विचार: माओवादियों के समर्थन के पीछे राहुल गांधी की क्या है मजबूरी?

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विचार, राजेश पाठक (RSS विचारक)

पिछले दिनों एनडीए की सरकार ने जब पांच नक्सली ‘बुद्धिजीवीयों’ को गिरफ्तार किया तो वामपंथियों के साथ –साथ जिनकी ओर से इस कार्यवाही का सबसे मुखर विरोध आया वो थे अपने राहुल गाँधी।

वैसे अच्छा होता ये कदम उठाने से पहले वे अपने ही दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से थोड़ी चर्चा कर लेने की कम से कम इस बार तो परिपक्वता दिखा देते। बहरहाल, इन पंक्तियों को पढ़ें-

“ माओवादीयों से सम्बन्ध के आरोप में गिरफ्तार लोगों को राहुल ने जैसा समर्थन दिया है उससे उनकी पार्टी भी चकित है। गिरफ्तार लोगों में से चार को तो यूपीए सरकार ने गिरफ्तार किया या पाबंदियां लगायी थी। एक ने छः तो दूसरे ने सात साल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बिताये।

इनके आलावा कोबाड गाँधी और जीएन साईबाबा दोनों को यूपीऐ ने बंदी बनाया था, जो अब भी कारावास में हैं। उन्ही की सरकारी एजेंसीयों ने दो प्रमुख नक्सलीयों, आजाद और किशनजी को ख़त्म कर दिया था। डा.मनमोहन सिंह ने २००६ में देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए नक्सलीयों को गंभीरतम खतरा बताया था।

हालांकि कई व्यक्तियों और समूहों ने सोनिया गाँधी से नज़दीकी के चलते तत्कालीन ग्रहमंत्री पी.चिदंबरम के कड़े नक्सल विरोधी रुख को रोकने का अभियान चलाया था। चिदंबरम ने ये अभियान सुरक्षा बलों पर हुए कुछ बड़े हमलों के बाद शुरू किया था। जब सुरक्षा बल नक्सलीयों पर भारी पड़ने लगे तभी मणिशंकर अय्यर ने इस नीति को एकतरफ़ा बताया था।

एक प्रमुख नक्सली की पत्नी को अपह्रत आईएएस अधिकारी के बदले रिहा किया गया और वह [सोनिया गाँधी द्वारा नियुक्त] राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे हर्ष मंदर के एनजीओ की प्रमुख निकलीं।

देशद्रोह के आरोप में अभियुक्त विनायक सेन को योजना आयोग की स्वाथ्य समिति में[सोनिया गाँधी द्वारा] शामिल किया गया” ये बात ख्याति प्राप्त पत्रकार शेखर गुप्ता[ एडिटर-इन-चीफ, द प्रिंट’] ने दैनिक भास्कर में लिखे अपने लेख में कही।

कुछ दिन पूर्व तेलंगाना के पूर्व मुख्य मंत्री चंद्रशेखर राव का एक बयान आया था कि- “राहुल गाँधी सबसे बड़े मसखरे हैं, और उनका कांग्रेस के शीर्ष पर बने रहना विपक्षीयों की सबसे बड़ी पूँजी है”

यदि राहुल गाँधी ऐसे ही राजनीती करते रहेंगे तो उनके प्रति जनमानस में बनी धारणा कभी बदल पायेगी वो इसकी उम्मीद छोड़ दें तो ही अच्छा है। वैसे एक सच्चाई ये भी है कि विकास विरोधी मओवादीयों ने बस्तर में चल रहे मिशनरीज़ के तमाम स्कूल, अस्पताल और छात्रावासों पर आज तक हमले नहीं किये। जबकि वहीँ उड़िसा के कंधमाल जिले में जेविक खेती, गौपालन, शिक्षा के केन्द्रों का संचालन कर वनवासीयों का जीवन स्तर उठा देने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद की चर्च के इशारे पर वे[माओवादी]हत्या कर देते हैं। इन सब घटनाओं को देख कर लगता है कि हो सकता है माओवादीयों के समर्थन के पीछे राहुल गाँधी की कुछ और मजबूरी रही हो।

NOTE: इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह से लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट द्वारा इस लेख में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। हम अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि मानते हैं