूं की खरीद का था लेकिन सरकार 18 मई तक केवल 47.2 लाख टन की ही खरीदी कर पाई है। इतनी सीमित खरीद प्रदेश सरकार द्वारा एमएसपी के ऊपर 125 रुपये बोनस राशि बढ़ाये जाने के बाद हुई है। आइये समझने का प्रयास करते हैं कि क्यों प्रदेश के किसान सरकारी मंडियों से परहेज कर रहे हैं, और इस सीमित खरीद के क्या परिणाम हो सकते हैं? 

प्राइवेट में मिल रहा है सरकारी जितना दाम 

मध्यप्रदेश के एक बड़े इलाके में इस बार गेंहूं की फसल को ओलावृष्टि की मार झेलनी पड़ी थी। नतीजतन गेंहूं की उपज सीमित हुई और गुणवत्ता भी प्रभावित हुई। इसी सिलसिले हमने छतरपुर के नाद गांव के किसान आशाराम से बात की, आशाराम ने बताया की उन्होंने इस बार अपनी उपज निजी व्यपारियों को बेची है। वहां उन्हें 2300 रुपये प्रति क्विंटल दाम मिला, जो की सरकारी दाम से मात्र 100 रुपए ही कम था। आशाराम ने कहा की उन्हें मंडी में बेंचने के लिए गेंहू के ले जाने का खर्च आता, मंडी में लंबी प्रक्रिया के चलते 2-3 दिन खपाने पड़ते। इसलिए मंडी की अपेक्षा उन्होंने घर से ही व्यपारियों को गेंहूं बेचना उचित समझा। 

हमारी बात टीकमगढ़ के महाराजपुर गांव के कृषक संदीप से हुई। संदीप ने बताया की उनकी उपज सीमित ही थी, उन्होंने अपने गेंहूं निजी व्यापारियों को ही लगभग 2300-2400 में बेंचे हैं। संदीप ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्षों में भी निजी व्यापारियों को ही गेंहूं बेंचा था। संदीप का कहना है उनके पास अपना वाहन न होने के कारण उपज को मंडी ले जाना नफे का सौदा नहीं रह जाता है। 

वेयरहाउस न होना एक बड़ी वजह 

हमारी बात भोपाल के खजूरी गांव के किसान गजराज से हुई। गजराज ने अपनी उपज सरकारी मंडी में बेची। इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें काफी समस्या आई। गजराज ने बताया कि तकनीकी व्यवस्थाएं, जैसे कि KCC अपडेशन इत्यादि में ही लंबा समय लग गया। उन्हें 2-3 दिन अपनी उपज बेंचने में लग गए। इसके अलावा बिक्री के लगभग एक महीने बाद गजराज के खाते में बिक्री की रकम आई। वहीं जो निजी व्यापारियों को बेंचते है उन्हें बिना किसी फ़जीहत के हाथों हाथ रकम मिल जाती है।

गजराज ने बताया की उन्हें पिछले वर्षों में इस प्रकार की दिक्क़तें नहीं आई थीं। बकौल गजराज पहले उनके क्षेत्र में कई वेयरहाउस थे, जो अब बंद कर दिए गए हैं। इसी वजह से मंडी में बिक्री की पूरी प्रक्रिया लचर और मुश्किल हो गई है। गजराज ने बताया की उनका गेंहूं अच्छी गुणवत्ता का था, और कई किसानों को निजी व्यापारियों से ही लगभग सरकारी जितने दाम मिल गए हैं। 

प्राइवेट संस्थाओं का बढ़ता प्रभाव 

इस बार मध्यप्रदेश के किसानों ने बड़े पैमाने पर सरकारी मंडियों में उपज न बेंचने का फैसला किया है। इसका कारण उन्होंने आसपास के वेयरहाउस बंद होने के कारण आने वाली असुविधा को बताया। इसी सिलसिले में हमने टीकमगढ़ में रामा कृष्णा वेयरहाउस के मालिक से बात की। उन्होंने सरकारी नीतियों को गैर-जिम्मेदाराना बताया। 

