क्या होती हैं पाईन नीडल्स जिनके कारण लग रही है हिमाचल के जंगल में आग?

हिमाचल में एक दिन में औसतन 24 जंगलों में आग लग रही है। अकेले अप्रैल के महीने में 645 से ज्यादा आग के मामले हिमाचल में रिपोर्ट हुए हैं। यह आग अब केवल जंगलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि रिहाईशी इलाकों तक पहुंचने लगी है। हिमाचल के जंगलों में लगी आग से वहां रहने वाले वन्य प्राणि सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जंगलों में उनके खाने पीने के लिए कुछ नहीं बचा है। आईये समझते हैं पाईन नीडल्स के बारे में जो जंगल की आग के लिए ज़िम्मेदार मानी जा रही हैं।

क्या होती है पाईन नीडल्स (Pine Needles) ?

क्या आपको पता है कि हिमाचल के जंगलों में लगने वाली आग के लिए जो सबसे बड़ी चीज़ जि़म्मेदार है वो क्या है? वो है एक सुई.. जी हां एक नीडल (Pine Needles) जिसकी वजह से हर वर्ष यहां आग लगती है।

how pine needle looks

हिमाचल का 1,25 हज़ार हैक्टेयर एरिया चिल पाईन फोरेस्ट से कवर्ड है। चिल पाईन पेड़ों की पत्तियों को लोकल भाषा में चिल्लारु कहा जाता है। इसकी पत्तियां बहुत ही पतली और लंबी होती हैं, जो एक सुई की तरह दिखती हैं। अप्रैल से जून के महीने में ये नीडल (Pine Needles) बड़ी संख्या में पेड़ों से गिरती हैं। ज़मीन पर इन नीडल शेप पत्तियों का ढेर लग जाता है। ये नीडल एसिडिक होती हैं और काफी ज्वलनशील मानी जाती है। इनकी वजह से जंगल में कोई और वनस्पती भी नहीं पनप पाती साथ ही इसकी वजह से ग्राउंड वॉटर भी रीचार्च नहीं हो पाता। जब मई और जून में भीषण गर्मी पड़ती है तो ये हाईली इंफ्लेमेबल पाईन नीडल्स धधक उठती हैं और जंगलों को आग के हवाले कर देती हैं।

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि निचले इलाकों में लगे पाईन फोरेस्ट को ब्रॉड लीफ ट्री से रिप्लेस करना होगा। लेकिन यह काम आसान नहीं है क्योंकि ये पेड़ हिमाचल के बहुत बड़े इलाके में फैले हुए हैं। सरकार ने यहां स्थानीय लोगों को पाईन नीडल (Pine Needles) हटाने के काम में लगाया हुआ है। ये लोग जंगलों से नीडल बटोरकर लाते हैं और उन उद्यमियों को बेचते हैं जो इन पाईन नीडल्स से फ्यूल बनाते हैं जिसे ब्रिकेट्स कहा जाता है। इन ब्रिकेट्स का उपयोग कोयले की तरह किया जा सकता है।

pine needles as a fuel

हालांकि जंगलों के निचले इलाकों से पाईन नीडल (Pine Needles) हटाने का काम तो आसान है लेकिन जंगलों के ऊपरी हिस्से जहां इंसानी पहुंच नहीं है, वहां से इन्हें हटाना आसान नहीं है। नीडल शेप लीफ वाले पाईन को ब्रॉड लीफ पाईन से बदलना भी काफी लंबा काम है, हालांकि निचले इलाकों में इन्हें लगाने से रिहाईशी इलाकों को आग से बचाया जा सकता है, और इंसानी गलती से लगने वाली आग की घटनओं को कम किया जा सकता है।

pine needle collection

अब समझते हैं कि जंगल की आग से हमें क्या नुकसान होगा?

जंगलों में लगने वाली आग से कई टन कार्बन निकलता है जो ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे को बढ़ा देता है। आग की वजह से नष्ट हुए जंगलों को दोबारा पनपने में लंबा वक्त लगता है, जो हमारे पास नहीं है। जंगलों के बिना हम पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। जंगल नहीं होंगे तो तापमान और ज्यादा बढ़ेगा, वर्षा कम होगी और सूखा पड़ेगा। यह सब भविष्यवाणियां नहीं है, यह सब हमारे आस पास हो रहा है, अगर आप थोड़ा समय निकालकर देखेंगे तो यह महसूस कर पाएंगे कि स्थिति हर दिन बद से बदतर होती जा रही हैं।

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अब आप सोचेंगे कि इसमें हम क्या कर सकते हैं, तो सरकार उन स्टार्टप्स को सबसिडी प्रदान करती है जो इन जंगलों से पाईन नीडल को हटाने और उनसे फ्यूल बनाने का काम करते हैं। इन नीडल्स को हटाने के लिए अगर आपके पास कोई और बेहतर विकल्प या आईडिया मौजूद है तो इसमें आप सरकार की मदद कर सकते हैं।

हिमाचल के जंगलों में लगी आग से अब तक कितना नुकसान?

  • हिमाचल में हर दिन 24 जंगल में आग की खबर आ रही है।
  • अकेले अप्रैल महीने में 645 फॉरेस्ट फायर के मामले सामने आए।
  • भीषण गर्मी के कारण तापमान बढ़ रहा है जो इस आग का सबब बन रहा है.
  • 645 मामलों में धर्मशाला सर्कल में 165 जगह से आग की खबर आई।
  • रामपुर सर्कल में 116
  • शिमला सर्कल से 89
  • मंडी से 83
  • चंबा से 63
  • 4976.63 hectares एरिया आग से प्रभावित हुआ जिसमें
  • 4006.91 hectares नैचुरल एरीया और
  • 927.72 hectares का plantations एरिया आग से तबाह हुआ।
  • ज्यादातर आग चीड़ और पाईन फोरेस्ट में लग रही है।
  • हिमाचल के टोटल फोरेस्ट कवर में 15 प्रतिशत हिस्सा चीड़ पाईन फोरेस्ट का ही है।
  • कुछ दिनों पहले तारा देवी फोरेस्ट में आग लगी जो दो से तीन दिन तक काबू में नहीं आई।
  • जिन जंगलों में आग लगी वहां वन्य प्राणियों के लिए खाने और पीने का कुछ नहीं बचा है।
  • अधिकारियों के मुताबिक इस वर्ष आग दो हफ्ते पहले ही शुरु हो गई क्योंकि तापमान बहुत अधिक हो गया है।
  • 9000 से अधिक फॉरेस्ट वॉलंटियर आग बुझाने के काम में लगे हुए हैं।
  • साथ ही आईटीबीपी और सेना की भी मदद ली जा रही है।
  • सैटेलाईट से जंगलों पर नज़र रखी जा रही है।

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