Birsa Munda Death anniversary todya: Munda's 'Ulagulan' struggle to save tribal identity, autonomy and culture

पुण्यतिथि विशेष: आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति बचाने का संग्राम था बिरसा मुंडा का ‘उलगुलान’

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Kanishtha Singh | New Delhi

भारतीय विरासत की अमूल्य धरोहरों में से एक महान स्वतंत्रता सेनानी और जन लोकनायक बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। झारखंड स्थित छोटा नागपुर स्थित एक गांव में बिरसा मुंडा का जन्म 1875 के दशक हुआ था। मुंडा एक जनजातीय समूह था जो छोटा नागपुर पठार में निवास करते थे। वर्ष 1900 में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ आदिवासियों को भड़काने के आरोप में बिरसा गिरफ्तार कर लिये गए। इस दौरान उन्हें 2 साल की सजा हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर दिया था जिसके चलते 9 जून 1900 उनकी मौत हो गई।

ऐसे मिली पहचान
पिता ने बिरसा मुंडा का दाखिला एक मिशनरी स्कूल में किया था जहां उन्हें ईसाइयत का पाठ पढ़ाया गया। कहा जाता है कि बिरसा ने कुछ ही दिनों में यह कहकर ‘साहेब साहेब एक टोपी है’ स्कूल से नाता तोड़ लिया। 1890 के आसपास बिरसा वैष्णव धर्म की ओर मुड गए। बिरसा तब एक नौजवान नेता के रूप में पहचाने गए जब 1 अक्टूबर 1894 उन्होंने सभी मुंडाओं को एकत्र कर अंग्रेजो से लगान माफ़ी के लिये आंदोलन छेड़ दिया।

यह भी देखें: http://www.youtube.com/watch?v=foU44nxjo4s

19वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण आदिवासी आंदोलन
मुंडा जनजातियों ने 18वीं सदी से लेकर 20वीं सदी तक कई बार अंग्रेजी सरकार और भारतीय शासकों, जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किये। बिरसा मुंडा के नेतृत्‍व में 19वीं सदी के आखिरी दशक में किया गया मुंडा विद्रोह उन्नीसवीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण जनजातीय आंदोलनों में से एक है। इसे उलगुलान (महान हलचल) नाम से भी जाना जाता है।

‘मुंडा विद्रोह’ झारखण्ड का सबसे बड़ा और अंतिम रक्ताप्लावित जनजातीय विप्लव था, जिसमें हजारों की संख्या में मुंडा आदिवासी शहीद हुए। मशहूर समाजशास्‍त्री और मानव विज्ञानी कुमार सुरेश सिंह ने बिरसा मुंडा के नेतृत्‍व में हुए इस आंदोलन पर ‘बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन’ नाम से बडी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक लिखी है।

अंग्रेजों के साथ-साथ, सूदखोरों के खिलाफ भी छेड़ी जंग
1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई भी छेड़ दी थी। बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी जंग का ऐलान किया। ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, क़र्ज़ के बदले उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे। यह मात्र विद्रोह नहीं था। यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था।

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेजों के बीच हुए कई युद्ध
1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उनके साथियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेजी सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गई लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियां हुईं।

अंग्रेजों की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरुक किया
ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर अंग्रेजों ने आदिवासियों के वे गांव, जहां व सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बांटकर, राजस्व की नई व्यवस्था लागू कर दी। इसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर लोग आंदोलित हुए और उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिए। बिरसा मुंडा ने मुंडा आदिवासियों के बीच अंग्रेजी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरुक करना शुरू किया। जब सरकार द्वारा उन्‍हें रोका गया और गिरफ्तार कर लिया तो उन्होंने धार्मिक उपदेशों के बहाने आदिवासियों में राजनीतिक चेतना फैलाना शुरू किया। वे स्‍वयं को भगवान कहने लगे। उन्होंने मुंडा समुदाय में धर्म व समाज सुधार के कार्यक्रम शुरू किए और तमाम कुरीतियों से मुक्ति का प्रण लिया।

