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अम्बेडकर को पढ़ने के बाद कारसेवक RSS से क्यों करने लगा नफ़रत?

दलित कारसेवक की आत्मकथा
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आरएसएस के जातिगत भेदभाव से तंग आकर संघ का रास्ता छोड़ने वाले पूर्व कार्यकर्त्ता व कारसेवक भंवर मेघवंशी द्वारा लिखित आत्मकथा “मैं एक कारसेवक था” की पूरी कहानी..

अयोध्या में पौने तीन एकड़ की इस ज़मीन से हिन्दू और मुस्लिम समाज की आस्था जुड़ी है। मामला सालों से अदालत में है लेकिन ऐसा लगता है कि अब फै़सले की घड़ी नज़दीक है। अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में लगभग डेढ़ महीने लगातार चली सुनवाई बुधवार को ख़त्म हुई। देश भर में माहौल गर्म है। मीडिया में अटकलों का बाज़ार गर्म है कि फैसला किसके हक़ में जाएगा।

अयोध्या में धारा 144 लागू कर दी गई है। देश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाले मुक़दमे का फ़ैसला आने वाला है। मुक़दमे में शामिल पार्टियों के दिलों की धड़कने तेज़ हुई हैं। तीनों पक्षों को उम्मीद है कि अदालत का फ़ैसला उनके पक्ष में आएगा।

‘जनता को इतना निचोड़ दो की जिंदा रहने को ही विकास समझे’

इन सबके बीच राजस्थान में भीलवाड़ा जिले के रहने वाले दलित सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी द्वारा लिखित उनकी आत्मकथा “मैं एक कारसेवक था” भी चर्चा का विषय है क्योंकि इसका सम्बन्ध भी कहीं ना कहीं राम जन्मभूमि विवाद और अयोध्या में कारसेवा करने वालों से जुड़ा हुआ है। आज युवाओं को जिस तरह से धर्म के नाम पर उन्मादी बनाया जा रहा है और रोज़गार की जगह राम मंदिर निर्माण को मुद्दा बनाया जा रहा है, उसका ज़िक्र भंवर मेघवंशी ने अपनी इस आत्मकथा में किया है।

जो युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं या उसकी विचारधारा से प्रभावित हैं ऐसे लोगों को एक बार इस किताब को ज़रूर पढ़ना चाहिए

आरएसएस, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद के साथ अपने अनुभव के आधार पर भंवर मेघवंशी कहते हैं कि इनके अंदर जातिवाद की सड़ांध है और यहां दलितों को सिर्फ ज़िंदाबाद- मुर्दाबाद के नारे लगाने और सभाओं में जाज़िम बिछाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। समरसता और ‘हिन्दू हिन्दू- भाई भाई’ की बात करने वालों के अंदर जो जातिवाद है वो लोगों को पता चलना चाहिए।

आख़िर कौन होते हैं ये कारसेवक ?

कार सेवा सिख पंथ का प्रचलित शब्द है। असल में यह कर सेवा है जिसका मतलब होता है “हाथों से की जाने वाली सेवा या कार्य।” पंजाब में धार्मिक कार्यों और गुरुद्वारों में जो स्वेच्छा से सेवा कार्य किये जाते है उसे “करसेवा या कारसेवा” कहा जाता है और इस प्रकार कर सेवा करने वाले को कार सेवक कहते हैं- अयोध्या में दो बार कार सेवा की गई। यानी दो बार बाबरी मस्जिद को गिराने की कोशिश की गई और इस काम को करने के लिए जो लोग अयोध्या गए वो सब कारसेवक कहलाए।

पहली बार अक्टूबर 1990 में कार सेवा की गई जिसमें भंवर मेघवंशी भी कार सेवकों में शामिल थे।लेकिन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्मादी कार सेवकों को रोकने के लिए गोली चलाने का आदेश दे दिया था और किसी को भी बाबरी मस्जिद के नज़दीक नहीं जाने दिया गया। दूसरी बार कार सेवा दिसम्बर 1992 में की गई जिसमें कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया।

भंवर मेघवंशी अक्टूबर 1990 में राजस्थान से अयोध्या जाने वाले कार सेवकों में शामिल थे। भंवर बताते हैं कि संघ, भाजपा, और विश्व हिंदू परिषद के राजस्थान के बड़े नेता हमारे साथ ट्रेन में भीलवाड़ा से सवार हुए, सब बहुत खुश थे कि बड़े बड़े नेता भी हमारे साथ जा रहे हैं, लेकिन वो सभी नेता अजमेर स्टेशन पर ट्रेन से उतर गए। इस बात से उन्हें हैरत हुई।

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संघ की विचारधारा से कैसे हुआ मोहभंग?

