नब्बे के दशक में उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद और बुलंदशहर के बीच एक ऐसे शहर को बसने की कल्पना की गई जो पुर्णतः व्यवस्थित हो, जहाँ रोज़गार हो, रिहाइश हो और जिसे स्मार्ट शहर के रूप में देश के सामने पेश किया जा सके. ग्रेटर नॉएडा नाम के इस शहर की रूप रेखा से लेकर सञ्चालन तक सभी कामों के लिए जनवरी 1991 में उत्तर प्रदेश इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट एक्ट 1976 के तहत ग्रेटर नॉएडा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथोरिटी की स्थापना की गई. यह प्राधिकरण शहर की प्लानिंग, विकास, विनियमन और सञ्चालन सभी के लिए ज़िम्मेदार बनाई गई.
इस शहर के निर्माण के लिए 124 गाँव की लगभग 38 हज़ार हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित की गई. आगे बढ़ने से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि भूमि का अधिग्रहण एक ही बार में नहीं किया गया. बल्कि अलग-अलग सब-प्रोजेक्ट जैसे रिहाइशी कॉलोनी बनाना, रेल, मेट्रो अथवा फैक्ट्री स्थापित करने के लिए किया गया. ऐसे में जिन इलाकों में कभी खेत दिखाई देते थे अब धीरे-धीरे उनमें कांक्रीट का जंगल खड़ा होने लग गया है. मगर सरकार के इस ड्रीम प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ इन गाँवों के किसान प्रदर्शन (Farmers Protest Greater Noida) कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि उनकी ज़मीन को नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिग्रहित करने के बजाय आपसी सहमती के ज़रिये ज़मीन ख़रीदी गई है. इसके अलावा नए शहर में लगने वाली फैक्ट्रियों और स्कूलों में उन्हें जिस आरक्षण का वादा किया गया था वह अब तक पूरा नहीं हुआ है. हमने जिन किसानों से बात की उन्होंने बताया कि उनके पास अब नाम मात्र की ज़मीन बची है ऐसे में वह अपने बच्चों के भविष्य को लेकर आशंकित हैं.
Farmers Protest Greater Noida: क्या हैं किसानों की चिंताएं?
रमेश चन्द्र (66) जुनपत गाँव के रहने वाले हैं. उनके पास क़रीब 12 बीघा ज़मीन थी जिसे ग्रेटर नॉएडा विकास प्राधिकरण ने हिस्सों में उनसे खरीद ली. इससे उन्हें कुल 14 लाख रुपए मिले. इन पैसों से रमेश ने घर तो बना लिया मगर अब उनके पास खेती के लिए कोई भी ज़मीन नहीं बची है.
“मुझे जो पैसे मिले थे उससे मैने अपनी 2 लड़कियों की शादी कर दी. इसके बाद मैने अपना मकान बनवाया. ज़मीन लेते समय हमसे कहा गया था कि हमारे लड़कों को नौकरी दी जाएगी. मेरे 3 लड़के हैं किसी को भी नौकरी नहीं मिली, न मेरे पास कोई ज़मीन है.”
'भुखमरी की नौबत'
रमेश चन्द्र अपनी आजीविका के लिए 2 भैसों पर निर्भर हैं. वह कहते हैं कि इनका रखरखाव इतना महँगा है कि परिवार पालना मुश्किल हो जाता है. “मेरे परिवार में भुखमरी फ़ैल रही है.” परिवार की स्थिति पूछने पर वे केवल एक पंक्ति में जवाब देते हैं. वह बताते हैं कि अपनी बेटियों की शादी के लिए उन्होंने करीब 2 लाख का क़र्ज़ लिया था जिसे चुकाना अब मुश्किल होता जा रहा है.
ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए ये किसान बताते हैं कि प्राधिकरण द्वारा कुछ ज़मीनें फैक्ट्रियाँ लगाने के लिए ली गई थीं. इनमें बाद में रिहायशी फ्लैट बना दिए गए. प्रदर्शन कर रहे किसानों के अनुसार उन्हें इनमें से 10 प्रतिशत फ्लैट दिए जाने थे मगर केवल 6 प्रतिशत फ्लैट ही दिए गए हैं. अब उनके पास संसाधन के नाम पर कुछ भी नहीं है.
