सावधान!! डॉक्टर बनने से बचें, ये जानलेवा हो सकता है।

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“भाई कोलकाता का मेडिकल कॉलेज ले रहा हूं “

“अरे वाह बधाई हो, पर इतनी दूर क्यों? छत्तीसगढ़ का कॉलेज ले ले तेरी तो रैंक अच्छी है। वहां बंगाल में कैसे जमेगा, कल्चर और लैंग्वेज कि दिक्कत नहीं आएगी?”

“नहीं भाई, कॉलेज अच्छा है और कोलकाता शहर भी, सब ठीक ही होगा।”

ये धुंधला सा अंश है उस बातचीत का जो मेरे एक मित्र डॉ शिवम गुप्ता और डॉ यश टेकवानी के बीच 5 साल पहले कोटा में हुई थी। जी, वही डॉ यश जो 200 लोगों की भीड़ द्वारा अस्पताल में मारपीट किए जाने के कारण इस समय आईसीयू में गंभीर अवस्था में भर्ती हैं। अब पिछले 4 दिनों में घटित हुई घटनाओं को यहां दोहराना मुनासिब ना समझते हुए मै सीधे मुद्दे की बात पर आता हूं।

आप इस रिपोर्ट के टाइटल से भले इत्तेफाक न रखें पर पिछले 4 सालों में मेडिकल पेशे को करीब से देखने और खासकर पिछले 4 दिनों को देखने पर इस बार पर यकीन करना पड़ता है।

खुद सोचिए, 9 करोड़ लोगों का राज्य जिसकी स्वास्थ्य व्यवस्था चलाने वाले कुछ हज़ार डॉक्टर्स, जिनके बिना एक दिन भी काम न चले। पर उनपर जानलेवा हमला होता है और राज्य कि मुख्यमंत्री आईसीयू में संघर्ष कर रहे डॉक्टरों से मिलने की जगह उसी शहर में 5 सितारा होटल का उद्घाटन करना ज़्यादा ज़रूरी समझती हैं। मजबूरी में डॉक्टर्स हड़ताल करते हैं और तब सीएम साहिबा एक्शन में आती हैं, हड़ताली डॉक्टर्स को ‘बाहरी तत्व’ घोषित कर देती हैं, सारे मामले को बीजेपी आदी विरोधियों की साज़िश बता देती हैं और 4 घंटे में काम पर आने का धमकी भरा आदेश देकर जय जय कर लेती हैं। एक संवेदना का शब्द तक नहीं निकलता उनके मुंह से। शायद गलती उस ‘बाहरी’ की ही थी जो 5 साल पहले अपना घर छोड़ के उनके राज्य में डॉक्टर बनने आया था।

बात निकली है तो दूर तक जाएगी।

वर्तमान परिदृश्य में भारतीय चिकित्सकों कि स्थिति चिंता पैदा करती ही है, क्योंकि पानी अब सिर से ऊपर निकल चुका है। हर दूसरे दिन डॉक्टरों पर हिंसा का कोई ना कोई मामला निकल ही आता है। नामी जर्नल लैंसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है कि 75% भारतीय डॉक्टरों ने कार्यक्षेत्र में हिंसा का सामना किया है। हालांकि इसे वैश्विक रुख बताते हुए अमेरिका, चीन और ब्रिटेन में हो रही समान स्तर की घटनाओं का ज़िक्र किया गया है।

(Image source facebook)

इसके तह में जाने पर स्थिति और भयावह हो जाती है। काम के अनियमित घंटे, अस्पतालों पर बढ़ता दबाव, सुविधाओं की कमी और असुरक्षा के कारण डॉक्टर्स खुद डिप्रेशन का शिकार होते जा रहे हैं। पब्लिक से सीधे जुड़े होने के कारण डॉक्टर्स की जवाबदेही बहुत ज़्यादा होती है और चूंकि यहां रिस्क अति से भी ज़्यादा और गलती की गुंजाइश न के बराबर होती है, दिमाग पर दबाव भी हमेशा होता है। पर हमारा सिस्टम इस बात को कभी नहीं स्वीकारता, और डॉक्टर्स से भी क्लर्क आदि की तरह एक सरकारी कर्मचारी जैसा ही व्यवहार किया जाता है। याद रहे की गांव में सेवा देने को तत्पर एमपी सरकार द्वारा सालभर पहले ग्रामीण सेवा के लिए एक ग्रुप – D कर्मचारी से भी कम वेतन दिया जा रहा था, जिसे जूडा द्वारा हड़ताल करने पर बढ़ाया गया था।

पर कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। डॉक्टर्स से हो रहे अन्याय का सिलसिला बहुत पहले, तभी शुरू हो जाता है जब एक छात्र डॉक्टर बनने का फैसला करता है। भारत के किसी भी दूसरे प्रोफ़ेशनल एग्जाम को इस कदर भ्रष्ट नहीं किया गया है जितना पीएमटी को। हर साल लीक होते पेपर, रोज़ खुलते और बंद होते प्राइवेट कॉलेज, एमसीआई के भ्रष्टाचार के किस्से और सबसे बढ़कर हमारा अपना व्यापम इसका उदाहरण हैं।

गलती किसकी? उपाय क्या?

बिना लग लपेट के कहें तो मुख्य गलती तो सिस्टम की ही है। विभिन्न शोध पत्रों को पढ़ने पर पता चलता है कि जहां दूसरे देशों में हिंसा का मुख्य कारण प्राइवेट सेक्टर में खर्चीला इलाज या बीमा आदि का विवाद था, वहीं भारत में हिंसा डॉक्टरों नहीं, पब्लिक सेक्टर के अस्पतालों की अनियमितता के कारण होती पाई गई। लंबी लाइनें, घंटों की वेटिंग, समय पर जांच या दवा का ना मिलना, एवं संसाधनों कि कमी से जूझता गरीब मरीज़ गुस्सा तो सरकारी व्यवस्था पर होता है, पर उसका शिकार वहां उपस्थित मेडिको हो जाते हैं।

पर एक दफा खुद की गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए, क्यूंकि एक समय पर भगवान का दर्जा देने वाले जनता अगर हमलावर हो गई है तो कुछ तो गलती हमारी भी होगी ही.. दरसअल भारत में मुश्किल से 15 फीसदी डॉक्टर्स ही सरकारी सेक्टर में काम कर रहे हैं, बाकी प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे लोगों का एक वर्ग रुपया – केंद्रित व्यवस्था चला रहा है, जिससे औसत डॉक्टर की छवि को नुक़सान पहुंचा है। डॉक्टर्स के एक वर्ग की बढ़ती मुनाफाखोर प्रवत्ति, प्राइवेट सेक्टर का कॉरपोरेट कल्चर और मेडिकल शिक्षा का पैसे से प्रभावित ढांचा हमें अपनी कमियों की ओर ध्यान दिलाता है, जिसे सुधारे बिना किसी बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है।
जहां बात रही हमारे कार्यक्षेत्र और वहां की अव्यवस्था की, तो उसमें सुधार सरकारी हाथों में है, जिसके लिए सभी को सतत प्रयास करते रहने होंगे, तभी सो रही व्यवस्था जाग सकेगी।
शायद देशभर में उठा ये गुबार उसी की आहट है।

नोट: इस लेख में व्यक्त किये गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट नें इस लेख में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया है