Women’s Day: भारत में महिलाओं की स्थिति बयां करते कुछ चुनिंदा लेख

Indian women and their problems, महिलाओं की स्थिति
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आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (Women’s Day) है। दुनिया भर में महिलाओं को समान अधिकार देने की बात की जा रही है। हम देख रहे हैं कि महिलाएं हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ रही हैं। फिर बात अंतरिक्ष अनुसंधान हो, सेना में फाईटर जेट उड़ाना हो, खेतों में काम करना हो या किसी सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लेना हो। हर जगह महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं। भारत में हम अगर महिलाओं की स्थिति पर गौर करें तो आज भी ऐसी कई सारी समस्याएं हैं जिनसे महिलाओं को दो चार होना पड़ता है। चाहे दहेज प्रताड़ना हो, घरेलू हिंसा हो या समाज में समान ओहदे की लड़ाई हो। महिलाओं के लिए देश में नए अवसर पैदा हुए हैं। आर्थिक रुप से घर की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए आज महिला और पुरुष दोनों कमाने के लिए घर से बाहर जा रहे हैं। लेकिन कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका हल हमें जल्द निकालना होगा। ऐसे ही कुछ चुनिंदा लेख हम आपके लिए लाए हैं जहां भारत में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है।

आज भी दहेज के लिए प्रताड़ना झेल रही है महिलाएं

दहेज़ के लिए मानसिक रूप से प्रताड़ित होने के बाद अहमदाबाद की आयशा द्वारा आत्महत्या ने जहां पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, वहीं यह सवाल भी उठने लगा है कि हम जिस महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, वास्तव में वह धरातल पर कितना सार्थक हो रहा है? शक्तिकरण की यह बातें कहीं नारों और कागज़ों तक ही सीमित तो नहीं रह गई है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि जितना ज़ोर शोर से हम महिला दिवस की चर्चा करते हैं, उसकी गूंज सेमिनारों से बाहर निकल भी नहीं पाती है? क्योंकि हकीकत में आंकड़े इन नारों और वादों से कहीं अलग नज़र आते हैं। …...पूरा पढ़ें

पीरियड्स को लेकर लड़कियों की पढ़ाई में परेशानी होना निराश करने वाली घटना है

देश में किशोरी एवं महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार आया है। केंद्र से लेकर राज्य की सरकारों द्वारा इस क्षेत्र में लगातार सकारात्मक कदम उठाने का परिणाम है कि एक तरफ जहां उनके स्वास्थ्य के स्तर में सुधार आया है, वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई है। कई राज्यों में महिला एवं किशोरियों के कुपोषण के दर में कमी आई है दूसरी ओर साक्षरता के दर में काफी प्रगति हुई है। लेकिन अब भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सुधार की अत्यधिक आवश्यकता है। विशेषकर माहवारी (पीरियड्स) के मुद्दे पर सबसे अधिक काम करने की ज़रूरत है। … पूरा पढ़ें

पीरियड्स’ महिलाओं की जिंदगी से जुड़ा एक अहम विषय है, जिस पर खुलकर बात नहीं होती

भारतीय समाज में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं पीरियड्स को लेकर कई मिथकों और संकोचों में अपना जीवन गुजार रही हैं। ’पीरियड्स’ महिलाओं की जिंदगी से जुड़ा एक अहम विषय है, जिस पर खुलकर बात नहीं होती है। देश के बड़े शहरों में हालात जरूर थोड़े बदले हैं, लेकिन गांव और कस्बों में अभी भी ये चुप्पी का मुद्दा है, जिसे शर्म और संकोच की नजर से देखा जाता है। गांव की महिलाएं इस पर चर्चा न घर में कर पाती हैं और न ही अपनी किशोर बेटियों को इस बारे विस्तार से बता पाती हैं, जिस कारण साफ-सफाई के अभाव में गंभीर बीमारियों से संक्रमित होने का खतरा उनमें लगातार बना रहता है। स्वास्थ्य विभाग के तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति जस की तस है। … पूरा पढ़ें

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राधा राजावत का संघर्ष और जज़्बा महिला सशक्तिकरण का एक बेमिसाल उदाहरण है

