श्रम कानूनों में बदलाव : 100 साल बाद फिर मज़दूरों को बंधुआ और दास बनाने का षड्यंत्र, मीडिया चुप क्यों ?

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Ground Report | News Desk UP

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने लॉकडाउन के बीच आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने के नाम पर तीन साल के लिए विभिन्न श्रम कानूनों से राज्य के उद्योगों को छूट देने के लिए एक अध्यादेश को मंजूरी दी है। हालांकि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी के बाद ही ये कानून बन पाएगा। विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे मजदूर विरोधी अध्यादेश बताया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में बीते बुधवार को हुई कैबिनेट की बैठक में अध्यादेश को मंजूरी देने का फैसला लिया गया। सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा कि विभिन्न व्यवसायों और उद्योगों को पुनर्जीवित करने और बढ़ावा देने के उद्देश्य से ये कदम उठाया गया है क्योंकि देशव्यापी लॉकडाउन के कारण इन पर काफी प्रभाव पड़ा है।

भारत के संविधान के तहत श्रम समवर्ती सूची (कन्करेंट लिस्ट) का विषय है, इसलिए राज्य को कानून बनाने से पहले केंद्र की मंजूरी लेनी पड़ती है। यूपी के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा- यूपी में 38 श्रम कानून लागू हैं लेकिन अध्यादेश के बाद किसी भी उद्योग के खिलाफ लेबर डिपार्टमेंट एनफोर्समेंट नियम के तहत कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस दौरान श्रम विभाग का प्रवर्तन दल श्रम कानून के अनुपालन के लिए अगले तीन साल तक कारखाने और फैक्ट्री में छापेमारी या जानकारी के लिए नहीं जाएगा।

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मज़दूर कानून पर काम करने वाले वकील रमाप्रिय गोपालकृष्णन कहते हैं कि यूपी सरकार द्वारा पारित किया गया यह कानून बहुत हैरान करने वाला है। यह हमें 100 साल पीछे ले जाएगा । यह कानून मज़दूरों के लिए दास प्रथा जैसी स्थिति पैदा कर देगा। इसे बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता यह कानून मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। इस कानून को कोर्ट में चुनौती देना ज़रूरी है।

श्रम विभाग में आठ कानून बरकरार

श्रम विभाग में 40 से अधिक प्रकार के श्रम कानून हैं, जिनमें से कुछ अब व्यर्थ हैं। अध्यादेश के तहत इनमें से लगभग आठ को बरकरार रखा जा रहा है, जिनमें 1976 का बंधुआ मजदूर अधिनियम, 1923 का कर्मचारी मुआवजा अधिनियम और 1966 का अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम शामिल है । राज्य सरकार द्वारा जारी बयान में यह भी कहा गया है कि महिलाओं और बच्चों से संबंधित कानूनों के प्रावधान जैसे कि मातृत्व अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, बाल श्रम अधिनियम और मजदूरी भुगतान अधिनियम के धारा 5 को बरकरार रखा है, जिसके तहत प्रति माह 15,000 रुपये से कम आय वाले व्यक्ति के वेतन में कटौती नहीं की जा सकती है।

कॉन्ग्रेस ने बताया काला कानून

कांग्रेस के यूपी चीफ अजय कुमार लल्लू ने गुरुवार को इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये मजदूरों के साथ विश्वासघात है। कोरोना की आड़ में तीन सालों के लिए श्रम क़ानून स्थगित करने का सरकार का फैसला पूंजीपतियों के आगे मजदूरों को ‘बंधुआ’ की तरह सौंप देना है। लल्लू आगे कहते हैं, ‘ऐसे नाजुक वक्त में मजदूरों को राहत देने के बजाय सरकार ने उनपर अपना तानाशाही फैसला थोपा है।’

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यूपी के लेबर लॉ एडवोकेट काशीनाथ मिश्रा बदले हुए श्रमिक कानून पर कहते हैं, ‘ये अध्यादेश श्रमिकों के हितों के खिलाफ हैं। इससे कई अहम श्रमिक कानून अब निष्प्रभावी हो गए हैं। इनमें मिनिममवेज (न्यूनतम मजदूरी) एक्ट काफी अहम है जिसके मुताबिक एक तय अमाउंट मजदूरों को देना कंप्लसरी (आवश्यक) किया जाता है। सभी उद्योग इसी के तहत ही श्रमिक व मजदूरों का पेमेंट करते हैं लेकिन अब सब अपनी सुविधानुसार करेंगे।’

इस कानून में किए गए बदलाव को लेकर लेबर लॉ एडवोकेट काशीनाथ कहते हैं, ‘इसके अलावा ट्रेड यूनियन एक्ट, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, इक्वल रिम्यूनिरेशन (समान पारिश्रमिक) एक्ट, जर्नलिस्ट एक्ट, बोनस एक्ट, प्रोविडेंट फंड से संबंधित एक्त समेत तमाम अहम एक्ट अब निष्प्रभावी हो गए हैं जिससे मजदूरों के हितों की रक्षा कैसे होगी । ‘

मीडिया ने नहीं दी इस ख़बर को प्रमुखता

इस अध्यादेश को पारित किए जाने के बीच खास बात ये रही कि बुधवार को ये पारित किया गया लेकिन सरकार की ओर से इसे ‘हाइलाइट’ नहीं किया गया जिस तरह से महामारी रोग नियंत्रण अध्यादेश को किया गया था। यहां तक की सरकार के किसी प्रवक्ता की ओर से भी इस पर कोई बयान नहीं दिया गया, वहीं स्थानीय मीडिया में भी मजदूरों के अधिकारों के रक्षा के इतर चर्चा ‘महामारी रोग नियंत्रण अध्यादेश’ की ही रही ।

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2 thoughts on “श्रम कानूनों में बदलाव : 100 साल बाद फिर मज़दूरों को बंधुआ और दास बनाने का षड्यंत्र, मीडिया चुप क्यों ?”

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  2. The bestial lust for profit is the ‘motif force’ of capitalism. Now that was reducing drastically in first decade of the present century. The bourgeois class helped RSS/BJP to penetrated 2013-14 JLPB movement and ride to power, through massive investment of capital, propaganda, religiosity and national chauvinism.
    Capitalism has changed its hidden democratic mask into fascism. The rest we are witnessing.

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