"सरकार वेयरहॉउस से अनाज पहले निकालती है, जबकि खुले खेतों में अनाज पड़ा रहता है, और खराब होता है। इसके कारण उनके वेयरहाउस पहले खाली हो जाते हैं। जिससे किराया मिलने की गुंजाईश खत्म हो जाती है। वहीं दूसरी तरफ बाहर पड़े-पड़े अनाज भी खराब होता रहता है।"

उन्होंने बताया कि सरकार ने सभी वेयरहाउस की कमान प्राइवेट संस्थाओं को सौंप दी है, जो अपनी मनमानियां करती हैं। इसके अलावा सरकार वेयरहाउस से कभी भी माल निकाल सकती है। इससे वेयरहाउस मालिकों की वित्तीय सुरक्षा प्रभावित होती है। सरकार को कम से कम 6 महीने तक वेयरहाउस में माल रखने की गारंटी देना चाहिए ताकि उन्हें उसका किराया मिल सके और उनका व्यवसाय निर्बाध रूप से चल सके। 

इसके अलावा 2024-25 में सरकार ने वेयरहाउस के लिए नई जॉइंट वेंचर स्कीम लाई थी। जिसका निजी वेयरहाउस संचालकों ने विरोध किया। इसका सीधा असर सरकारी भण्डारण में देखने को मिल रहा है। 

सरकारी खरीद घटने के क्या हो सकते हैं परिणाम 

इस वर्ष सरकार का कुल गेंहूं की खरीद का अनुमान 300 से 320 लाख मीट्रिक टन था। लेकिन 11 जून, 2024 तक लगभग भारतीय खाद्य निगम (FCI) मात्र 266 एलएमटी गेहूं की खरीद कर सका है, जो कि अपने लक्ष्य से काफी पीछे है। सरकारी खरीद में इस बड़ी कमी के चलते जन वितरण प्रणाली (PDS) और वेलफेयर स्कीम पर बुरा असर पड़ सकता है। साथ ही इन पर निर्भर देश की आबादी के बड़े हिस्से को मुश्किलें आ सकतीं हैं।   

देश के सरकारी भंडार में अनाज होना कई मायने में जरूरी है। जब देश में अनाज की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसी भंडार से अनाज बाजार में उतारकर सरकार आपूर्ति बढ़ाती है, जिससे मंहगाई को काबू करने में  मदद मिल पाती है। जब सरकारी भण्डार में अनाज कम होगा तो देश को यही अनाज या तो व्यापारियों से, या तो विदेश से मंगाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति के निर्मित होने पर सरकार के लिए मंहगाई को काबू करना मुश्किल हो जाता है। 

इसके अलावा देश में आपातकालीन स्थितियां जैसे कि किसी आपदा की स्थिति आ जाने पर यह भण्डार एक बैकअप का काम करता है। आपदा की स्थिति में सीमित अनाज भण्डार होना देश को दोहरे खतरे में डाल सकता है। 

एक सरकारी आंकड़े के अनुसार देश की 11.28 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। सरकार जन वितरण प्रणाली के तहत 81.35 करोड़ लोगों को अन्न प्रदान करती है। सरकारी अनाज भण्डार अगर खाली रहे तो इस बड़ी आबादी पर खाद्य संकट आ सकता है और देश की अर्थव्यवस्था भी डगमगा सकती है। 

आशाराम, संदीप, और गजराज तीनों का मानना है की सरकारी मूल्य कम है। वे जितनी लागत और मेहनत कृषि में लगाते हैं, सरकारी दाम उससे मेल नहीं खाते हैं। तीनों का कहना था की गेहूं का प्रति क्विंटल दाम कम से कम 2800-3000 रूपये होना चाहिए।

इनकी समस्या का बड़ा कारण वेयर हाउस का न होना और खरीद लंबी प्रक्रिया है। सतही तौर पर देखने में लगता है की सरकारी मण्डियां और एमएसपी किसानों को एक नया विकल्प देते हैं, जबकि करीब से देखने पर किसानों के पास कोई विल्कप नहीं है, उन्हें प्रति क्विंटल लगभग एक ही दाम मिल रहे हैं। 

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