Women’s Day : अस्मिता बचाने को ‘महिला शक्ति की मिसाल’ का जवाब थीं वो दलित महिला

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Vikas Dayal | Opinion

महिला को अक्सर एक सरल स्वभाव माना जाता है लेकिन फूलन देवी (Phoolan Devi) बिल्कुल इसके उलट थीं। बीहड़ की रानी नाम केवल ऐसे ही नहीं पड़ा अगर फ़ूलन देवी के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो हम देखते हैं एक दलित (Dalit) परिवार और अपरिपक्व उम्र में शादी रूढ़ीवादी व्यवस्था की घोतक घाटी में आक्रोशित डाकुओं के शोषण और अनेक बार बलात्कार की शिकार बैंडिट क्वीन (Bandit Queen) फूलन देवी ने अपने साथ हुए अन्याय को लेकर बदले आक्रोश में 22 ठाकुरों को लाइन में खड़ा कर बहमई गांव में गोली मार कर बड़ी मिसाल पेश की। फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव अगोहा में हुआ था।

महिला शक्ति के रूप में ये देश में अपने साथ हुए गैंगरेप जैसे जघन्य अत्याचार को लेकर अपनी अस्मिता और सम्मान को बचाने के लिए किए गए इस कार्य को लेकर घाटी में गब्बर से खतरनाक डाकू की संज्ञा से फूलन देवी का नाम जाना जाने लगा था।


उस वक्त की कई राज्यों की मौजूदा सरकारें काफी परेशान थी सरकार से फांसी ना देने के समझोते पर फूलन देवी ने आत्मसमर्पण कर दिया इस घटनाक्रम के बाद फूलन देवी ने समाजवादी पार्टी से मिर्जापुर सीट से सांसद बन कर नयी पारी की शुरुआत की थी।

लेकिन फूलन के बढ़ते स्वरूप से राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट थी जिसके चलते उनकी दिल्ली स्थित आवास पर कुछ हमलावरों ने गोलीबारी की जिससे एक गोली उनके माथे जा लगी फूलन देवी का एक गार्ड भी घायल हो गया।

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इसके बाद हत्यारे उसी कार में बैठकर फरार हो गए जिस कार में वो आए थे, यह एक राजनीतिक हत्या थी या कुछ और पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लग पाया, इसके बाद सामने आया शेर सिंह राणा का नाम, जिसने कत्ल के बाद खुद दुनिया के सामने कहा, ‘हां, मैंने फूलन को मारा है, ये कहा जाता रहा है एक महिला अपना सम्मान बचाने के लिए महिला द्वारा उठाया गया कदम ही महिला शक्ति को दर्शाता है।

आमतौर पर फूलनदेवी को डकैत के रूप में (रॉबिनहुड) की तरह गरीबों का पैरोकार समझा जाता था। सबसे पहली बार (1981) में वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में तब आई जब उन्होने ऊँची जातियों के बाइस लोगों का एक साथ तथाकथित (नरसंहार) किया जो (ठाकुर) जाति के (ज़मींदार) लोग थे। लेकिन बाद में उन्होने इस नरसंहार से इन्कार किया था।

बाद में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार तथा प्रतिद्वंदी गिरोहों ने फूलन को पकड़ने की बहुत सी नाकाम कोशिशे की। इंदिरा गाँधी की सरकार ने (1983) में उनसे समझौता किया की उसे (मृत्यु दंड) नहीं दिया जायेगा और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा और फूलनदेवी ने इस शर्त के तहत अपने दस हजार समर्थकों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

बिना मुकदमा चलाये ग्यारह साल तक जेल में रहने के बाद फूलन को 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने रिहा कर दिया। ऐसा उस समय हुआ जब दलित लोग फूलन के समर्थन में गोलबंद हो रहे थे और फूलन इस समुदाय के प्रतीक के रूप में देखी जाती थी। फूलन ने अपनी रिहाई के बौद्ध धर्म में अपना धर्मातंरण किया। 1996 में फूलन ने उत्तर प्रदेश के भदोही सीट से (लोकसभा) चुनाव जीता और वह संसद तक पहुँची। 25 जुलाई सन 2001 को दिल्ली में उनके आवास पर फूलन की हत्या कर दी गयी।

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्‍ली के तिहाड़ जेल में कैद अपराधी शेर सिंह राणा ने फूलन की हत्‍या की। हत्‍या से पहले वह देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़ जेल से फर्जी तरीके से जमानत पर रिहा होने में कामयाब हो गया। हत्‍या के बाद शेर सिंह फरार हो गया।

नोट : लेखक विकास दयाल IIMC नई दिल्ली के पूर्व छात्र एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। यह उनके निजी विचार है।

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