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मानवाधिकार दिवस: सदियों की लड़ाई के बूते मिला है सम्मान से जीने का अधिकार!

ambedkar jayanti 2019 : dr. babasaheb bhimrao ramji ambedkar The Father of Indian Constitution
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नन्दिनी राजोरिया

मानवाधिकारों से तात्पर्य है क्षेत्र, जाति, धर्म, नस्ल और लिंग के आधार पर किये जाने वाले भेदभाव से मुक्त जीवन जीने का एक ऐसा अधिकार, जिसमें मानवीय गरिमा और सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित हो. यानी ऐसे अधिकार जिनके साये में कोई भी इंसान आज़ादी से जीवन जी सके, बिना किसी भय या दवाब के अपनी बात कह सके, उसे देश के कानून में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समानता प्राप्त हो, वह अपनी रुचि के मुताबिक भोजन और शिक्षा ले सके और उसे जीवन-यापन के लिए उसकी योग्यता के अनुसार काम मिल सके.

जिस देश में लोकतान्त्रिक मूल्यों में आस्था जितनी ज्यादा गहरी होती है, जहाँ महिलाओं का सम्मान जितना ज्यादा होता है, वे जितनी ज्यादा सुरक्षित होती हैं, अल्पसंख्यक समुदायों के लोग जितने ज्यादा बेफिक्र और खुश रहते हैं, जहाँ आर्थिक विषमता जितनी कम होती है, और जहाँ पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी ज्यादा होती है, वहाँ मानवाधिकार उसी अनुपात में ज्यादा मज़बूत होते हैं. एक अच्छे देश की पहचान ही इस बात से होती है कि उसके संविधान में मानवाधिकारों की अहमियत कितनी है और उनके प्रति उसकी सरकार के सरोकार कितने गहरे हैं.

सभी को करनी पड़ती है मानवाधिकारों की परवाह
आज मानवाधिकारों की अहमियत से सभी देश अवगत हैं. उनका पालन या उल्लंघन वैश्विक महत्ता रखता है. हालांकि समस्या तब होती है, जब मानवाधिकारों से किसी देश की संप्रभुता खतरे में पड़ती दिखायी देती है. इस समय सबसे बड़ी समस्या राष्ट्र की संप्रभुता और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने की है. जब कोई सरकार मानवाधिकारों की रक्षा में विफल रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके लिए दखलअंदाज़ी कर सकता है. यह दखलअंदाज़ी उस देश की संप्रभुता को खंडित करने के लिए नहीं, बल्कि यह याद दिलाने के लिए होती है कि शासन का मतलब किसी भू-भाग का मालिक होना भर नहीं है. देश की संप्रभुता उसके नेताओं की नहीं, उसके नागरिकों की संप्रभुता है.

विवाद का विषय भी हैं मानवाधिकार
लेकिन मानवाधिकार विवाद का विषय भी रहे हैं. कई बार वे एक ऐसी चादर बना दिये जाते हैं, जिसे खींच कर बेशर्म लोग अपने विरोधियों को ‘नंगा’ करने का खेल खेलते हैं. उन्हें अपने स्वार्थ के चश्मे से देखा जाता है और उसी के मुताबिक प्रचार भी किया जाता है. कश्मीर का उदाहरण लें. वहाँ हमारे जवान अपने प्राणों की बलि देकर उन वहशी कश्मीरी युवाओं से देश की रक्षा करने में जुटे हैं, जो पाकिस्तान की घिनौनी साजिश के तहत खून-खराबे में लगे हैं. उन्हें और उनके आकाओं का मानवाधिकारों से कोई सरोकार नहीं.

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लेकिन जब उन आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो पकिस्तान, उसके समर्थक कुछ देश और हमारे अपने ही देश के विदेशी एजेंट मानवाधिकारों की हत्या का विलाप करने लगते हैं. जो मानव नहीं हैं और जिन नर-पिशाचों के कुकृत्य घोर अमानवीय हैं, उनके कैसे मानवाधिकार! पूरी दुनिया को मालूम है कि भारत और भारतीय समाज के तो डीएनए में ही मानवाधिकार रचे-बसे हैं. जो समाज ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा पर आधारित है और जिसके लिए सम्पूर्ण विश्व ही एक कुटुंब की तरह है, उसे मानवाधिकारों के लिए किसी सनद क्या ज़रूरत है?

कुछ ऐसा है मानवाधिकारों का इतिहास
ऐसा नहीं कि एकदम ही किसी के दिमाग में ख्याल आया और मानव अधिकारों की शुरूआत कर दी गई. इसके लिए सैकड़ों वर्षों तक लड़ाई लड़ी गई है. पहले हमारे पास किसी भी तरह के कोई राइट्स नहीं थे. पहली बार 539 बीसी में ईरान के राजा सायरस द ग्रेट ने लोगों को उनकी पसंद का काम और धर्म चुनने की आज़ादी दी. उसके सदियों बाद कोई महत्वपूर्ण पहल हुई 1915 में, जब गांधीजी ने भारत में हो रहे जुल्मोसितम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया. उसके बाद 1945 में यूनाइटेड नेशन्स ने मानव अधिकारों की शुरूआत की.

मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा यूएन कमीशन ऑफ़ हयूमन राइट्स द्वारा 10 दिसंबर, 1948 को यूएन जनरल असेंबली में की गई थी. तभी विश्व-स्तर पर मानव अधिकारों को लागू कर दिया गया. तभी से हर साल 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है.

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इन सभी को प्राप्त हैं ये अधिकार
जब हम मानव अधिकारों की बात करते हैं तो अपने दिमाग में एक अवधारणा बना लेते हैं कि इन अधिकारों की कुछ सीमा होगी. सभी के लिए ये अधिकार शायद न हों. लेकिन आपको बता दें कि मानव-अधिकार सभी के लिए समान हैं. मैं, आप, सिटीजन-नॉन सिटीजन, क्रिमिनल, मॉयनॉरिटी ग्रुप आदि-आदि. सभी के पास मानव अधिकार हैं.

मलाला, जिन पर नाज है इंसानियत को!
इन्हीं अधिकारों के चलते मलाला यूसुफजई ने शिक्षा के अधिकार के लिए जंग लड़ी और विजय प्राप्त की. आपको बता दें कि मलाला यूसुफजई पाकिस्तान की रहने वाली हैं. उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही गुल मकई नाम से एक कॉलम लिखना शुरू कर दिया था, जिसमें वह आतंकवादी संगठन और शिक्षा से जुड़ी समस्याओं का जिक्र किया करती थीं.

आतंकवादी संगठन ने इस बात की जानकारी मिलने पर अंधाधुंध गोलियां बरसा कर उनकी जान लेने की कोशिश की, जो मलाला के ज़िन्दगी जीने के जुनून के आगे नाकाम हो गयी. अपने लिए लड़ने की ज़िद और अपने क्षेत्र में सभी को शिक्षा के समान अवसर दिलाने के लिए वे मौत को भी मात देकर लौट आईं. अपने देश वापस लौटकर, उन्होंने सभी को कलम की ताकत से अवगत करवाया.