खाड़ी के देशों में

खाड़ी के देशों से 40 लाख भारतीयों को निकाला गया तो क्या होगा ?

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हालही में ख़बर आई है कि कुवैत जल्द ही 8 लाख भारतीयों को वापस भारत भेज सकता है। खाड़ी के देशों में शुमार मात्र 40 लाख की आबादी वाले इस देश में 8 लाख भारतीय हैं। इस छोटे से देश में 90 प्रतिशत आबादी प्रवासी है। यदि कुवैत सरकार ने 8 लाख भारतीयों को वापस भारत भेज दिया, तो इसके क्या परिणाम होंगे? भारत में पहले से ही आर्थिक मंदी, बेरोज़गारी की समस्या का रूप व्यापाक हो चुका है। ऐसे में 8 लाख भारतीयों का देश में वापस आना एक बड़ी चुनौती होगा।

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दुनिया इस वक़्त कोरोनावायरस संक्रमण से जूझ रही है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। दुनियाभर के देश इस वक़्त आर्थिक मोर्चे पर लड़खड़ाते दिख रहे हैं। अमेरिका जैसा सुपर पावर देश भी आर्थिक उलट फेर में फंसता दिख रहा है। लगातार घट रही नौकरियां और लॉकडाउन ने बेरोज़गारी की एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। भारत में कोरोना के पहले ही से आर्थिक मंदी वाला माहौल बना हुआ था। कोरोना के संकट और देशव्यापी लॉकडाउन ने देश की अर्थव्यवस्था को बहुत गहरी चोट पहुंचाई है।

कुवैत क्यों 8 लाख भारतीयों को वापस भेजना चाहता है ?

बीते दिनों कुवैत की नेशनल असेंबली और लेजिस्लेटिव कमेटी ने अप्रवासी कोटा बिल के मसौदे को मंजूरी दे दी है। कमेटी ने इस बिल को संवैधानिक करार दिया है। अब इसे असेंबली की दूसरी समितियों के पास भेजा जाएगा। बिल के मुताबिक कुवैत में भारतीयों की संख्या देश की आबादी में 15% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके लिए एक व्यापक योजना तैयार करने की बात भी कही गई है। बिल के पारित होने के बाद करीब 8 लाख भारतीय को कुवैत छोड़ना पड़ सकता है।

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कोरोनावायरस संक्रमण के बाद से कुवैत भी आर्थिक मोर्चे पर फिसला है। इस महामारी के बाद से कुवैत में दूसरे देशों के लोगों कुवैत से बाहर करने के लिए लगातार आवाज़े उठ रही हैं। इस लिए यहां के सरकारी अधिकारी और सांसद लगातार कुवैत से विदेशियों की संख्या कम करने की मांग कर रहे हैं। पिछले महीने कुवैत के प्रधानमंत्री शेख शबा-अल खालिद अल-शबा ने देश में प्रवासियों की संख्या 70% से घटाकर 30% करने का प्रस्ताव रखा था।

खाड़ी के देशों में क्यों उठ रही भारतीयों के खिलाफ़ आवाज़

कुवैत में करीब 10.45 लाख भारतीय रहते हैं। इनमें केरल और तमिलनाडु के लोग सबसे ज्यादा हैं। यहां पर प्रवासी मजदूर तेल और कंस्ट्रक्टशन कंपनियों में काम करते हैं। देश की कुल आबादी 40.3 लाख है। लेकिन इनमें दूसरे देशों से आए लोगों की संख्या करीब 30 लाख है। कुवैत के नागरिकों और दूसरे देशों से पहुंचे लोगों की संख्या के बीच भारी अंतर है। 

पिछले साल सांसद सफ-अल हाशम ने सरकार से अगले पांच साल में करीब 20 लाख प्रवासियों को देश से बाहर भेजने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा था कि देश में कुवैतियों की संख्या कुल आबादी की करीब 50% होनी चाहिए।

क्या ख़ास है कुवैत में ?

एक बेहद छोटा सा देश कुवैत जिसका क्षेत्रफल मात्र 17,818 कि.मी है। लेकिन दुनिया के सबसे अमीर देशों में एक कुवैत अपने रहन–सहन के साथ साथ अपनी खूबसूरती के लिए भी पूरी दुनिया में मशहूर है। सबसे अमीर देशों की सूची में इस देश का नाम चौथे नंबर पर आता है और अगर अरब देशों की बात की जाए तो क़तर के बाद ये देश दुसरे नंबर पर है।

कुवैती मुद्रा दुनिय की सबसे मजबूत मुद्राओं में से एक है। वर्तमान समय में एक कुवैती दीनार भारतीय 245 रुपय के बराबर है। ये भारतीय अभी अकेले कुवैत से लगभग 5 बिलियन डॉलर हर साल भारत भिजवाते हैं।

यदि कुवैत ने सख़्त निर्णय कर दिया तो उसे देखकर बहरीन, यूएई, सउदी अरब, ओमान, कतर आदि देश भी वैसी ही घोषणा कर सकते हैं। यदि ऐसा हो गया तो 40-50 लाख लोगों को भारत में नौकरियाँ कैसे मिलेंगी और कुछ को मिल भी गईं तो उनको उतने पैसे कौन दे पाएगा?

