Powered by

Advertisment
Home हिंदी

World Bee Day: पर्यावरण के लिए क्यों ज़रूरी हैं मधुमखियाँ

World Bee Day 2024: भारत शहद उत्पादन के मामले में विश्व में आठवें स्थान पर है. एक अनुमान के अनुसार यहाँ 95 हज़ार मीट्रिक टन से भी ज़्यादा शहद का उत्पादन होता है. मगर शहद के अलावा मधुमक्खियों (bees) के पर्यावरणीय महत्त्व भी है. 

By Ground report
New Update
bee-6518669_1280.jpg

Picture Credit - Erik Karits from Pixabay

Listen to this article
0.75x 1x 1.5x
00:00 / 00:00

World Bee Day 2024: भारत शहद उत्पादन के मामले में विश्व में आठवें स्थान पर है. एक अनुमान के अनुसार यहाँ 95 हज़ार मीट्रिक टन से भी ज़्यादा शहद का उत्पादन होता है. इन आँकड़ों को देखने पर यह तो समझ आता है कि भारत के लिए मधुमक्खियाँ क्यों महत्वपूर्ण हैं. मगर इस जीव के आर्थिक पक्ष के अलावा पर्यावरणीय महत्त्व भी है. 

आनाज उत्पादन के लिए ज़रूरी

एक फूल से दूसरे फूल पर बैठती मधुमक्खी केवल शहद ही लेकर नहीं जाती वह अपने साथ फूलों के वह कण (pollen) भी लेकर जाती है. इसे दूसरे फूल पर छोड़ने से पौधों में प्रजनन हो पाता है. आसान शब्दों में कहें तो मधुमक्खियाँ पौधों में बीज बनाने के लिए ज़रूरी परागण (Pollination) में मदद करती हैं. खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार विश्व में कुल आनाज उत्पादन के एक तिहाई हिस्से के लिए मधुमक्खियाँ ही ज़िम्मेदार हैं.

फूलों में संकरण

इसके अलावा यह फूलों को भी संकरित (hybridization) करती हैं. मधुमक्खियाँ किसी भी फुल के नर हिस्से में बैठती हैं. इससे उनके पैरों में उस फूल के नर पराग कण चिपक जाते हैं. यही मधुमक्खी जब किसी अन्य फूल के मादा हिस्से में बैठती है तो इससे प्रकृतिक परागण हो जाता है. इसे बेहद आसन शब्दों में कहें तो एक ही प्रजाति के अलग-अलग तरह के फूल भी इनके चलते ही फूलते हैं. यानि कोई फूल जो आंशिक रूप से लाल और आंशिक रूप से सफ़ेद है तो इसका कारण यही मधुमक्खियाँ हैं.

मधुमक्खियों की संख्या में आती कमी

मगर बीते कुछ सालों में भारत सहित दुनिया भर में मधुमक्खियों की संख्या में कमी आई है. एक अनुमान के अनुसार भारत में बीते कुछ सालों में इनकी संख्या 20 प्रतिशत तक घटी है. दरअसल दुनिया भर में तापमान बढ़ने से कई फूल समय से पहले खिल रहे हैं. इसके चलते इनमें पराग (pollen) और नेक्टर (nector) की संख्या भी कम हो रही है. 

पराग का कम होना जहाँ सीधे तौर पर उत्पादन पर असर डालता है वहीँ नेक्टर के कम होने का सीधा असर मधुमक्खियों पर पड़ता है. असल में नेक्टर वह रस है जिसके सेवन से मधुमक्खियों को ऊर्जा मिलती है. यह उन्हें प्रजनन करने और छत्ता बनाने में मदद करता है.

इसके अलावा बढ़ते हुए वायु प्रदूषण (air pollution) ने भी मधुमक्खियों को बुरी तरह प्रभावित किया है. अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण फूलों द्वारा मधुमक्खियों को आकर्षित करने के लिए छोड़ी जाने वाली गंध धीमी पड़ जाती है. इसके चलते मधुमक्खियों को अपना भोजन तलाशने में दिक्कत जाती है.

भारत में शहद का उत्पादन मुख्य रूप से सरसों के फूलों से होता है. मगर सरकार द्वारा जेनिटकली मोडिफाइड सरसों (DMH-11) को बढ़ावा दिया जा रहा है. मगर सरसों की इस किस्म से मधुमक्खियों को भी ख़तरा बताया जा रहा है. ऐसे में जलवायु परिवर्तन (climate change) की मार के बीच कृषि में हो रहे ऐसे बदलाव मधुमक्खियों का जीवन और भी संकट में डाल देते हैं.       

यह भी पढ़ें

पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुकट्विटरइंस्टाग्रामयूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।