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आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करना कितना सही

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वर्तमान की बीजेपी की सरकार के विरुद्ध जो बात पहले दिल्ली के आर्चबिशप अनिल कूटो, फिर गोवा और दमन के आर्चबिशप फिलिप नेरी फेररो ने कही थी उसी बात को अब राहुल गाँधी ने, उन्ही दोनों की मंशा को पूरा करते हुए, अपने तरीके से आर.एस.एस. की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करते हुए कही है। वैसे मुस्लिम ब्रदरहुड की तरह पूरी दुनिया को अपने मत-पंथ में बदल कर अपने अनुसार और कौन चलाना चाहता है , राहुल गाँधी यदि इसाई धर्म प्रचारकों का इतिहास इमानदारी से पढ़ लेते तो उनको विचार कुछ और ही होते।

इतिहास से सीखना चाहिए सबक

इतिहास साक्षी है कि सम्पूर्ण ईसाई जगत और विशेषकर अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार वा उसको मजबूती प्रदान करने में ईसाई प्रचारकों की सदा से महत्ती भूमिका रही है। इस भूमिका का निर्वाह उन्होंने स्थानीय वासियों का मत परिवर्तन कर उनमें अपनी माटी, अपने पूर्वजों के रीती-रिवाज व सम्पूर्ण संस्कृति के प्रति अश्रद्धा का भाव निर्मित करके किया. ईसाई –प्रचारकों कि इस सामरिक महत्व को समझते हुए ही भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर अंग्रेजों नें वनवासी बाहुल्य पूर्वोत्तर प्रदेशों में ईसाई- प्रचारकों व अंग्रेज अधिकारियों को छोड़कर बाकी सब के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था. आज मिजोरम, नागालैंड अदि प्रदेशों में ८०-९०% पाई जाने वाली ईसाई जनसँख्या और उनमें राष्ट्रीय एकात्मता का आभाव तब ईसाई प्रचारकों को मिली छूट का ही परिणाम है।

वैसे इस प्रकार के परिणाम को स्वामी विवेकानंद नें बहुत पहले ही भांप लिया था। और उन्हें कहना पड़ा-“बच्चा जब भी पढ़ने को [ईसाई मिशन] स्कूल भेजा जाता है, पहली बात वो ये सीखता है कि उसका बाप बेवकूफ है। दूसरी बात ये कि उसका दादा दीवाना है, तीसरी बात ये कि उसके सभी गुरु पाखंडी है और चौथी ये कि सारे के सारे धर्म-ग्रन्थ झूठे और बेकार है .” -[संस्कृति के चार अध्याय- रामधारी सिंह दिनकर]

बिरसा मुंडा को करना पड़ा था ईसाई मत स्वीकार

और तो और ईसाईकरण के इस मार्ग में जो बाधा बनकर खड़ा होता उसकी ईसाई मिशनरीज़ के हाथों क्या दुर्गत होती इसको समझने के लिये एक बिरसा मुंडा का प्रसंग काफी है। झारखण्ड का ये वनवासी क्रन्तिकारी जब बड़ा हुआ और आगे अपनी शिक्षा पूरी करने के लिये चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल एडमिशन लेने पहुंचा तो वह इसमे तभी सफल हो सका जब उसके समेत उसके पूरे परिवार ने ईसाई मत स्वीकार नहीं कर लिया। इस काम को अंजाम देने वाले ईसाई पादरी नें उसका नाम बदल कर अब बिरसा डेविड कर दिया। पर पढाई पूरी कर लेने के उपरांत बिरसा का संपर्क तब के प्रसिद्ध संत श्री आनंद पांडे से हुआ और उनका झुकाव पुनः हिंदुत्व कि ओर हो उठा। यहाँ तक कि वो चार वर्षों के एकांत वास में रहते हुए कठोर साधना में डूब गये, और जब इससे बाहर निकले तो उनका पूर्ण रूपांतरण हो चुका था। बिरसा मुंडा पीली धोती, लकड़ी कि खडाऊँ, ललाट पर तिलक तथा यज्ञोपवित धारण किये हुए एक हिन्दू महात्मा हो चुके थे। फिर क्या था, उनको देख बड़ी संख्या में ईसाई हो चुके वनवासी पुनः हिन्दू-धर्म में वापस लौटने लगे। ईसाई मिशनरीज़ को जब इस चुनौती का कोई हल नहीं मिला तो उन्होंने रांची के तत्कालीन कमिश्नर के साथ मिलकर षडयंत्रपूर्वक बिरसा को बंदी बनवाकर जैल में डलवा दिया। फिर दो साल बाद जैल से छूटकर अपने वनवासी वन्धुओं के साथ सशस्त्र क्रांति का आव्हान करते हुए कैसे अंग्रेजों के हाथों घोर यातनाओं को सहते-सहते उनका बलिदान हुआ वैसे उसका अपना एक अलग इतिहास है। पर इस घटना को देखकर लगता है कि अंग्रेजी साहित्यकार , चार्ल्स डिकेन्स, ने कभी ठीक ही कहा था-“ ईसाई पंथ प्रचारक बड़े ही कुत्सित प्राणी हैं और वे जहाँ भी जाते हैं उस स्थान को पहले कि तुलना अधिक निकृष्ट बना देते हैं .”

