भोपाल गैस कांड: तबाही के उस खौफनाक मंजर में गिद्ध और जानवर नोच रहे थे इंसानों की लाशें

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भोपाल | नन्दिनी राजोरिया

किसी भी इंसान, शहर और देश के इतिहास में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो उसके जीवन को झिंझोड़ कर रख देते हैं। जब भी हवा के झोंके के साथ इतिहास के वे पन्ने पलटते हैं न जाने कितने ही लोगों की आंखें नम कर देते हैं। भोपाल शहर के इतिहास में भी 3 दिसम्बर का​ दिन एक ऐसे स्याह और त्रासदी दिवस के रूप में दर्ज है, जिसे लाख चाहने के बावजूद भुलाया नहीं जा सकता।

वर्ष1984 में दो और तीन दिसम्बर की दरम्यानी उस रात हज़ारों घर उजड़ गये। इतने लोग मौत की आगोश में समा गये की लाशें गिनना मुश्किल हो गया। मासूम बच्चे यतीम हो गये, कितनी ही महिलाएँ बेवा हो गयीं और न जाने कितने ही निर्दोष लोग जानलेवा बीमारियों के शिकार हो गए। आज भी जब हम किताबों और किस्से कहानियों और उन साक्षी लोगों से उस मंजर को सुनते हैं तो आधी रात को सड़कों पर अपनी जान बचाने भागते लोग, अस्पतालों और सड़कों पर पसरी हुई उन लाशों के दृश्य आंखों के सामने आते हैं तो हमारी चेतना हिल उठती है।

जिन लोगों ने उस काली रात को अपनी आंखों से देखा, उनके चेहरे पर एक गहरा दर्द पसर जाता है और उनकी आंखों से छलके आँसू ख़ौफ़ और तकलीफ़ का मंज़र बयां कर देते हैं। उस रात का दर्द, एक ऐसा असहनीय दर्द है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। इतने सालों बाद भी पीड़ितों के दिलों में उस त्रासदी के ज़​ख्म ताज़ा हैं, जो लाख कोशिशों के बावजूद सूखने का नाम नहीं ले रहे।

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तबाही के उस खौफनाक मंजर में गिद्ध-जानवर नोच रहे थे लाशें
साल 1984, 2 और 3 दिसंबर की उस रात शहर के छोला इलाके स्थित यूनियन कार्बाइड के प्लांट से जब मिथाइल आइसो सायनाइट गैस का रिसाव हुआ। उस वक्त लोग खांसते-खांसते इधर-उधर भागने लगे। इस बात का अंदाजा किसी को नहीं था कि यह छोटा सा हादसा इतना भंयकर रूप ले लेगा। तबाही का खौफनाक मंजर तो तब सामने आया, जब गिद्ध और जानवर इंसानों की लाशों को नोचते नज़र आये। पक्षियों को इस तरह जमीन​ पर देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता था उस रात की घटना, एक भीषण मानवीय त्रासदी थी। चारों तरफ लाशों के सड़ने से भयंकर बदबू आ रही थी। लोगों के घरों में घुसकर देखा गया तो कुछ ही देर में न जाने कितनी ही लाशों का पहाड़ खड़ा हो गया।

लोग अपने सगे-संबंधियों का ठीक से अंतिम संस्कार भी न कर सकें
मुर्दा इंसानी जिस्मों की बेक़दरी इस क़दर हुई कि इंसानियत जार-जार रो उठी। लोग अपने सगे-संबंधियों का ठीक से अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए। जो उस काली रात में मर गए, वे तो ठीक। लेकिन जो बच गए, वे कई तरह की जानलेवा बीमारियों का शिकार हो कर ज़िन्दा लाश बन कर रह गए। ज्यादातर को सांस और फेफड़ों से संबंधित बीमारियां हो गयीं। बात सिर्फ यही खत्म नहीं हुई। इन बीमारियों ने आनुवांशिकता बीमारी का रूप धारण कर लिया। ऐसी लाइलाज बीमारियों के चलते कुछ लोगों को अपने शरीर के अंगों तक को खोना पड़ा। किसी का हाथ नहीं रहा, तो किसी का पैर। जहरीली गैस के प्रभाव के चलते कुछ लोग विकंलाग पैदा हुए।

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लोगों तक मदद पहुंचाने के मामले में बैकफुट पर सरकार 
लोगों को इस त्रासदी के प्रकोप से बाहर निकालने के लिए सरकार ने कई प्रयास किए। यूनियन कार्बाइड प्लांट के मालिक वारेन एडरसन ने पीड़ितों को मुआवजा तो दिया, जो ऊँट के मुँह में जीरे की तरह था। लेकिन वह भी अव्यवस्था के चलते बहुत से लोगों को नहीं मिल पाया। मुआवजे का लाभ लेने वाले लोगों में कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें मुआवजे की आवश्यकता नहीं थी। वहीं कुछ ऐसे लोग मुआवजे से वंचित रह गए, जो इसके असली हकदार थे।

…और एक नए जीवन को संजोने की कोशिश
सवाल यह है कि क्या वाकई लोगों को इस मुआवजे से कुछ फायदा हुआ है? देखा जाए तो जो राशि मुआवजे के तौर पर लोगों को दी जाती थी, वह उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं, जो उस रात लोगों ने सहा। लेकिन फिर भी मुआवजे के तौर पर मिलने वाली राशि से लोगों को खुद को संभालने में आसानी हुई। एक दिन में जो सब तहस-नहस हो गया था, उस राशि से उसे दुबारा संजोने की कोशिश की गई। पीड़ित लोगों के फ्री इलाज की व्यवस्था की गयी। गैस पीड़ितों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा और अन्य कई सुविधाएं दी गयीं ताकि वे अपने जीवन को बेहतर तरीके से जी सकें।

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ज़िन्दगी और मौत के बीच पेंडुलम बन चुके हैं लोग
गैस त्रासदी के 34 सालों बाद भी अगर हम सोचें कि उससे जुड़ी समस्याओं से अब हमें निजात मिल गई है तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कई लाइलाज बीमारियों के​ शिकार लोग आज भी ज़िन्दगी और मौत के बीच पेंडुलम बने हुए हैं। सांस और फेफड़ों की परेशानी तो आम हो गई है।

पीड़ितों का दर्द
त्रासदी से पीड़ित कुछ लोगों का दर्द है कि उन्हें सरकार से मदद नहीं मिली। सरकार उनके बारे में नहीं सोच रही। उन्होंने तो अपनी ​जिंदगी काट ली, पर आने वाली पीढ़ियां तो आनुवांशिक तौर पर कई बीमारियों के साथ ही पैदा होती रहेंगी। सरकार को उनके लिए कुछ बेहतर कदम उठाने होंगे।

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