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स्वतंत्रता दिवस पर पढ़िये कार्तिक समाधिया की कहानी “बिस्मिल”

बिस्मिल : आजादी का रास्ता किन पगडंडियों से होकर गुजरता है? ये सवाल सागर के मन में बचपन की आपूरित जिज्ञासाओं में से एक रहा है। 5 km का सफर काटने में जितना वक़्त लगता है, आज उतना नहीं लगा। शायद कदमों की तेज चालों ने समय को अपने सामने चित कर दिया हो। शाम होने को आई थी। ऑफिस से घर लौटते में एक बच्चा अचानक सामने आ गया। बच्चे ने कागज के झंडे को सागर की ओर बढ़ाते हुए 2 रुपये की मांग की। सागर ने जेब टटोली तो उसके पास 500 के 2 नोट थे। एक बार तो मन हुआ कि पूरे रुपये उस झंडे वाले बच्चे को दे दिए जाएं। लेकिन महीने भर के खर्चों के आखिरी ये 2 नोट उसे अगले 15 दिन चलाना था।

लेकिन बढ़ती महंगाई में कमोवेश ये नामुमकिन सा जान पड़ता है। आखिर में तय हुआ कि झंडे वाले बच्चे को पहले खाना खिलाया जाए। उससे पहले बच्चे को अपने फ्लैट पर ले जाते वक्त सागर ने एक कपड़े की दुकान से टीशर्ट-पेंट और जूते खरीद लिए। यह सब आसान हुआ उस दो 500 के नोट से… क्योंकि सागर को अचानक ध्यान आ गया था कि 3 साल से जोड़ी जा रही गुलक को अब तोड़ने का वक़्त आ गया है। सागर बच्चे को लेकर फ्लैट पर पहुंचता है। उसे नहाने के लिए साफ तौलिया और साबुन देता है। अभी तक बच्चे की उम्र नहीं बताई। 10 साल का था। नाम बिस्मिल था। यह नाम उसके पिता ने रखा था।

बच्चे के मुंह से निकली हर बात सागर के दिल की गहराई में गहरे उतर रही थी। आजादी के 50 साल बाद भी एक बच्चा अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए तरस रहा था। ऐसी जरूरते जो अर्धपूँजीवादी समाज में उसका ड्रीम हो चुका था। कपड़े पहनने से लेकर अच्छा खाना उसका सपना था। बिस्मिल नहाकर वापस लौटता है। नए कपड़े पहनता है। सागर उससे जरूरी सवाल करता है- झंडा बेचने के अलावा क्या करते हो?
“कप प्लेट धोता हूँ साहब!”, बिस्मिल दाँत किटकिटाते हुए बोलता है।

साहब नहीं, सागर नाम है मेरा। सागर ने बच्चे को बताया।

बच्चा: क्या मैं आपको सागर भैया बुला सकता हूँ?
सागर: क्यों नहीं।

पढ़ाई करते हो, सागर बिस्मिल से पूछता है। बिस्मिल का जवाब नहीं में होता है।

पढ़ाई करना चाहते हो? सागर दोबारा शिक्षा के सवाल को थोड़ा मोड़कर पूछता है।

बिस्मिल पूछता है, कौन कराएगा?

सागर कहता है, चल अभी पहले खाना खाकर लौटते हैं।

रात 11 बजे सागर और बिस्मिल साथ घर वापस आते हैं। सागर वर्णमाला की किताब सागर को पकड़ाता है। और कहता है- ज से जिम्मेदारी हो तुम मेरी।

बिस्मिल की कहानी की शुरुआत बहुत पहले दिल्ली में हुए सिख दंगे के दौरान की है। पिता कुलविंदर कौर दिल्ली से भागकर भोपाल आ गए थे। माता- पिता- भाई दंगे में मारे गए थे। परिवार पूरा तबाह हो गया था। भोपाल में आकर 24 साल के कुलविंदर ने साड़ी की किराए से दुकान खोल ली थी। यहीं उसकी मुलाकात तेजस्विनी मल्होत्रा नाम की लड़की से हुई। लड़की ने एक बच्चे को जन्म दिया। नाम रखा बिस्मिल।

एक दिन कुलविंदर और तेजस्विनी की सड़क हादसे में मौत हो जाती है। हादसा 5 साल के बच्चे बिस्मिल को लेकर पचमढ़ी से लौटते वक्त हुआ था। बस खाई में समा गई थी। हालांकि बिस्मिल बच गया था, 28 लोग मर गए थे। भोपाल के जिला अस्पताल में घायलों के साथ ही नवजात बिस्मिल को रखा गया था। बच्चे को बाल संरक्षण आयोग लेने नहीं आया। अस्पताल की लापरवाही ने बिस्मिल को बे-सहारा छोड़ दिया।

अस्पताल के पास सड़क पर भीख मांगते बच्चों में बिस्मिल शामिल हो गया। बिस्मिल और उसके साथी बच्चों ने अपनी गैंग का नाम आजाद हिंद फोर्स रख लिया था। क्योंकि इस गैंग के सबसे दमदार बच्चे का नाम सुभाष था। ये सभी रोज सड़कों पर अखबार और पेन बेचते थे।

15 अगस्त और 26 जनवरी को भारत के तिरंगे लिए सड़कों पर फिरते। आज 75वीं आजादी का दिन था। सागर भी इंदौर में किसी आजाद हिंद फोर्स का हिस्सा हुआ करता था, तब वह भी सड़को की धूल फांका करता था। कुलविंदर और तेजस्विनी की तरह ही सागर के माँ-बाप थे। सागर भी इसी हादसे का शिकार था। अखबार बेचते बेचते, अखबार में खबर लिखने लगा था। कभी- कभी कोई कहानी!

अचानक से सागर का ध्यान हटता है। बिस्मिल आजादी का मतलब पूछता है। सागर चिल्ला उठता है। बालश्रम से आजादी। बिस्मिल कुछ बोलता नहीं है। वह दोबारा किताब में आजादी ढूंढने लगता है।

25 साल बाद 1 जुलाई को सागर बिस्मिल को लेने भोपाल एयरपोर्ट पहुंचता है। बिस्मिल अब जबलपुर कलेक्टर हो गया है। सागर बच्चों का अनाथालय चलाता है। जाने कितने बिस्मिल अब सागर के किस्सों में समा गए हैं। 15 अगस्त को अनाथालय में राष्ट्रध्वज फेराने के साथ बिस्मिल मुख्य अथिति के तौर पर भाषण देने आगे बढ़ता है। तभी उसकी नजर एक बच्चे पर जाती है। बच्चा….जो देश का भविष्य है। यहीं से हर आजाद देश के भविष्य की कहानी शुरू होती है। इन्हीं भाषणों के बीच सागर अपनी कहानी का किरदार जीने में व्यस्त हो जाता है। ये एक रास्ता था आजादी का..!

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