'पशुपालन से गुज़ारा मुश्किल'
जुनपत गाँव के ही श्याम सिंह (62) बताते हैं कि उनकी 33 बीघा ज़मीन प्राधिकरण ने ली है. यह ज़मीन उनके भाई के साथ साझे स्वामित्व में थी. अब उनके पास केवल 6 बीघा ज़मीन बची है. “हम दोनों भाइयों के पास कुल 6 बीघा ज़मीन है. मेरे 2 बच्चे हैं और भाई के 3 बच्चे हैं. यह ज़मीन इनमें बँटेगी. कमाने के लिए हम दूध बेंचते हैं. आप ही बताइए हमारे बच्चे क्या खायेंगे क्या बचाएँगे?” श्याम सिंह सवाल करते हुए बताते हैं. श्याम सिंह बताते हैं कि पहले उनके पास 12 भैंसें थीं मगर अब केवल एक गाय और एक भैंस बची है. “चारा 15 रुपए किलो है. खल 50 रूपए किलो है. इनके दाम बढ़ते हैं मगर दूध उसी भाव बेचना पड़ता है.” सिंह के अनुसार पशुपालान घाटे का सौदा बनकर रह गया है.
ज़मीन के बदले नौकरी का वादा अधूरा
कृषि के लिए ख़त्म होती ज़मीन और बढ़ता शहरीकरण इन गाँवों की आने वाली पीढ़ी के लिए कृषि के व्यवसाय का विकल्प ख़त्म कर देता है. परिवारों के पास अब बहुत थोड़ी सी ज़मीन बची है जिसमें कृषि करके परिवार चलाना एक कठिन काम है. प्रदर्शन (Farmers Protest Greater Noida) करने वाले किसान कहते हैं कि उन्होंने ज़मीन इसलिए भी दी कि उनके बच्चों को नौकरी मिल जाएगी मगर यह वादा भी अब तक अधूरा ही है. अखिल भारतीय किसान सभा के गौतम बुद्ध नगर ज़िला के संयोजक वीर सिंह नागर कहते हैं,
“स्थानीय औद्योगिक इकाइयों में हमारे यहाँ के लड़कों को रोज़गार नहीं दिया जा रहा है. उन्हें लोकल कहकर निकाल दिया जाता है. 200 किलोमीटर के दायरे के बाहर के लोगों को काम दिया जाता है जो ग़लत है.”
यहाँ यह बात उल्लेखित करना ज़रूरी हो जाता है कि साल 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पारित एक आदेश के अनुसार प्रदेश में प्राइवेट सेक्टर में 40 प्रतिशत नौकरियाँ स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करना अनिवार्य है. हालाँकि ज़मीनी हकीकत बहुत अलग है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जेवर में बन रहे एअरपोर्ट की कंस्ट्रक्शन साईट पर भी वहां के लोगों को रोज़गार नहीं दिया जा रहा है. ऐसे में प्रदर्शन कर रहे किसानों की बात और भी सच लगती है.
पल्ला गाँव के रहने वाले कृष्णपाल की 4 बीघा ज़मीन प्राधिकरण द्वारा ली गई है. वह प्राधिकरण द्वारा ज़मीन खरीदने के तरीके पर सवाल उठाते हैं.
अधिग्रहण के तरीके पर सवाल
“इन्होने हमसे भूमि अधिग्रहित नहीं की बल्कि आपसी समझौते से ली है. अधिग्रहित करते तो नए कानून के तहत ज़्यादा मुआवज़ा देना पड़ता. उसके तहत हमारी ज़मीन 1 करोड़ 10 लाख की जाती. मगर इन्होने हमारी ग्राम सभा कैंसल करके क्षेत्र को शहरी दिखा दिया. हमें उचित मुआवज़ा भी नहीं दिया गया.”
कृष्णपाल कहते हैं, “मोदी जी बार-बार अपने मन की बात सुनाते रहते हैं. मगर किसानों के मन कि उन्होंने कभी पूछी ही नहीं. अपनी बात को वो हम पर थोप रहे हैं और किसानों का शोषण पुरजोर तरीके से किया जा रहा है.”
हमने इस संबंध में ग्रेटर नॉएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी से उनका पक्ष जानने का भी प्रयास किया लेकिन किसी भी अधिकारी से अभी तक हमारी बात नहीं हो सकी है। जैसे ही हमें प्रशासन की तरफ से जवाब मिलेगा हम स्टोरी को अपडेट करेंगे।
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