कोरोना के दौरान परीक्षा को लेकर छात्रों का विरोध और चिंता

  • Ashwani 
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कोरोना को मद्देनजर रखते हुए लगभग 15 मार्च से भारत में लगभग सभी विश्वविद्यालय में पढ़ाई रुक जाती है और छात्र इस दौरान अपने घर की ओर वापस लौट आते हैै। जो बाकि हॉस्टल में रह जाते है उनसे भी धीरे-धीरे छात्रावास खाली करा लिया जाता है। संक्रमण बढ़ने की वजह से यह 15 दिन के लिए कॉलेज का बंद होना अब लगभग 4 महीने में बदल चुका है। इस दौरान ऑनलाइन क्लास और असाइनमेंट जमा होते है। ग्रामीण क्षेत्रों में धीमा नेट, सीमित इंटरनेट और गरीबी और असमानता जैसी समस्याओं को कोरोना उजागर कर देता है।

इन सब के बीच 6 जुलाई को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) दिशा-निर्देश जारी करता है। जिसके अनुसार विश्वविद्यालयों को कोविड-19 महामारी के मद्देनजर सितंबर के अंत तक अंतिम वर्ष की परीक्षाएं अनिवार्य रूप से आयोजित करने लिए कहता है। यह परीक्षा ऑनलाइन और ऑफलाइन या दोनों तरीकों से कराई जा सकती है।

यूजीसी अपने निर्णय के पक्ष में कहता है कि परीक्षा देने से अकादमिक विश्वसनीयता बढ़ती है और छात्रों को समान अवसर मिलता है। छात्रों में संतुष्टि और आत्मविश्वास का भाव भी पैदा होता है।

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यूजीसी के दिशा निर्देश का विरोध

कोरोना संक्रमण के हर रोज 40,000 हजार से ज्यादा मामले आ रहे हैं और अब तक कुल मामले लगभग 13 लाख से ज्यादा हो चुके हैं। ऐसे में यूजीसी की गाइडलाइन का विरोध होता है। केरल इंजीनियरिंग आर्किटेक्चर मेडिकल की परीक्षा देने वाले 88 हजार से ज्यादा छात्रों में से कम से कम पांच छात्र कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए।

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इसको देखते यूजीसी के दिशा-निर्देशों के खिलाफ छात्र सोशल मीडिया ट्विटर और फेसबुक से अपना विरोध करते है। देखते-2 यह ट्रेंड करने लग जाता है। विपक्ष के नेता भी इसको वापस लेने के लिए कहते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह तो केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख चुके हैं। ओडिशा, तमिलनाडु और राजस्थान इस गाइडलाइन के खिलाफ आपत्ति जता चुके हैं।

इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में दिल्ली विश्वविद्यालय(डीयू) के छात्र कबीर सचदेव याचिका करते है। इस पर हाई दिल्ली हाई कोर्ट ने केन्द्र सरकार, यूजीसी और दिल्ली विश्वविद्यालय से जवाब मांगा।

इसी याचिका की सुनवाई में शुक्रवार को हाई कोर्ट ने डीयू में होने वाली ऑनलाइन परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए काॅमन सर्विस सेंटर को नोटिस जारी कर तैयारियों का ब्यौरा मांगा है। इस सेंटर के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में जिन छात्रों के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है उनके लिए ऑनलाइन परीक्षाओं का संचालन होना है।

इस पर सुनवाई के दौरान यूजीसी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए और उन्होंने जवाब में कहा कि यूजीसी के दिशा-निर्देश को चुनौती देने वाली याचिका गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुचीबद्ध हुई थी। इसे फिर से 27 जुलाई को सूचीबद्ध करने की संभावना है।

यूजीसी की गाइडलाइन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी 31 छात्रों के एक समूह ने हाल ही में याचिका दायर की है।

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विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों की परेशानी

संगीत जो कि डीयू में एमए राजनीति विज्ञान में अंतिम वर्ष की छात्रा है। उनका कहना है कि आए दिन क्लास के ग्रुप में ग्रामीण क्षेत्र और उत्तर पूर्व राज्य से संबंधित बच्चे अपने धीमा नेट और बिजली से जुड़ी समस्या बताते हैं। इसको लेकर भारतीय सांख्यिकी आयोग में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिरूप मुखोपाध्याय भी अपने लेख के जरिए बताते है कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे शहरी परिवारों के 85 प्रतिशत बच्चों के पास इंटरनेट की पहुंच है जबकि ग्रामीण परिवारों से संबंधित बच्चों में केवल 51 प्रतिशत लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच है।

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निखिल, इतिहास होनर्स (आर्यभट्ट काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) के छात्र बताते है कि मॉक टेस्ट के दौरान पोर्टल क्रेश हो जाता है। पेपर अपलोड नहीं होते और दूसरे कोर्स का पेपर आ जाता है। ऐसे ही 3 घंटे बीत जाते है अगर ऐसा ही रहा तो परीक्षा के समय पेपर कर पाना मुश्किल है। ओपन बुक एग्जामिनेशन की तारीख बार-2 आगे बढ़ने से भी बच्चे परेशान हैं। मध्य प्रदेश से सिर्फ दिल्ली में पढ़ाई करने आया था। इस समय तो भोपाल में लाॅकडाउन भी लगा ऐसे समय में जाना तो संभव नहीं है। सब पढ़ने की किताब तो पीजी में ही छुट गया है ऐसे में परीक्षा में काफी दिक्कत होगी।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एमए अंतिम वर्ष के छात्र सिद्धार्थ बताते है कि की बच्चे है जो कि गांवों से आते है। यह सब लोग क्लास भी नहीं ले पाते। समय-समय पर सर और दोस्तों को फोन करके अपनी समस्या बताते है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से प्रस्तावित फाइनल इयर की परीक्षा को लेकर छात्रों में नाराजगी है। छात्रों ने ट्विटर और फेसबुक के जरिए कोरोना काल में परीक्षाओं को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन का विरोध किया।

आगे क्या होगा?

यूजीसी एक्ट(1956) के तहत गाइडलाइन को मानना सभी राज्यों के लिए जरूरी है। साल 2003 के यूजीसी रेगुलेशन के तहत विश्वविद्यालयों को आयोग द्वारा जारी किए गए परीक्षा संबंधित दिशानिर्देश समय-समय पर अपनाने पड़ेंगे। यूजीसी संवैधानिक निकाय है। यूजीसी के मुताबिक 818 विश्वविद्यालयों में से 603 ने अंतिम वर्ष की पहले ही ले चुके हैं या आयोजित करने की तैयारी में है।

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न्यायालय इस पर क्या कहता है यह देखना होगा।

यह लेख अश्वनी पासवान के द्वारा लिखा गया है. अश्वनी, भारतीय जान संचार संसथान दिल्ली से पत्रकारिता के छात्र रह चुके हैं.

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