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क्या पुराने संसद भवन में नेहरू की आत्मा ‘यहां से भाग जाओ, यहां से भाग जाओ’ चिल्लाती है’?

नई संसद
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘नए भारत’ को क्या एक नई संसद भवन (New Parliament) की ज़रूरत है? हो ना हो, लेकिन इसके निर्माण की तैयारी शुरू हो चुकी है।

देश में एक नया संसद भवन बनने जा रहा है। 10 दिसंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने नई संसद की नींव रख दी है। मौजूदा संसद भवन के पास ही इस नए संसद भवन का निर्माण किया जाएगा। नए संसद भवन को बनाने में कुल 900 करोड़ का ख़र्च अनुमानित है।

इस देश को नए संसद भवन की ज़रूरत क्यों है ?

क्या पुराना संसद भवन अब एक ज़र्रर इमारत में तब्दील हो गया है ?

क्या पुराने संसद भवन की छत बारिश में टपकती है ?

क्या बारिश में संसद भवन में इतना पानी भर जाता है कि नेताओं को डूब जाने का ख़तरा होता है ?

क्या पुराने संसद भवन की छतों से पप्पड़ नेताओं के सर पर गिर रहे हैं ?

क्या पुराने संसद भवन में नेहरू की आत्मा ”यहां से भाग जाओ, यहां से भाग जाओ चिल्लाती है”?

इन सब सावालों का जवाब आप सभी जानते हैं।

भारतीय मीडिया ने दिन-रात इस नई संसद की ख़ूबिया गिनाना शुरू कर दिया हैं। इस देश का मीडिया बनने जा रहे नए संसद भवन से जुड़े हर पहलू पर फटे हुए भोंपू की तरह चिल्ला-चिल्ला कर चर्चा करेगा, सिवाए इसके कि क्या इस देश को वास्तव में लगभग 900 करोड़ की लागत से बनने वाले इस संसद भवन की ज़रूरत है?

मौजूदा संसद भवन का निर्माण सन 1921-27 की बीच हुआ था, इस हिसाब से इसे बने 93 साल हो चुके हैं। संसद भवन का डिजाइन उस दौर के मशहूर ब्रिटिश वास्तुविद एडविन लुटियन ने बनाया था। अंग्रेज़ों ने इसे बनाने में 83 लाख रुपए खर्च किए थे।

आइये अब आपको दुनियां की उन पुरानी संसद भवनों के बारे में बताते हैं जो भारत की संसद से सैकड़ों साल पुरानी हैं।

1 . नीदरलैंड के द हेग में बनी बिनेनहॉफ दुनिया की सबसे पुरानी संसद है। 13वीं सदी में तैयार ये इमारत साल 1584 में डच रिपब्लिक में राजनीति का केंद्र बनी। वर्ष 1584 में यह इमारत नीदरलैंड के राजनीति का केंद्र बन गई। इसे नीदरलैंड के 100 विरासत स्‍थलों में शामिल किया गया है।

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इटली की राजनीति का केंद्र पलाज्जो मैडामा 16वीं शताब्दी में बनी हुई इमारत है। जो आज भी शान और ख़ूबसूरती के साथ खड़ी है। इस संसद भवन का निर्माण 1505 में पूरा हो गया था और यहां पर इटली की संसद के एक सदन द सीनेट ऑफ द रिपब्लिक की बैठक 1871 से हो रही है।

फ्रांस की बात करें तो वहां की संसद लक्जमबर्ग पैलेस बेहद खूबसूरती से तैयार की गई है। इस इमारत को 17वीं शताब्दी में तैयार किया गया था। फ्रांसीसी भवन को राजा के भवन के रूप में 1615 से 1645 के बीच में बनाया गया था और वर्ष 1958 से लगातार यहां पर संसद भवन की बैठक होती है।

दुनिया के सबसे पुराने लोक‍तांत्रिक देशों में शुमार अमेरिका के संसद भवन कैपिटल का निर्माण सन 1800 में पूरा हुआ था और इसे नॉर्थ और साउथ अमेरिका में सबसे पुराना संसद भवन माना जाता है।इसके साथ ही ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन और हाउस ऑफ लॉर्ड्स का निर्माण क्रमश: 1840 और 1870 में हुआ था।

कैसे बनी भारत की संसद?

1911 में दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया गया। मगर अंग्रेजों को लगा कि दिल्ली ‘राजधानी लायक’ नहीं है। ऐसे में ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियन को दिल्ली की नई शक्ल बनाने का जिम्मा दिया गया। लुटियन दुनियाभर में कई इमारतों को शक्ल दे चुके थे। उनकी सोच भारतीयों के प्रति काफी नकारात्मक थी।लेकिन उनकी बनाई गई इमारतों में भारत की संस्कृति की झलक ज़रुर दिखाई देती है।

लुटियन के डिज़ाईन की यही खासियत थी कि वह स्थानीय कला और संस्कृति को अपने अंदर समेट लेती थी। दिल्ली को बनाने में लुटियन ने 20 साल लगाए, उन्होने इसे बनाने में शिद्दत से काम किया। बनने के महज़ 17 साल बाद अंग्रेजों के हाथ से चली गई और आज़ादी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इन्हीं लुटियन इमारतों में बनकर तैयार हुआ और आज तक इन इमारतों की ही तरह भारत के लोकतंत्र की नींव भी मज़बूत बनी हुई है।

बात की जाए भारतीय संसद की तो यह दुनिया की खूबसूरत इमारतों में से एक है। गोलाकार आवृत्ति में निर्मित संसद भवन का व्यास 170.69 मीटर का है तथा इसकी परिधि आधा किलोमीटर से अधिक (536.33 मीटर) है जो करीब छह एकड़ (24281.16 वर्ग मीटर)भू-भाग पर स्थित है।

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संसद भवन ने आज़ादी के बाद भारत को बनाने में अहम योगदान

दो अर्धवृत्ताकार भवन केंद्रीय हाल को खूबसूरत गुंबदों से घेरे हुए हैं। भवन के पहले तल का गलियारा 144 मजबूत खंभों पर टिका है। प्रत्येक खंभे की लम्बाई 27 फीट (8.23 मीटर) है। बाहरी दीवार ज्यामितीय ढंग से बनी है तथा इसके बीच में मुगलकालीन जालियां लगी हैं।

संसद भवन ने आज़ादी के बाद से अब तक भारत को बनाने में अहम योगदान दिया है। भारत में इसे लोकतंत्र का मंदिर कहा गया जहां हर दिन संविधान की पूजा की जाती है। इसी संसद भवन में हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों ने तमाम कानून बनाए, हर भारतीय के विकास के लिए नए सुधार किए। संसद भवन पर आतंकियों ने हमला भी किया लेकिन वे भारतीय लोकतंत्र को हिलाने में कामयाब नहीं हो सके।

अब सवाल यह है कि जिस देश में आधी आबादी ट्रेन के फर्श और टॉयलेट में सफ़र करते हों, वहां 900 करोड़ की नई संसद की क्या ज़रूरत है। जिस देश में लोग भूख से मर जाया करते हैं, वहां बन चुकी है 3000 हज़ार करोड़ की एक मूर्ती। क्या वर्तमान सरकार इस देश के ग़रीबों के अमीरों के हाथों बेच देने का काम कर रही है? देश की मूल्य समस्याओं पर ध्यान न देकर इस सरकार ने देश को बरबादी की राह पर लगा दिया है।

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