जनवरी 1900 में डोमबाड़ी में हुए संघर्ष में मारी गई आदिवासी महिलाएं और बच्चे
जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गये। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियां भी हुईं। अंत में खुद बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये। जो आदिवासी किसी महामारी को दैवीय प्रकोप मानते थी उनको वे महामारी से बचने के उपाय समझाते। मुंडा आदिवासी हैजा, चेचक, सांप के काटने बाघ के खाए जाने को ईश्वर की मर्ज़ी मानते, बिरसा उन्हें सिखाते कि चेचक-हैजा से कैसे लड़ा जाता है। बिरसा अब धरती आबा यानी धरती पिता हो गए थे।

एक तरफ ग़रीबी थी और दूसरी तरफ ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट’
धीरे-धीरे बिरसा का ध्यान मुंडा समुदाय की ग़रीबी की ओर गया। आज की तरह ही आदिवासियों का जीवन तब भी अभावों से भरा हुआ था। न खाने को भात था न पहनने को कपड़े। एक तरफ ग़रीबी थी और दूसरी तरफ ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट’ 1882 ने उनके जंगल छीन लिए थे। जो जंगल के दावेदार थे, वही जंगलों से बेदख़ल कर दिए गए। यह देख बिरसा ने हथियार उठा लिए और आंदोलन शुरू हो गया। 1898 में डोम्‍बरी पहाडियों पर मुं‍डाओं की विशाल सभा हुई, जिसमें आंदोलन की पृष्‍ठभूमि तैयार हुई। आदिवासियों के बीच राजनीतिक चेतना फैलाने का काम चलता रहा। अंत में 24 दिसम्बर 1899 को बिरसा पंथियों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड दिया। 5 जनवरी 1900 तक पूरे मंडा अंचल में विद्रोह की चिंगारियां फैल गई। ब्रिटिश फौज ने आंदोलन का दमन शुरू कर दिया।

9 जनवरी 1900, अंग्रेजों से लड़ते हुए सैकड़ों मुंडा आदिवासियों की शहादत
9 जनवरी 1900 का दिन मुंडा इतिहास में अमर हो गया जब डोम्बार पहा‍डी पर अंग्रेजों से लडते हुए सैंकड़ो मुंडाओं ने शहादत दी। आंदोलन लगभग समाप्त हो गया। गिरफ्तार किये गए मुंडाओं पर मुकदमे चलाए गए जिसमें दो को फांसी, 40 को आजीवन कारावास, 6 को चौदह वर्ष की सजा, 3 को चार से छह बरस की जेल और 15 को तीन बरस की जेल हुई। बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम और निर्णायक लड़ाई 1900 में रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई। हज़ारों की संख्या में मुंडा आदिवासी बिरसा के नेतृत्व में लड़े,पर तीर-कमान और भाले कब तक बंदूकों और तोपों का सामना करते। लोग बेरहमी से मार दिए गए। 25 जनवरी, 1900 में स्टेट्समैन अखबार के मुताबिक इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे। अंग्रेज़ वो लड़ाई जीते तो सही पर बिरसा मुंडा हाथ नहीं आए। लेकिन जहां बंदूकें और तोपें काम नहीं आईं वहां पांच सौ रुपये ने काम कर दिया।बिरसा की ही जाति के लोगों ने उन्हें पकड़वा दिया जिसके बाद उन्हें 2 साल की सजा हो गई । और अंततः 9 जून 1900 मे अंग्रेजो द्वारा उन्हें एक धीमा जहर देने के कारण उनकी मौत हो गई।

अपनों का धोखा बना बिरसा की मौत का कारण
अपनों का धोखा बिरसा की मौत का कारण बना। संख्या और संसाधन कम होने के चलते बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया। रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस उनसे आतंकित थी। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। बिरसा कहते थे, आदमी को मारा जा सकता है, उसके विचारों को नहीं, बिरसा के विचार मुंडाओं और पूरी आदिवासी कौम को संघर्ष की राह दिखाते रहे। आज भी आदिवासियों के लिए बिरसा का सबसे बड़ा स्था्न है। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है।

बिरसा मुण्डा की समाधि राँची में कोकर के निकट डिस्टिलरी पुल के पास स्थित है। वहीं उनका स्टेच्यू भी लगा है। उनकी स्मृति में रांची में बिरसा मुण्डा केन्द्रीय कारागार तथा बिरसा मुंडा अंतरराष्ट्रीय विमानक्षेत्र भी है। पर आज भी भारत के इतिहास में बिरसा मुंडा अमर एवं पूजनीय हो गए। आज उनकी इस पुण्यतिथि पर हमारा उन्हें शत् शत् नमन।