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कौन हैं श्रीलंका के आम चुनाव में जीत दर्ज करने वाले महिंद्रा राजपक्षे ?

Who is Mahindra Rajapaksa
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श्रीलंका में हुए आम चुनाव में शुक्रवार को श्रीलंका पीपुल्स पार्टी ( SLP ) के महिंद्रा राजपक्षे ने शानदार जीत दर्ज की। इस जीत शानदार जीत के बाद  महिंद्रा राजपक्षे और उनकी पार्टी श्रीलंका पीपुल्स पार्टी ( SLP ) को राजनीति में वापसी के तौर पर देखा जा रहा है।

चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए अंतिम परिणामों के अनुसार 225 सदस्यीय संसद में एसएलपीपी ने अकेले 145 सीटें जीती और सहयोगियों दलों के साथ कुल 150 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस तरह पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिल गया है। राजपक्षे की पार्टी को 68 लाख यानी 59.9 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं।

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महिंद्रा राजपक्षे की जीत के एलान के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजपक्षे को ट्वीट कर बधाई देते हुए लिखा कि- दोनों पक्ष सभी क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने तथा विशेष संबंधों कोई नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए काम करेंगे।

1.6 करोड़ से अधिक लोगों को था मतदान का अधिकार

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राजपक्षे को दी गई बधाई के बाद राजपक्षे ने पीएम मोदी के ट्वीट का जवाब देते हुए मोदी का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा कि-श्रीलंका के लोगों के समर्थन के साथ, दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को और आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ मिलकर काम करने को उत्साहित हूं। श्रीलंका और भारत अच्छे मित्र एवं सहयोगी हैं।’

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बात आम चुनाव के नतीजों की करें तो उनके अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी केवल एक सीट ही अपने नाम कर पाई। उसे केवल 249,435 यानी दो प्रतिशत वोट ही मिले। राष्ट्रीय स्तर पर वह पांचवें नंबर पर रहे। 1977 के बाद ऐसा पहली बार है कि विक्रमसिंघे को संसदीय चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

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1.6 करोड़ से अधिक लोगों को 225 सांसदों में से 196 के निर्वाचन के लिए मतदान करने का अधिकार था। वहीं 29 अन्य सांसदों का चयन प्रत्येक पार्टी द्वारा हासिल किए गए मतों के अनुसार बनने वाली राष्ट्रीय सूची से होगा। राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने नवंबर में एसएलपीपी की टिकट पर ही चुनाव में जीत दर्ज की थी और निर्धारित सयम ये छह महीने पहले ही चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी।

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विस्तार से अगर आंकड़ो को देखा जाए तो इस बार एसजेबी 55 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही, तमिल पार्टी टीएनए को 10 सीटें और मार्क्सवादी जेवीपी 3 सीट ही हांसिल कर सकी। इस बार करीब 20 राजनीतिक दलों और 34 स्वतंत्र समूहों के 7,200 से ज्यादा उम्मीदवार 22 चुनावी जिलों से मैदान में थे।

कौन हैं महिंद्रा राजपक्षे और कैसे शुरू हुआ उका राजनीतिक सफ़र ?

महिंदा राजपक्षे का राजनीतिक सफर रिकॉर्ड कायम करने वाला रहा है। 1970 से उनकी राजनीति ने परवान चढ़ना शुरू किया था। तब वह महज़ 24 साल की उम्र में सांसद चुने गए थे। महिंदा राजपक्षे ने इससे पहले 2005 में सत्ता हासिल की थी और इस दक्षिण एशियाई देश के सबसे लंबे समय तक राष्ट्रपति रहे थे।

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एक वर्ष पूर्व श्रीलंका में आए राजनीतिक घमासान के बीत महिंदा को 26 अक्टूबर, 2018 को तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रिपाल सिरिसेना ने पीएम नियुक्त किया था, जिन्होंने एक विवादित कदम उठाते हुए विक्रमसिंघे को पद से हटा दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश में सिरिसेना के फैसले को अवैध करार दिया गया था।

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श्रीलंका के इतिहास में साल भर पूर्व 2019 के राजनीतिक उथल-पुथल के बीत यह पहली बार हुआ था कि जब देश के दो सबसे उच्च पदों पर सगे भाई बैठे थे। हाल में राष्ट्रपति चुने गए गोटाबाया राजपक्षे ने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे को देश का प्रधानमंत्री नामित किया गया था।

महिंदा राजपक्षे इससे पहले राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनका कार्यकाल 2005 से 2015 तक रहा है। यह वही समय था जब प्रभाकरण के नेतृत्व वाले संगठन एलटीटीए के खिलाफ लड़ाई तेज की गई थी और उसका सफाया किया गया था।

2015 में महिंदा राजपक्षे को दो चुनावों में मिली थी हार

1945 में जन्मे राजपक्षे के बारे में कहा जाता है कि उनके जितना ताक़तवर और महत्वाकांक्षी राष्ट्रपति श्रीलंका में कोई दूसरा नहीं हुआ। दक्षिण श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे का इलाक़ाई नेता के रूप में उभार बतौर छात्र ही होने लगा था।

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श्रीलंकाई मीडिया में राजपक्षे को सिंहली बौद्धों के मुक्तिदाता के तौर पर देखा जाता है। श्रीलंका में एलटीटीई को मिटाने में राजपक्षे के नेतृत्व की सराहना होती है। कहा जाता है कि राजपक्षे ने देश के भीतर बहुसंख्यकों के डर को ख़त्म किया है।

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26 सालों से तमिल विद्रोहियों के साथ श्रीलंका में जारी गृह युद्ध 2009 में ख़त्म हुआ तो इसका श्रेय महिंदा राजपक्षे को दिया जाता है। राजपक्षे की श्रीलंका की राजनीति में प्रासंगिकता में यह सबसे अहम कड़ी है।

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2015 में महिंदा राजपक्षे को दो चुनावों में हार मिली थी। 2015 के बाद राजपक्षे की राजनीतिक प्रासंगिकता भले कम हुई थी, लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई थी। इस आम चुनाव में उनकी जीत एक बदलाव की तरफ इशारा करती है।

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