कुछ ऐसी ही है टोंक जिला के निवाड़ी ब्लॉक स्थित ललवाडी गांव की रहने वाली राधा राजावत की। जो छवि को अपना गुरू और आदर्श मानती है और अब उन्हीं की राह पर चलते हुए गांव में शिक्षा और जागरूकता का अलख जगा रही है। इस संबंध में राधा के पिता लक्ष्मण सिंह तथा माता भंवर कंवर का कहना है कि पहले हमारी मानसिकता राधा की पढ़ाई को लेकर नकारात्मक थी, हम इसे पढ़ाना नही चाहते थे। परन्तु इसकी ज़िद्द के आगे हमे झुकना पड़ा और इसे गांव के बाहर 8 वीं के बाद पढ़ने भेजा, परन्तु राजपूत समुदाय के लोग व परिवार के अन्य लोगों के विरोध करने पर रोक दिया। लेकिन इसने हिम्मत नहीं हारी और सारे विरोध झेलते हुये 12वीं तक की पढ़ाई स्वयं मज़दूरी करके पूरी की। इतने संघर्षों के बाद भी इसने 12वीं बोर्ड में 70 प्रतिशत प्राप्त किये, जिसके बाद फिर हमने इसको कभी भी पढ़ने से नही रोका। … पूरा पढ़ें

किसी समाज की तरक्की का अंदाज़ा लगाना है तो पहले देखो कि उस समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है?

इंसान और पशु में बस इतना ही फ़र्क है कि पशु अपना सारा जीवन खाने और सोने में गुज़ार देता है, लेकिन इंसान की शिक्षा उसे इतना सक्षम बनाती है कि वह खुद के साथ साथ अपना और अपने समाज को बढ़ाने में मदद करता है। बाबा साहब अम्बेडर हमेशा कहा करते थे कि “यदि किसी समाज की तरक्की का अंदाज़ा लगाना है तो पहले देखो कि उस समाज में महिलाओ की स्थिति क्या है?” हमारी व्यवस्था और सरकारी तंत्र आज़ादी के बाद से ही हाशिए पर खड़ी महिलाओं को आगे लाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके लिए गांव से लेकर महानगर स्तर तक महिला सशक्तिकरण से जुड़ी अनेकों योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें जहां उनकी शिक्षा पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है, वहीं उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के भी प्रयास किये जा रहे हैं। महिला आरक्षण ने इस बात को और बल दिया। इसी का सकारात्मक परिणाम है कि आज के समय में महिलाएं हर छोटे बड़े स्तर पर काम करती दिखाई दे रही हैं। इतना ही नहीं सामाजिक विषयों से जुड़े फ़ैसले लेने में भी रचनात्मक भूमिका अदा करने लगी हैं।… पूरा पढ़ें

महिलाएं जिन्होंने लाॅकडाउन में रोजी-रोटी की समस्या उत्पन्न होने पर भी हार नहीं मानी

बड़ी संख्या में लोग अभी भी रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं। हालांकि इस चिंता के बीच सकारात्मक बात यह रही है कि शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने भी स्वयं का रोज़गार शुरू करने की दिशा में क़दम बढ़ाया है और इसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण एकता स्व-सहायता समूह और जागृति स्व-सहायता समूह की महिलाएं हैं। जिन्होंने लाॅकडाउन में रोजी-रोटी की समस्या उत्पन्न होने पर भी हार नहीं मानी और अपने मजबूत इरादों तथा दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत घर की खाली पड़ी बाड़ी और खेत में सब्जी उत्पादन करके न केवल अपने परिवार का भरण पोषण कर रही हैं बल्कि उन्हें बेच कर लाभ भी कमा रही हैं। …पूरा पढ़ें

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घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को बनना होगा खुद का हौसला

भारत जैसा देश जंहा युगों से महिलाओं को देवी का रूप में माना जाता है और उसकी पूजा की जाती है। उसी देश में अब महिलाओं पर अत्याचार, हिंसा  और शोषण जैसी अमानवीय घटनाएं आम होती जा रही हैं। पूरे देश में महिलाएं हर जगह, हर समय, हर क्षण, हर परिस्थिति में हिंसा (घरेलू हिंसा) के किसी भी रूप का शिकार हो रही हैं। जैसे जैसे देश आधुनिकता की तरफ बढ़ता जा रहा है, वैसे वैसे महिलाओं पर हिंसा के तरीके और आंकड़ें भी बढ़ते जा रहें हैं।… पूरा पढ़ें

घर की चौखट से लेकर बाहर तक काम करने वाली ग्रामीण महिलाएं कैसे अपने निर्णय लेनी की क्षमता को देखती हैं

भारतीय संसद में महिलाओ की संख्या बढाने के लिए जब 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग जोर पकड़ने लगी, तब पुरानी धारा के सोचने वाले पुरुष अपनी दलीलों से महिलाओ की काबिलियत पर सवाल खड़े करने लगे। वह महिलाओ को कुशल गृहिणी बता कर उन्हें घर की सीमाओं तक सीमित करने लगे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर घर की सीमा क्या होती है, और क्या इस सीमा में मौजूद महिला समाज या देश में बदलाव करने में कोई भूमिका रखती है? आज के समय में एक घर कैसे महिलाओ को प्रतिनिधित्व दे रहा है या महिला अपने प्रतिनिधित्व के लिए कैसे जगह बना रही है? इन्हीं सवालों का जवाब उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िला स्थित रामपुर बबुआम और हसुइ मुकुंदपुर गांव में ढूंढने की कोशिश करते हैं। … पूरा पढ़ें

