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मुहर्रम में क्यों मातम करते हैं शिया? जानिए इतिहास के पन्नों में दर्ज 1400 साल पुराना किस्सा…

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आज देश भर में इमाम हुसैन की शहादत (क़ुर्बानी) को याद करते हुए यौम-ए-आशूरा मनाया गया. सभी मुसलमानों के लिए यह दिन काफ़ी महत्व रखता है. लेकिन शिया मुसलमानों के लिए इसकी बेहद ख़ास अहमियत है. यह दिन मोहर्रम की दसवीं तारीख़ है. जिसे यौम-ए-आशूरा कहा जाता है. जो इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से साल का पहला महीना होता है.

शिया मुसलमान इस दिन ताज़िए और अलम निकाल कर मातम करके 680 ईस्वी में आधुनिक इराक़ के कर्बला शहर में इमाम हुसैन की शहादत का ग़म मनाते हैं. शिया पुरुष और महिलाएँ काले लिबास पहन कर मातम में हिस्सा लेते हैं. कहीं-कहीं यह मातम ज़ंजीरों और छुरियों से भी किया जाता है और कहीं-कहीं तलवारों से भी किया जाता है. कहीं पर आग पर चलकर किया जाता है. जिसमें मातमदार (श्रद्धालु) स्वंय को लहूलुहान कर लेते हैं.

यूपी के कानपुर शहर में यौम-ए-आशूरा पर शहर भर में निकले जुलूस
यूपी के कानपुर शहर में मोहर्रम की दस तारीख को जगह-जगह से शिया और सुन्नी मुस्लमानों ने इमाम हुसैन की याद में निकाले जुलूस. हज़ारों की संख्या में लोगों नें इन जुलूसों में हिस्सा लिया. शिया मुस्लमानों ने इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए तलवार का मातम कर ख़ुद को लहुलुहान किया.

वहीं दूसरी तरफ़ कुछ शिया मुस्लमानों ने इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए आग पर मातम कर अपनी ताज़ियत पेश की. यह आग का मातम कानपुर शहर में स्थित मक़बरा ग्वालटोली में किया गया.जिसमें मातमदारों ने जलती हुई आग पर मातम किया.

सबील ( प्याऊ), खिचड़ा, शरबत और तबर्रुक दस दिन तक बांटा जाता है
कर्बला में इमाम हुसैन और उनका पूरा परिवार तीन दिनों का भुखा-प्यासा शहीद हुआ था.इस लिय पानी और शरबत की सबील लगाकर लोगों को यह एहसास दिलाया जाता है कि प्यास क्या चीज़ होती है और पानी की क्या अहमियत है. इसी लिय हर जगह शरबत और पानी बांटा जाता है. शिया मुस्लमानों के घरों में दस दिन तक मजलिसें (धार्मिक कार्यक्रम) होती हैं, जिसमें हर तरह के खाने की चीजों को बांटा जाता है.

सुन्नी मुसलमान भी जगह-जगह रखते हैं ताज़िया
सुन्नी मुस्लमान भी जगह-जगह ताज़िया रखते हैं खिचड़ा (हलीम) खिलाते हैं. कोलकाता से लेकर कराची तक हलीम भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को एक पहचान बन चुका है. भारत में हलीम को धार्मिक कार्यक्रमों पेश करने की परंपरा भी काफ़ी पुरानी है. कई सदियों से दिल्ली, लखनऊ और हैदराबाद के शिया मुसलमान मोहर्रम के मौक़े पर आयोजित होने वाली मजलिसों के बाद हलीम बांटते और खिलाते हैं और इसी तरह बंटवारे के बाद यह सिलसिला मुहाजिरों के ज़रिए पंजाब और सिंध में भी आम हो गया. शिया मुसलमानों की यह परंपरा इतनी आम हुई कि अब सुन्नी मुसलमान भी नज़रों-नयाज़ ( पूजा ) में हलीम को प्रमुख्ता से जगह देते.