आज़ादी के बाद धर्म परिवर्तन को सेवा के नाम से जारी रखा गया

आज़ादी के बाद ईसाई मिशनरीज़ अपनी कार्य शेली बदलने को विवश हुईं, और जो काम अंग्रेजी सरकार के संरक्षण में अब तक करती आईं थीं वो सब काम उन्होंने ‘सेवा’ के नाम पर करना शुरु कर दिया। इंडियन मिशन,चर्च प्लांटिंग मिशन,प्रोजेक्ट जोशुआ आदि वर्तमान मे चलने वाली गतिविधियों का मूल लक्ष्य भोले-भाले, अनपढ़ वनवासियों का ईसाईकरण ही है, जिसके लिये विदेशों से प्राप्त होने वाले धन की कोई कमी नहीं। प्रोजेक्ट जोशुआ जैसी संस्था के संस्थापकों में से तो एक जिम टोवे रहे हैं , जो कि कभी मदर टेरेसा के कानूनी सलाहकार हुआ करते थे। और जहाँ तक बात मदर टेरेसा कि है तो आज भले ही उन्हें संत मानने वालों कि कमी न हो, पर जब मोरारजी देसी की जनता पार्टी की सरकार नें लोकसभा में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक प्रस्तुत किया जिसमें छल-कपट, भय तथा प्रलोभन द्वारा किसी भी प्रकार के मतान्तरण को अपराध घोषित करने का प्रावधान था तो उन्होनें इसका जमकर विरोध किया। २६ मार्च, १९७९ को मदर टेरेसा नें प्रधान मंत्री को एक पत्र लिखा-‘में निश्चित रूप से ईसा मसीह के नाम पर ही सेवा कर रही हूँ । लोगों को ईसाई बनाने पर यदि कोई प्रतिबंध लगाया जाता है तो हम इसे कभी सहन नहीं करेंगे.’ मोरारजी देसाई को चेतावनी देते हुए आगे लिखती हैं- ‘तुम बहुत बूड़े हो चुके हो। कुछ वर्षों पश्चात तुम्हे मरकर भगवान के पास इस चीज़ का जवाब देना होगा कि तुमने ईसाइयत के प्रसार-प्रचार पर प्रतिबंध क्यों लगाया’ इस पर मोरारजी नें जवाब दिया, ‘ मैं आपकी सेवा भावना की प्रशंसा करता हूँ, किन्तु सेवा के बहाने किसी का धर्म लूटने का अधिकार नहीं दे सकता.’ मिशनरीज कि सेवा के इस सच कि जानबूझकर अनदेखी कि गई है, उनके द्वारा विशेष रूप से जो की गांधीजी को अपना आदर्श बताते थकते नहीं. गांधीजी नें कहा था- ‘भारत तथा अन्यत्र जिस ढंग से ईसाई मिशनरीज़ लोगों का मंतान्तरण का रहीं हैं उसे किसी भी तरह उचित मान सकना मेरे लिए असंभव है. यह एक ऐसी भूल है जो संसार के शांतिपथ पर अग्रसर होने में कदाचित सर्वाधिक बाधक है.’-[गांधीजी और ईसाइयत, पृष्ठ १०९, रामेश्वर मिश्र, कुसुमलता केडिया]

वास्तव में लोगों का धर्म परिवर्तन कर सबको अपने अनुसार ईसाई प्रचारक चलाना चाहते हैं , आर.एस.एस. नहीं। इस बात पर उपरोक्त घटनाओं के बाद भी राहुल गाँधी को भरोसा नहीं हो तो १९९८ में भारत में आकर देश के कार्डिनलों को एक सभा में पोप जॉन पॉल क्या कहा था वो अपने संतुष्टि के लिए उसे भी देख सकते हैं. पोप ने कहा था-‘उपासना की स्वतंत्रता में मतान्तरण की स्वत्रंता शामिल है। यदि कोई अपना मत बदलना चाहता है तो किसी को ये अधिकार नहीं है कि उसकी मंशा को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बदलने की कोशिश करे। ईशा मसीह के जन्म के प्रथम हजार वर्षों में ईसाइयत यूरोप में स्थापित हुई. दूसरे हजार वर्षों में अफ्रीका में, अब तीसरे हजार वर्षों में हमें एशिया में ईसाइयत को स्थापित करना है’।

इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह से लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट द्वारा इस लेख में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। हम अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि मानते हैं

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