pushpa ganediwala reappointed as judge after her controversial judgement on POCSO act

पुष्पा गणेदीवाला का कार्यकाल बढ़ाया गया, एक फैसले में कहा था ‘कपड़े उतारे बिना स्तन छूना यौन उत्पीड़न नहीं’

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न्यायमूर्ति पुष्पा गणेदीवाला (Pushpa Virendra Ganediwala) उस समय चर्चाओं में आईं जब उन्होंने एक व्यक्ति को POCSO एक्ट (बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण वाला कानून) में यह कहते हुए बरी कर दिया था कि उसने पीड़िता को कपड़ों के ऊपर से स्पर्श किया है इसलिए यह यौन अपराध के तहत नहीं आता। यौन उत्पीड़न को लेकर उनकी व्याख्या की देश भर में आलोचना हुई थी।

पुष्पा गणेदीवाला के दो विवादित फैसले-

पहला मामला

न्यायमूर्ति गणेदीवाला (Pushpa Virendra Ganediwala) ने हाल ही में एक व्यक्ति को 12 साल की एक लड़की को बुरा स्पर्श करने के मामले में यह कहते हुए बरी कर दिया था कि उसने कपड़ों के ऊपर से उसे स्पर्श किया था।  स्किन- टू -स्किन- कॉन्टेक्ट ‘ के बिना बच्ची की ब्रेस्ट को टटोलना भारतीय दंड संहिता के तहत छेड़छाड़ होगा, लेकिन यौन अपराधों  से बच्चों के संरक्षण अधिनियम POCSO के तहत ‘यौन हमले’ का गंभीर अपराध नहीं।

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उच्चतम न्यायालय ने व्यक्ति को बरी करने के बंबई उच्च न्यायालय के फैसले पर 27 जनवरी को रोक लगा दी थी। दरअसल, अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने शीर्ष न्यायालय से कहा कि उच्च न्यायालय का यह आदेश गलत उदाहरण स्थापित करेगा।

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दूसरा मामला

दूसरे मामले में फैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा था कि पांच साल की बच्ची का हाथ पकड़ना और पैंट की ज़िप खोलना, POCSO के तहत यौन हमला नहीं है।

उच्चतम न्यायलय ने नियुक्ति पर लगाई थी रोक फिर भी बढ़ा कार्यकाल

पिछले महीने उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति गणेदीवाला के दो विवादास्पद फैसलों के बाद उन्हें अदालत की स्थायी न्यायाधीश नियुक्त करने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी वापस ले ली थी। लेकिन इसके बाद भी उनका कार्यकाल एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है। सरकार ने शुक्रवार को एक अधिसूचना जारी कर कहा कि उन्हें एक साल के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर एक नया कार्यकाल दिया गया है।

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क्या है POCSO ACT?

बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की घटनाओं को रोकन के लिए सरकार ने वर्ष 2012 में एक विशेष कानून बनाया था। POCSO कानून यानी की प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 जिसको हिंदी में लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012 कहा जाता है।

POCSO अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग से छेडछाड़ की जाती है, इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर 5 से 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।

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