ग्रामीण महिलाएं अब मजदूरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू कर रही हैं

आत्मनिर्भरता का परिणाम अब ग्रामीण स्तर पर दिखाई देने लगा है। ग्रामीण अपनी जमीन पर खेती के साथ-साथ आय बढ़ाने के अन्य साधन भी ढूंढ़ने लगे हैं। विशेषकर ग्रामीण महिलाएं अब मजदूरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू कर रही हैं। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के दौरे के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले। ... पूरा पढ़ें

इज़्ज़त और मान सम्मान के नाम पर घर के अंदर घुट रही लड़कियां

संपूर्ण राजस्थान विविधताओं से भरा है। यह विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं, प्रचलनों, प्रथाओं और सामाजिक, भौगोलिक परिवेश को अपने अन्दर समाहित किये हुये है। यहां महिलाओं की आन, बान और शान का एक लंबा इतिहास रहा है। उनके जीवन चक्र को समाज अपनी इज़्ज़त और सम्मान से जोड़ता रहा है। यही कारण है कि इस क्षेत्र की महिलाओं और बालिकाओं को कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ता रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उनपर अनेकों बंदिशें लगाई जाती रही हैं। इज़्ज़त और मान सम्मान के नाम पर इस क्षेत्र में महिलाओं और किशोरियों की समस्याएं घर के अंदर ही घुट कर रह जाती हैं। आज भी पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को बहुत सी समस्याओं, चुनौतियों, परेशानियों से लड़ते हुए अपना जीवनयापन करते देखा जाता है। … पूरा पढ़ें

स्तन कैंसर: शर्म को पीछे छोड़ते हुए महिलाओं को अपने लिए आगे आना होगा

महिलाओं की स्थिति का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बिहार के एक ग्रामीण इलाके की रहने वाली कुसुमलता (बदला हुआ नाम) को स्तन कैंसर(Breast Cancer India) के कारण अपने स्तन हटवाने पड़े थे, क्योंकि उसकी जान पर बन आई थी। इस प्रक्रिया से उसकी ज़िंदगी तो बच गई लेकिन उसका जीवन और भी नरकीय हो गया। स्तनों के हटने के बाद उसके पति ने उसकी परवाह करना छोड़ दिया क्योंकि अब उसे अपनी पत्नी में प्यार नज़र नहीं आता था। इतना ही नहीं मुसीबत की इस घड़ी में उसका साथ देने की बजाए ससुराल वालों ने भी जहां उसका साथ छोड़ दिया वहीं महिलाएं ही उसे ताना देने लगीं क्योंकि अब वह उनकी नज़र में एक महिला नहीं रह गई थी।… पूरा पढ़ें

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महिलाओं के साथ भेदभाव करता है समाज

महिलाओं की स्थिति का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत में जन्म से ही महिला हिंसा के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। शहर हो या गांव, शिक्षित वर्ग हो या अशिक्षित, उच्च वर्ग हो या निम्न आर्थिक वर्ग, पैसे वाले हों अथवा दो वक्त की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ करने वाला परिवार, संगठित हो या असंगठित क्षेत्र सभी जगह महिला हिंसा की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष स्वरूप देखने को मिल जाता है। सभ्य और विकसित समाज में जहाँ आज महिलाएं अपने अस्तित्व की जंग लड़ने में सक्षम हो रही हैं, वहीं इस समाज में उन पर सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक हिंसा के प्रत्यक्ष उदाहरण प्रतिदिन देखने या सुनने को मिल ही जाते हैं। सच तो यह है कि यदि महिला अपराधों की जानकारी अखबारों में छपनी बंद हो जाये तो देश के सभी प्रमुख अख़बार 3-4 पन्नों में ही सिमट कर रह जायेंगे।… पूरा पढ़ें

बरसों से महिलाएं लॉकडाउन में रहती आई हैं!

उषा एक हाउसवाइफ हैं। उनका ज्यादातर समय घर के अंदर ही बीतता है। बाहर तभी जाना हो पाता है, जब कोई बहुत जरूरी काम हो। कोविड-19 के कारण भारत में 24 मार्च को लॉकडाउन का ऐलान किया गया। इतने बड़े देश में सभी से घरों में रहने की अपील खुद प्रधानमंत्री ने की। उषा भी तब से लेकर अब तक घर पर हैं। लेकिन उषा बताती हैं कि लॉकडाउन के इस ऐलान को लेकर शुरूआत में परिवार के बाकि लोग थोड़ा परेशान हो गए थे।… पूरा पढ़ें

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