लॉकडाउन में महिलाएं

बरसों से महिलाएं लॉकडाउन में रहती आई हैं!

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उषा एक हाउसवाइफ हैं। उनका ज्यादातर समय घर के अंदर ही बीतता है। बाहर तभी जाना हो पाता है, जब कोई बहुत जरूरी काम हो। कोविड-19 के कारण भारत में 24 मार्च को लॉकडाउन का ऐलान किया गया। इतने बड़े देश में सभी से घरों में रहने की अपील खुद प्रधानमंत्री ने की। उषा भी तब से लेकर अब तक घर पर हैं। लेकिन उषा बताती हैं कि लॉकडाउन के इस ऐलान को लेकर शुरूआत में परिवार के बाकि लोग थोड़ा परेशान हो गए थे।

उषा कहती है “जिस दिन लॉकडाउन का ऐलान हुआ घर के सभी लोग परेशान हो गए। एक तरफ तो कोरोना वायरस को लेकर डर बढ़ गया। दूसरी तरफ यह बात भी अटपटी लगने लगी कि अब सिर्फ घर में कैद रहना पड़ेगा। शुरूआत में तो पार्क और गली-मोहल्लें में भी निकलने पर पाबंदी थी। इसलिए घर पर लोग थोड़ा बेचैन महसूस करने लगे”।

करोड़ो महिलाएं हाउसवाइफ हैं और लंबे समय तक घरों में रहती हैं

कोविड-19 के संक्रमण को रोकने के लिए लगाया गया पूर्ण लॉकडाउन बेशक पूरे देश के लिए नया था। लोग सामान्यतः कभी इतने लंबे समय के लिए घरों में रहने पर मजबूर नहीं हुए थे। लेकिन उषा को इसकी सालों से आदत है। उषा जैसी तमाम महिलाएं जिन्हें हाउवाइफ गिना जाता हैं, वो ज्यादातर समय घर में ही रहती हैं। उनके लिए यह लॉकडाउन नया नहीं था। ऐसी अधिकतर महिलाओं को अपना ज्यादातर समय घर में बिताने की आदत सी पड़ जाती है। 

हालांकि घर में रहना हाउसवाइफ होने की शर्त नहीं हैं। लकिन हमारे समाज में एक ऐसा चलन बना दिया गया है कि हाउसवाइफ घरों में ही रहती हैं। गांव-देहात में अक्सर इसका तार पर्दा प्रथा से जुड़ा होता है। जिसमें घर की महिलाओं को बाहर निकलने की अनुमति नहीं होती है।

आज भी समाज में एक बड़ा तबका मौजूद है जो मानता है कि महिला भले ही पेशेवर कामकाजी हो, लेकिन घर के काम करना सिर्फ उसकी ही जिम्मेदारी है। और यह सोच गांव और छोटे शहरों में कई बार महिलाओं का बाहर निकल काम करने तक पर पाबंदी लगा देती है। नतीजा, महिलाएं चाहे या ना चाहे घरों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। 

ऐसे में, यह लॉकडाउन बहुतों के लिए नया था। लेकिन जो महिलाएं सालों से घरों में रहती आ रही हैं, उनके लिए यह लॉकडाउन पहने भी था और लॉकडाउन खुलने के बाद भी जारी रहेगा।

हाउसवाइफ का मतलब सिर्फ घर में रहना नहीं होता है

लॉकडाउन के बाद पूरा परिवार सिर्फ घर में रहने लगा है। ऐसे में,  ज्यादा दिनों के लिए एकसाथ रहने के कारण लोगों को घर में रहने वाली महिलाओं की तकलीफों का भी एहसास हुआ है। इस लॉकडाउन ने बहुत से लोगों को यह एहसास कराया है कि हाउसवाइफ होना सिर्फ घर पर रहना नहीं होता है। बल्कि यह 24 घंटे की जिम्मेदारी है। बिल्कुल वैसे ही जैसे पेशेवर कामकाज में लोगों पर कुछ घंटे अपने काम की जिम्मेदारी होती है।

बाहर रह कर जॉब करने वाले अनुज बताते हैं “मैं अक्सर घर के कामों को उतना सीरियसली नहीं लेता था। लॉकडाउन से पहले जहां मैं रहता था, वहां मेड खाना बना जाती थी। लेकिन होली में घर आया था और वापस नहीं जा पाया। इसी बीच लॉकडाउन शुरू हो गया। तब घर पर मम्मी के साथ रह कर एहसास हुआ कि घर के काम फुल टाइम जॉब से भी ज्यादा जिम्मेदारी और मेहनत का काम है”।

लॉकडाउन ने घर के कामों का बोझ बढ़ा दिया

जब लॉकडाउन ने लोगों को घरों में रहने के लिए मजबूर किया, तो लोग समय काटने के लिए अलग-अलग मनोरंजन के साधन और एक्टिविटिज खोजने लगे। लेकिन दूसरी तरफ इस लॉकडाउन से घर में रहने वाली महिलाओं पर काम का अतिरिक्त बोझ आ पड़ा। घर के सभी सदस्य घर पर रहने लगे। ऐसे में, घर के पुरुषों के काम पर जाने के बाद जो थोड़ा खाली समय उन्हें मिल पाता था, अब वो भी मिलना बंद हो गया।

जिससे यह लॉकडाउन घर में रहने वाली महिलाओं के लिए और बोझिल हो गया। इसके साथ ही कई ऐसी रिपोर्ट आई हैं जिनमें यह बताया गया कि कैसे लॉकडाउन में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव के मामलें बढ़ते गए हैं। ऐसे में, घर में रहने वाली महिलाओं के लिए यह लॉकडाउन एकसाथ कई मुसीबतें अपने साथ लेकर आया। घर के कामों में बढ़ोत्तरी, घरेलू हिंसा और साथ ही वायरस का खतरा।

यह सच है कि सभी हाउसवाइफ के साथ यह सभी समस्याएं नहीं हैं, लेकिन आधी आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन परेशानियों से रोज जूझ रहा है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे मुश्किल वक्त में हम दूसरे के कामों को इज्जत दें। घर के कामों में घर के सभी सदस्य अपना योगदान दें। हालांकि यह भी हकीकत है कि महिलाओं को घर के चाहारदीवारी की कैद से आजाद करना एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी। महिलाओं की स्थिति को देखने का नजरिया बदलना होगा। और इसके लिए जरूरी है कि शुरूआत हम अपने घर से करें और घर में रहने वाली महिलाओं को सम्मान दे। उन्हें भी जीवन के हर क्षेत्र में समान अवसर दें।

यह लेख जागृति राय द्वारा लिखा गया है, इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं।

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