उपभोग के संयम से पर्यावरण की रक्षा

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विचार। राजेश पाठक ( सीहोर)

समस्या बड़ी हो चाहे कितनी ही छोटी क्यूँ ना, उसको लेकर केवल सरकार से उम्मीद लगाकर फुरसत हो लेने की ये प्रवृति लोगों में पुरानी है. और पर्यावरण की समस्या नें जिस प्रकार गंभीर रूप धारण किया है उसके पीछे भी इस प्रवृति का कोई कम योगदान नही. वैसे तो एक नागरिक के नाते कर्तव्य-बोध के इस आभाव से कोई अनभिज्ञ भी नहीं, पर उस पर भी चिंतन की उच्च अवस्था से निकली व्यापक हित की कोई बात की अधूरी समझ नें कैसे-कैसे अनर्थ किये हैं उसकी भी एक बानगी देख लीजिए:

कुछ दिन पूर्व मेरे एक मित्र का फ़ोन आया. बातों-बातों में पता चला कि उस दिन उसकी बहिन का जन्मदिन है, और इस ख़ुशी में उसके बहनोई नें उसे एक कार भेंट करी है.
“उनके यहाँ तो पहले से ही एक कार है ?” मैंने कुछ आश्चर्य से पूछा .“अरे, अभी तो उनका लड़का भी बोलेरो कार लेने की सोच रहा है, जबकि अभी वो बेरोजगार है”- उसका उत्तर था. मित्र की जिस बहिन के बारे में बात हो रही है उसके परिवार में वो स्वयं, पति और उनका एक लड़का कुल तीन लोग हैं. पति सरकारी इंजिनियर है, और पत्नी पड़ी लिखी जरूर है पर है गृहणी है. जबकि लड़का इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश मे है. पूरा परिवार बड़ा धार्मिक है; और ऐसे मत का अनुयायी है जिसमें आस्था का आधार ही आत्मसंयम है, जिसकी प्रेरणा उनके जैसे अनुयायीयों को त्याग व संयमम के इन आदर्शों की पराकाष्ठा करने वाले गुरु परंपरा से मिलती है. वैसे देखा जाये तो अपने गुरु से आत्मसंयम का पाठ पढ़ने में इस परिवार ने कोई कसर भी नही छोड़ी है! उनके खान-पान में इसके असर को खूब देखा जा सकता है – लहसुन, प्याज, बैगन ना जाने क्या-क्या पूरा परिवार छोड़े बैठा है. उपवास रखने का मौका आ जाये तो फिर क्या, सिर्फ पानी पर दिन गुजार दें तो कम. अब यदि ऐसा परिवार इस प्रकार कारें इकट्ठी करने लग जाए तो कौन है जो आश्चर्य में ना पड़ जाए. खान-पान की वस्तुओं का त्याग आत्मसंयम का पहला चरण है, आगे की यात्रा की प्रारंभिक बिंदु मात्र है- ये बात गुरूजी ने बतायी तो जरुर होगी, पर उन्होंने इसे ध्यान में रखना कितना उचित समझा या नहीं समझा वो अलग बात है. वैसे उन जैसों को इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि लहसुन-प्याज खा लेने से या उपवास एक बार न रखने से जीवन-चक्र पर उतना दुष्प्रभाव नहीं पड़ता जितना बेलगाम उपभोग से पड़ता है, जिसका असर वो बाखूबी देख सकते हैं.

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विगत वर्ष दिल्ली में छायी धुएं की धुंध की समस्या के लिए दिल्ली के बाहर रहने वाले कम अन्दर रहने वाले कारों के आदी ज्यादा हैं, और इनमे वो सब तथा-कथित समाजिक संगठनों के लोग भी बखूबी शामिल हैं, जो तख्ती लिए सरकार से इस समस्या से मुक्ति की मांग करते हुए समाचार माध्यमों के आगे फोटो खिचवाने के लिए एक-दूसरे को पीछे छोड़ते दिखाई पड़े.

दिलो-दिमाग को अपने वश में कर लेने वाली आज के दौर में व्याप्त उपभोग की इस अतृप्त लालसा का ही परिणाम है कि बढ़ती कारों के कारण शहर के अन्दर से निकलने वालीं सड़कें चोड़ी होने के कुछ ही दिनों बाद सकरी लगनें लगती हैं; एसी और फ्रिज जैसे उपकरणों के अधिक उपयोग से सेहत जीवन रक्षक दवाओं के सहारे टिके रहने के लिए विवश है. और तो और इन सब बातों से प्रदूषित वातावरण उन आम नागरिकों के जीवन पर भी भारी पड़ने लगा है जिनका इन उपभोग की वस्तुओं से कोई लेना-देना ही नहीं. वास्तव में हमारे आसपास की घटनाएँ तो हमारी आँखें खोलने का अपना काम खूब कर रहीं, बस बात ये है कि समस्या के हल को हम ओरों की भूमिकाओं में देखने की अपनी आदत से छुटकारा पाने को तैयार नहीं. और ये समझने को तैयार नहीं कि चीज़ों को सही परिपेक्ष्य में समझकर, अपनी आदतों में सुधार लाकर ही पर्यावरण को सुधारते देख सकते हैं.

इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट द्वारा इस आलेख में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं किया है।

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