1.659 करोड़ भारतीयों में से आधे से अधिक खाड़ी के देशों में

अंतरराष्ट्रीय प्रवासी रिपोर्ट कहती है कि विदेशों में रहने वाले प्रवासियों के मामले में भारत पहले स्थान पर है। कुल 1.659 करोड़ भारतीयों में से आधे से अधिक खाड़ी देशों में रहते हैं। इन सवा करोड़ लोगों में से क़रीब 87 लाख लोग ऐसे हैं जो खाड़ी अरब क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ श्रम करते हैं और अपने काम-धंधे करते हैं।

कुवैत के बाद सबसे अधिक भारतीय संयुक्त अरब अमीरात में हैं। भारत के लगभग 34 लाख लोग अमीरात में हैं । क़रीब 26 लाख लोग सऊदी अरब में मौजूद हैं। इनके अलावा क़ुवैत, ओमान, क़तर और बहरीन को मिलाकर क़रीब 29 लाख एनआरआई हैं जो इन देशों में फैले हैं।

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खाड़ी देशों में तेल उद्योग चौपट होने की वजह से लोगों की नौकरियाँ जाने की ख़बरें लगातार आ रही हैं। अरबी भाषा के दैनिक अख़बार ‘अशरक़ अल-अवसात’ में दावा किया गया है कि सऊदी अरब की सरकार प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को 40 प्रतिशत तक वेतन काटने की अनुमति देने के लिए तैयार हो गई है।

अख़बार ने एक सरकारी आदेश के हवाले से लिखा है कि सऊदी अरब का मानव संसाधन मंत्रालय देश के श्रमिक क़ानूनों में बदलाव के लिए राज़ी हो गया है। इस बदलाव के बाद प्राइवेट सेक्टर की कंपनियाँ छह महीने तक 40 प्रतिशत तक वेतन काट सकती हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था को 9 लाख करोड़ का नुक़सान

विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देश भर में की गयी बंदी (लॉकडाउन) से अर्थव्यवस्था को 120 अरब डॉलर (करीब नौ लाख करोड़ रुपये) का नुकसान हो सकता है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के चार प्रतिशत के बराबर है।

नोटबंदी और जीएसटी की दोहरी मार झेलने वाले असंगठित क्षेत्र पर इसका असर सर्वाधिक पड़ेगा। हाल ही में तैयार एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अगर जल्द भारत को कोरोना वायरस का वैक्सीन नहीं मिलता है तो देश की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ेगा

कोरोना संकट ने बढ़ा दी बेरोज़गारी

कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन के कारण देश में बेरोजगारी दर लगातार बढ़ती जा रही है। एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 12.2 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपने काम से हाथ धोना पड़ा हैं। इनमें विनिर्माण उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी, फेरी-रेहड़ी वाले, सड़क किनारे सामान बेचने वाले, रिक्शा चालक और ठेला चलाने वाले शामिल हैं।

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वैश्विक ब्रोकिंग कंपनी बैंक ऑफ अमेरिका सिक्युरिटीज के मुताबिक यदि टीका आने में लंबा समय लगा तो भारतीय अर्थव्यवस्था 2020-21 में 7.5 प्रतिशत तक सिकुड़ सकता है। हालांकि, परिस्थितियां यदि उम्मीद के मुताबिक रहती हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था में चार प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया गया है।

अगर खाड़ी के देशों ने भारतीयों को वापस भेज दिया तो क्या होगा ?

केवल केरल से 21 लाख लोग खाड़ी-देशों में काम करने के लिए हुए हैं। इसमें शक नहीं कि भारतीयों ने अपने ख़ून-पसीने से इन देशों की अर्थ-व्यवस्थाओं को सींचा है। अगर खाड़ी के देशों से 40-50 लाख लोग वापस भारत आ गए तब क्या होगा ?

भारत कोरोना संकट से पहले ही आर्थिक मंदी के जाल में फंसा हुआ है। कोरोना और कोरोना के बाद लगे देशव्यापी लाताबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। लाखों की संख्या में लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। ऐसे अगर 40 लाख लोग वापस भारत लौट आए तो क्या होगा ? क्या ये लोग वापस आकर काम पा सकेंगे या फिर उसी बेरोज़गार भीड़ का हिस्सा हो जाएंगे, जो पहले से ही रोज़गार के लिए भटक रही है।

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