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“वर्षा के जल को बचाने से ही बचेगी आजीविका” पद्मश्री लक्ष्मण सिंह

"वर्षा के जल को बचाने से ही बचेगी आजीविका" पद्मश्री लक्ष्मण सिंह
"वर्षा के जल को बचाने से ही बचेगी आजीविका" पद्मश्री लक्ष्मण सिंह

6 जून को प्रदेश की राजधानी भोपाल (Bhopal) में, सातवां महेश बुच स्मृति व्याख्यान आयोजित किया गया। इस समारोह की अध्यक्षता मृदा वैज्ञानिक और भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. एस. पी. दत्ता कर रहे थे। साथ ही इस समारोह में राजस्थान के लापोड़िया गाँव के सामाजिक कार्यकर्ता और वॉटरमैन  पद्मश्री लक्ष्मण सिंह ने भी अपना व्याख्यान दिया। लक्ष्मण सिंह ने इस मौके पर “चौका प्रणाली से वर्षा जल संचयन और आजीविका सुधार” विषय पर अपने संघर्ष और सफलता की कहानी पर व्याख्यान दिया।

अपने व्याख्यान में लक्ष्मण सिंह ने लापोड़िया और अन्य 50 गाँवों में चौका प्रणाली से किये गये जल संचयन और गोचर ज़मीनों को  पुर्नजीवित करने के सफल प्रयास को विस्तार से समझाया। लक्ष्मण सिंह ने बताया कि, उन्होंने गांव के युवकों को शामिल किया और ‘‘ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोड़िया‘‘ का गठन किया। 

लक्ष्मण सिंह ने कहा कि जल संरक्षण तो लोगों की समझ में आने लगा किंतु इससे प्रकृति-मानव-मवेशी में सामंजस्य कैसे होगा, लोगों को यह समझा पाना थोड़ा मुश्किल प्रतीत हो रहा था। उन्होंने बताया कि जल संचयन के माध्यम से गोचर जमीन को पुर्नजीवित करने से मवेशियों के लिये पर्याप्त पानी और चारे की उपलब्धता बढ़ी और किसानों को पशुपालन के माध्यम से दूध के पैदावार से बहुत लाभ हुआ। 

इसके बाद जल संचयन एवं गोचर जमीन के संरक्षण हेतु समुदाय के लोगों ने गांवों के समग्र विकास हेतु ख़ुद नियम बनाये और उन पर अमल किया। साथ-साथ समुदाय के लोगों को जल संचयन एवं संरक्षण हेतु जागरुक एवं प्रोत्साहित किया और पद यात्रा, रैली, ग्राम सभा का आयोजन किया। लक्ष्मण सिंह ने बताया कि यह काम सरल नहीं था इसके लिए लापोड़िया गांव के सूखे तालाब को श्रमदान द्वारा पुर्नजीवित किया फिर समुदाय के लोग स्वेच्छा से जुट गये। 

तालाब के पुर्नजीवित होने पर सूख चुके कुओं में पानी आ गया। इस सफलता से उत्साहित हो कर श्रमदान द्वारा पानी का संचयन दूसरे गांवों ने भी अपनाया। जल संचयन हेतु उन्होने तालाबों का भी निर्माण किया जिसका नामकरण भी समुदाय द्वारा ही किया गया जैसे फूल तालाब, देव तालाब। इसके अलावा छत पर गिरने वाले बरसाती पानी का भी संचयन पीने के लिए किया। 

अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. एस. पी. दत्ता ने कहा कि मृदा और जल हमारे जीवन के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनाज का उत्पादन मृदा की गुणवत्ता पर आधारित है लेकिन जल बिना पैदावार संभव ही नहीं है। इसलिऐ श्लक्ष्मण सिंह द्वारा किये गये जल संरक्षण एवं समुदायिक विकास बहुत ही महत्वपूर्ण है।

इस कार्यक्रम की शुरुआत में टैगोर ड्रामा स्कूल के कलाकारों ने संगीत निदेशक सतीश कौशिक के नेतृत्व में जल संचयन पर आधारित जल चेतना गीत प्रस्तुत किए. जिसे काफी सराहा गया। इस व्याख्यान में लगभग 200 प्रतिभागियों ने भाग लिया था, जिसमें भोपाल, सीहोर और विदिशा ज़िले के गाँवों के किसान, ग्रामीण, विद्यार्थी, सिविल सोसाइटी के सदस्य, बुद्धिजीवी वर्ग, प्रोफेसर आदि शामिल हुए थे।

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