क्या है मोहर्रम?
मोहर्रम का यह महीना याद दिलाता है कि अत्याचारी शासक यज़ीद ने इमाम हुसैन और उनके परिजनों व साथियों, जो तीन दिन के भूखे और प्यासे थे उनको इसी महीने में बड़ी बेरहमी से कत्ल कर दिया था. आज से लगभग 1400 साल पहले आज ही के दिन, जिसे यौम-ए-आशूर के नाम से जाना जाता है. इमाम हुसैन ने ईराक़ में स्थित एक शहर कर्बला के मैदान में ऐसी हृदय विदारक घटनाएं देखी कि उनको बयान करने से क़लम अक्षम है. उस दिन दानवता और हैवानियत अपने चरम पर पहुंच गयी थी.

इमाम हुसैन और उनके साथियों के लिए पीने का लिय पानी बंद कर दिया गया था. इब्ने ज़ियाद नामक एक यज़ीदी फौज के सिपाहियों में से एक हुरमुला ने कर्बला के मरुस्थल में इमाम हुसैन के छह महीने के दूध पीते बच्चे को तीर मार कर क़त्ल कर दिया था जोकि तीन दिन का भूखा और प्यासा था.

यज़ीद के सैनिकों ने इस को काफ़ी नहीं समझा तो उन्होंने इमाम हुसैन के भाई हज़रत अब्बास के दोनों हाथ काट दिए और उनकी आंख में ज़हर से भरा तीर मारा. यज़ीदी सैनिकों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों व परिजनों को शहीद करने को ही पर्याप्त नहीं समझा बल्कि उनके शवों पर घोड़े दौड़ा दिए. बच्चों और बच्चियों को कोड़े मारे. इमाम हुसैन ने देखा कि उनके साथी पूरी उत्सुकता के साथ आगे बढ़ बढ़कर अपनी जानों को निछावर कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मुझपर जो भी कठिनाइयां और मुसिबतें पड़ीं, क्योंकि यह सब ईश्वर की नज़रों के सामने हैं.

इमाम हुसैन ईश्वरीय निष्ठा और श्रद्धा में डूबे हुए क़ुरबानियों पर कुरबानियां देते रहे और ईश्वर उनके हर अमल को अमर करता चला गया. इसी लिए आज चौदह शताब्दियां बीत जाने के बाद इमाम हुसैन की क़ुरबानियों को याद किया जा रहा है.

कर्बला इराक़ के मध्य में स्थित एक ऐतिहासिक और पवित्र शहर है
ये शहर बग़दाद से 55 मील या 88 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित है. बेबीलोनियाई सभ्यता के अनुसार कर्बला का शाब्दिक अर्थ होता है – ईश्वर का पवित्र स्थान. कर्बला का इस्लाम धर्म में एक अलग महत्व है और इस्लाम में शिया और सुन्नी संप्रदाय के बीच विवाद में भी कर्बला का एक अलग स्थान है. कर्बला में 680 ईस्वी में शिया और सुन्नी संप्रदायों के बीच एक लड़ाई हुई थी जिसे ‘कर्लाब की लड़ाई’ कहा जाता है. ये लड़ाई पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाती) हुसैन और तब मुसलमानों के प्रमुख खलीफ़ा उम्मय्या वंश के यज़ीद के समर्थकों के बीच हुई थी.

उम्मय्या वंश के लोगों ने पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने की कोशिश की. इसी वंश के मुवैय्या ने ख़लीफ़ा अली को धोखे से मारकर राजनीतिक सत्ता हासिल कर ली और फिर अपने बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी बना दिया. यज़ीद ने अपने पिता मुवैय्या की मौत के बाद ख़ुद को ख़लीफ़ा घोषित कर दिया और वे चाहते थे कि हुसैन उनकी ख़िलाफ़त को स्वीकार करें. मगर हुसैन ने इसे इस्लाम के सिद्धांत के विपरीत बताते हुए यज़ीद का नेतृत्व स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके बाद कर्बला की लड़ाई हुई.

हुसैन का कत्ल करने के बाद यजीदी सेना ने उनके समर्थकों के घरों में आग लगा दी और काफिले में मौजूद लोगों के घरवालों को अपना कैदी बना लिया. कर्बला में इस्लाम के लिए जंग करते हुए इमाम हुसैन और उनके परिवार के सदस्य शहीद हो गए थे. हुसैन की इसी कुर्बानी की याद में मुहर्रम की 10 तारीख को दुनिया भर के मुसलमान अलग-अलग तरीकों से अपने गम का इजहार करते हैं.

देखें मोहर्रम का वीडिया-

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