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भोपाल के हर व्यक्ति का वोट भारत की दिशा तय करने में महत्वूर्ण क्यों है?

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विचार।। चुनाव का दौर है, और अपने देश में कितनी ही झक मार लो, जात धर्म का चक्कर निकल ही आता है, या कहें की निकाल लिया जाता है।

2019 का चुनाव धर्मयुद्ध की तरह प्रचारित किया जा रहा है.. खासकर बीजेपी द्वारा। भारत में धर्म, पार्टियों को ध्रुवीकरण का भरपूर स्कोप देता है, जिससे एकमुश्त वोट पड़ते हैं और जीतने की संभावना बढ़ जाती है।

मप्र में भोपाल की सीट से प्रज्ञा सिंह ठाकुर को टिकट देकर बीजेपी ने जैसे ध्रुवीकरण का ब्रह्मास्त्र चला दिया है। कई फायरब्रांड नेता आये और गये,पर प्रज्ञा का केस अलग है.. वे मालेगांव आतंकी बम धमाके की मुख्य आरोपी है और अभी ज़मानत पर हैं। वहीं सामने कांग्रेस के दिग्विजय सिंह है, जिनपर बीजेपी मुस्लिमपरस्त होने और हिन्दू आतंकवाद शब्द को ईजाद करने का आरोप लगाती है। बीजेपी को भरोसा है की ध्रुवीकरण होगा और बहुसंख्यक हिन्दू आबादी धर्म के नाम पर उसके लिए वोट करेगी, ऐसे में भोपाल के वोटर पर देश में कौनसी विचारधारा चलेगी,ये तय करने का बड़ा दारोमदार है। और विचारधारा की इस लड़ाई में प्रज्ञा ठाकुर का जीतना एक दुस्वप्न ही होगा पर मेरी नज़र में प्रज्ञा ठाकुर क्यों एक सही उम्मीदवार नही है ये स्पष्ट कर देना ज़रूरी है।

क्या धर्म का इस्तेमाल सही है?

हर चुनाव में दक्षिणपंती पार्टियां धर्मान्धता की आग को हवा देने की कोशिश करती है,पर इसमे उन्हें सीमित सफलता ही मिलती रही है। राममंदिर आंदोलन के शिखर दिनों में भी बीजेपी एक तिहाई सीटों तक ही पहुँच पायी थी। पर इस बार बीजेपी ने बड़ा दांव खेला है। मकसद है आतंकवाद की आरोपी को उम्मीदवार बनाकर जनता की अदालत में खड़ा करना और इसे हिन्दू धर्म के खिलाफ साजिश बताकर वोट, और अपनी विचारधारा के लिए समर्थन हासिल करना। भले ही आरोप सिद्ध ना हुए हों, पर वे निर्दोष भी सिद्ध नहीं हुई हैं। खास बात ये है कि उम्मीदवार बनने से पहले वे बीजेपी की सदस्य तक नहीं थी,उनका चुनाव के ठीक पहले पैराशूट से उतारा जाना बीजेपी की ध्रुवीकरण के लिए बीजेपी के उतावलेपन को रेखांकित करता है, प्रज्ञा को भोपाल जैसी सेफ सीट उतारकर बीजेपी उनकी जीत सुनिश्चित करना चाहती है जिससे उनकी हिंदुत्व के खिलाफ साजिश के सिद्धांत पर मोहर लग जाए।

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नुकसान हिन्दू धर्म का ही है..

पूरी दुनिया अब सांप्रदायिक आतंकवाद के खतरे को जान चुकी है। खासकर पश्चिम और अरब में धर्म का हिंसा के लिए और राजनीतिक तत्व के रूप में बहुत इस्तेमाल हुआ। मुस्लिम बनाम यहूदी बनाम ईसाई के झगड़ो ने लाखों की जाने ली और आज भी फिलिस्तीन जैसे बड़े राजनीतिक मसलों का कारण बना हुआ है। भारत सहित पूर्वी दुनिया इस तरह के अतिवाद से 20 सदी तक सुरक्षित रहा,और यहां सभी धर्मो को फलने फूलने का मौका मिला, इसके मूल में हिन्दू, बौद्ध आदि धर्मो के मूलतः अहिंसवादी विचार और ईश्वर की निजी व्याख्याओं के प्रति आग्रह था, पर समय के साथ अतिवादी तत्व हावी होते गए और आज हम देखते है की बुद्ध को मानने वाले म्यांमार में नस्लीय हिंसा चरम पर है।

भारत में भी अतिवाद अपनी जड़ें जमा चुका है जो एक बड़ी और औसतन उदार हिन्दू आबादी के सामने अभी तक विफल है,पर प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसे लोगो पर जब आतंकवाद आरोप लगते है, तब आने वाले खतरे का एहसास होना चाहिए क्योंकि अतिवाद से आतंकवाद का रास्ता तभी सफल होता है,जब आम जनता उसका विरोध करना बंद कर दे। आम जनता की सहानुभूति ही अतिवाद का ईंधन है। हमारे पास उदाहरण सामने है, किस तरह इस्लामिक जिहाद को पाकिस्तान आदि मुस्लिम बहुल देशों में समर्थन मिल रहा है,जिसका खामियाजा पाकिस्तान को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए, पुनः कहना ज़रूरी है कि यदि हिन्दू धर्म को सबसे बड़ा खतरा इन्हीं अतिवादी शक्तियों से है, और ऐसे समय में जब भारत की तथाकथित सेक्युलर पार्टियां वंशवाद का दंश झेल रही हों और खुद को जनेऊधारी साबित करने पर तुली हों, अंतिम आशा आम जनता से ही की का सकती है, जो इस समय भोपाल की जनता से की जा रही है। उनके द्वारा दिया गया हर वोट, अतिवाद की उसी घातक विचारधारा को मान्यता देगा साथ ही इस समय पूरी दुनिया भोपाल की तरफ नज़रें गड़ाए बैठी है, और आपका हर वोट, दुनिया को भारत के भविष्य का सीधा संदेश देगा

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इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट ने इस लेख में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया है।