भंवर मेघवंशी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि वो अपनी किशोरावस्था से ही संघ की शाखाओं में नियमित जाने लग गए थे। वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस के समर्पित स्वयं सेवक हुआ करते थे। भंवर मेघवंशी राजस्थान से संघ के उन चुनिंदा स्वयंसेवको में शामिल थे जो पहली बार बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए अयोध्या जाने वाले जत्थे में शामिल थे। भंवर मेघवंशी तब भीलवाड़ा जिले में संघ के पदाधिकारी भी हुआ करते थे। भंवर मेघवंशी दलित समाज से ताल्लुक रखते थे और संघ के समरसता और समस्त हिन्दू भाई-भाई वाले विचार से बहुत प्रभावित हुआ करते थे।

अक्टूबर 1990 में पहली बार अयोध्या में कार सेवा करने गए कुछ कारसेवक पुलिस गोलीबारी में मारे गए। पुलिस की गोली से मारे गए कारसेवकों की अस्थियों को संघ और विश्व हिंदू परिषद द्वारा पूरे देश में अस्थि कलश यात्रा निकाल कर घुमाया जा रहा था जिससे कि सहानुभूति और गुस्से की लहर के साथ पूरे देश में राम मंदिर के लिए एक माहौल बनाया जा सके।

हम दलित हैं और यह लोग हमारे घर खाना नहीं खाएंगे

मार्च 1992 में भंवर मेघवंशी के गृह जिले भीलवाडा में हुए एक साम्प्रदायिक उपद्रव में दो हिन्दू युवा पुलिस की गोली से मारे गए। उनकी भी अस्थियों के कलश गांव गांव घुमाए गये। जब यह अस्थि कलश यात्रा भंवर मेघवंशी के गांव पहुंची तो उन्होंने सभी के लिए घर में खाना बनवाया। भंवर मेघवंशी के पिता ने उन्हें समझाया कि हम दलित हैं और यह लोग हमारे घर खाना नहीं खाएंगे। लेकिन भंवर को लगता था कि संघ समरसता की बात करता है और कोई भेदभाव नहीं करता। भंवर ने किसी की नहीं सुनी और सबके लिए खाना बनवाया।

रथ यात्रा जब उनके गांव पहुंची तो यात्रा का भव्य स्वागत किया गया और भंवर ने संघ के पदाधिकारी बड़े भाई साहब को सभी संतो के साथ घर पर खाने के लिए आमंत्रित किया। भाई साहब ने समझाया कि अभी समाज मे इतनी समरसता नहीं आई है और साधु संत एक दलित के घर जाकर खाना खाने पर राज़ी नहीं होंगे। बहाना बनाया गया कि वक़्त कम है खाना पैक कर दो हम रास्ते में खाना खा लेंगे।

मैनें संघ की विचारधारा को छोड़कर अम्बेडकर को पढ़ना शुरू किया

यह सब कुछ भंवर के लिए अप्रत्याशित था। ऐसा उन्होंने बिल्कुल भी नहीं सोचा था। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसकी तो भंवर ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अगली सुबह उनके लिए एक और बुरी ख़बर लेकर आई। किसी ने उन्हें आकर बताया कि रथयात्रा में शामिल संघ के लोगों के लिए उन्होंने जो खाना बनवाया था वो खाना उन्होंने गांव के बाहर फेंक दिया। भंवर को विश्वास नहीं हुआ, उन्होंने जब गांव के बाहर जाकर देखा तो सारा खाना गांव के बाहर 3 किमी दूर पड़ा हुआ था। किसी ने भी खाना नहीं खाया था क्योंकि वो खाना एक दलित के घर बनाया गया था।

