अगली बार अमित शाह का भाषण कहीं सुनें तो इन बातों पर ज़रूर गौर कीजियेगा

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न्यूज़ डेस्क।। रफाल डील, महंगाई, बेरोज़गारी, पेट्रोल- डीज़ल की बढ़ती कीमतें, गिरते रुपये और नोटबंदी की नाकामयाबी पर चौतरफा घिरी बीजेपी के बयानों और रैलियों में नेताओं के भाषणों में एक खास अंतर नज़र आ रहा है। जब भी आप अगली बार किसी भाजपा नेता को टीवी पर देखेंगे तो इन बातों पर ज़रूर गौर कीजियेगा।

हमने यहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की हाल ही में हुई कुछ रैलियों का विश्लेषण किया और पाया कि उनकी हर रैली में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा अहम होता है।

23 सितंबर को दिल्ली में अमित शाह ने कहा कि घुसपैठिये देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं। लोगों की नौकरियां घुसपैठियों को मिल रही है। NRC में दर्ज 40 लाख अवैध घुसपैठियों को हम देश से बाहर करेंगे। राहुल और केजरीवाल अपना रुख साफ करें।

11 सितंबर को जयपुर में अमित शाह ने कहा असम में बड़ी तादात में मौजूद घुसपैठियों को बाहर करेंगे। 11 अगस्त को कोलकाता में अमित शाह ने अवैध घुसपैठियों को लेकर ममता बनर्जी को निशाना बनाया। मुगलसराय और राजसमंद में भी अमित शाह ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।

रविशंकर प्रसाद और संबित पात्रा को जब रफाल के बचाव के लिए उतारा गया तो उन्होंने कांग्रेस को पाकिस्तान परस्त बताया। यहां गौर करने वाली बात यह है की भाजपा के नेताओं को अचानक बांग्लादेश और पाकिस्तान क्यों याद आ रहा है। अगर आप अपने व्हाट्सएप संदेशों पर भी ध्यान देंगे तो वहां भी बांग्लादेश और पाकिस्तान छाए हुए दिखाई देंगे।

ऐसा नहीं है कि असम में NRC का मुद्दा अहम नहीं है। सवाल यह भी नहीं कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजना चाहिए या नहीं। क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है। असम में NRC के ज़रिए अवैध नागरिकों की पहचान का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है। असम के एक संगठन ने जनहित याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से इसकी मांग की थी। फिर भाजपा क्यों इसका श्रेय लेने के लिए इतनी उतावली दिख रही है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बिना इस मामले में पत्ता तक नहीं हिल सकता। यह वैसा ही है जैसा राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बिना नहीं बन सकता। बांग्लादेश के सूचना मंत्री हसनुल हक़ ने भी यह स्पष्ट किया कि भारत सरकार ने घुसपैठियों को वापस भेजने के संबंध में कोई आधिकारिक बात नहीं की है। फिर सवाल उठता है आखिर किस आधार पर अमित शाह रैलियों में यह कह रहे हैं कि घुसपैठियों को बांग्लादेश भेजा
जाएगा। ऐसा क्या है इस मुद्दे में जो इसे बेरोज़गारी, महंगाई और अन्य तमाम मुद्दों से ज़्यादा तरजीह दी जा रही है? क्या इसमें बीजेपी की कोई सोची समझी रणनीति है?

दरअसल चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियां असल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए उन मुद्दों को हवा देती हैं, जिनसे जनता भावनात्मक तौर पर जुड़ी हो। अवैध घुसपैठियों का मुद्दा भी वैसा ही है। लोगों को आसानी से यह यकीन दिलाया जा सकता है कि दूसरे देश के लोग उनके देश की सुरक्षा के लिए कितने खतरनाक है। बेरोज़गारी से त्रस्त जनता को यह आसानी से समझ आता है कि शायद इन घुसपैठियों ने ही हमारी नौकरी खाई है। सारी परिस्थितियों को एक मुद्दे के इर्द गिर्द घुमाने की कोशिश की जाती है। और फिर जनता को यकीन दिलाया जाता है कि इस समस्या को अगर कोई खत्म कर सकता है तो वो हमारी ही पार्टी है।

भाजपा भी इसी रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा और देश भक्ति की भावनाओं का इस्तेमाल करके बांग्लादेशी घुसपैठियों के मामले को हर समस्या की जड़ बता दिया जाएगा। और हर तरह से यह प्रचार किया जाएगा कि केवल भाजपा ही इस समस्या का निराकरण कर सकती है। इसी के तहत अन्य विपक्षी पार्टियों को पाकिस्तान और बांग्लादेश परस्त बताया जा रहा है। जबकि अगर असम में NRC की बात की जाए तो इसको हरी झंडी UPA के कार्यकाल में ही मिली थी। अगर इसका श्रेय किसी को जाता है तो केवल सुप्रीम कोर्ट को जो अपनी निगरानी में इस पूरी प्रक्रिया को संचालित कर रहा है। कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने वोट बैंक के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करती रही हैं।