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इस बात से भंवर मेघवंशी को गहरा आघात पहुंचा और वो गहन अवसाद की स्थिति में आ गए। उन्होंने आत्महत्या का प्रयास भी किया जिसमें वो असफल रहे। इसके बाद भंवर कि ज़िंदगी ही बदल गई। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को छोड़कर अम्बेडकर को पढ़ना शुरू किया। भंवर मेघवंशी पीयूसीएल और मज़दूर किसान शक्ति संगठन जैसे संगठनों से जुड़कर मानवाधिकार के लिए काम करने लगे।

हिन्दू एकता का नारा लगाते हैं वो दलित को हिन्दू मानते ही नहीं हैं

भंवर मेघवंशी कहते हैं कि जो कुछ मेरे साथ हुआ उसके प्रतिरोध का स्वर मैंने इस किताब में लिखा है। आज हम खड़े हैं और नफ़रत की उस विचारधारा के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। मेरे प्रतिशोध की आग अब परिवर्तन की चाह बन गई है। मैं चाहता हूं कि इस व्यक्तिगत पीड़ा को सामाजिक बदलाव में कैसे लाया जाए। आरएसएस के लोगों ने मेरे साथ जो जातिगत भेदभाव किया वो 25 करोड़ दलित आदिवासियों के साथ हर रोज़ हो रहा है। जो संगठन हिन्दू एकता का नारा लगाते हैं वो दलित को हिन्दू मानते ही नहीं हैं।

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भंवर बताते हैं कि संघ का समरसता और समस्त हिन्दू भाई-भाई का विचार दिखावा और ढकोसला मात्र है जिसमें फंसा कर वो दलित युवाओं को धर्म के नाम पर उन्मादी बना रहा है। वो सवाल उठाते हैं कि संघ भले ही यह कहता हो कि उनकी शाखाओं में सिर्फ व्यायाम और देशभक्ति सिखाई जाती है लेकिन क्या वजह है कि संघ की शाखाओं से निकलने वाले युवा दूसरे धर्म के लोगों से नफ़रत करने वाले बन जाते हैं।

जिन्हें मैं खतरनाक लोग समझकर शक की दृष्टि से देखता था, वो मेरे जैसे ही लोग थे

अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि मैं मुसलमानों से नफ़रत करता था लेकिन आरएसएस को छोड़ने के बाद जब मैं मुसलमानों से मिला तो मेरे अंदर जमीं हुई मुस्लिम द्वेष की बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगी। जिन्हें मैं खतरनाक लोग समझकर शक की दृष्टि से देखता था, वो मेरे जैसे ही लोग थे। बिलकुल हमारे ही जैसे। हमारी ही तरह हंसने, रोने, गुस्सा करने वाले लोग। उतने ही देशप्रेमी जितने हम हैं। उतने ही परिस्थितियों के मारे हुए भी।

मैने पहली बार किसी मस्जिद को अंदर से देखा। एक मदरसे में बैठा,उनकी रसोई देखी, उनका सोने का कमरा देखा, साथ बैठे, साथ खाया, और यह मुलाकात उसी गांव में हुई जहाँ पर ले जाकर मेरे घर का बना खाना फेंक दिया गया था। उसी गांव में एक मौलाना के साथ बैठकर मैंने भोजन किया।

अयोध्या मामले पर पूर्व कारसेवक का संदेश

“सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है। जो भी फैसला आयेगा वह न्यायसंगत होगा, इसकी उम्मीद की जा रही है। लेकिन जिस प्रकार से मीडिया उन्माद पैदा करने की कोशिश कर रहा है, शासन जिस तरह की दशहत का निर्माण कर रहा है, वह चिंताजनक है। मेरा तो देश के दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों से अनुरोध है कि वे किसी भी प्रकार की हिंसक प्रतिक्रिया, उपद्रव से स्वयं को दूर रखें।

मुल्क का अमन, भाईचारा और एकता बनी रहे, इसके लिए काम करें। किसी भी तरह के उकसावे में नहीं आएं क्योंकि मीडिया और शासन-प्रशासन सब उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनते नज़र आ रहे हैं। इसलिए सावधानी बहुत ज़रूरी है। “

– भंवर मेघवंशी (एक पूर्व कारसेवक)

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