16 साल की इस बच्ची ने पीएम मोदी समेत दुनिया भर के नेताओं को दी नसीहत

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ग्राउंड रिपोर्ट | न्यूज़ डेस्क

जलवायु परिवर्तन पर ध्यान आकर्षित करने के लिए दुनिया भर में 20 सितंबर को ग्लोबल क्लाइमेट स्ट्राइक आयोजित की गई। भारत समेत दुनियाभर के देशों में पृथ्वी को जलवायु संकट से बचाने के लिए युवा , बुज़ुर्ग और बच्चे तख्तियां लिए सड़कों पर निकले। इस स्ट्राइक में खास तौर पर स्कूली बच्चों ने भाग लिया।

भारत में इसका कम ही असर दिखा। कुछ गिनी चुनी मेट्रो सिटी में जागरूक युवा और पर्यावरण एक्टिविस्ट ने ज़रूर इस स्ट्राइक में भाग लिया। बाकी देश में आंदोलन तभी होते हैं जब राजनीतिक पार्टियों को कोई हित साधना हो। युवाओं की गाड़ियों में जब फ्री का पेट्रोल भरवा दिया जाता है तो वे निकल पड़ते हैं अनजान मुद्दे पर हुड़दंग करने। न इस मुद्दे में धर्म शामिल था न जाति, इसलिए किसी ने ज़हमत नहीं उठाई। पर्यावरण से न किसी राजनीतिक दल को वोट मिलता है न ही रोज़गार की तलाश में भटकने वाले युवा की चेतना अभी पर्यावरण तक पहुंची है। खैर देर-सवेर जब लोगों की सांसो में ज़हर घुलेगा वे सड़कों पर आ ही जाएंगे। दूरदर्शिता का हुनर हमारे लोगों में फिलहाल नहीं है।

2019 में जिस तरह पूरे विश्व में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ी है वह ध्यान देने लायक है। 2016 में हुए पैरिस समझौते के तहत 2030 तक सभी विकसित एवं विकासशील देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने का संकल्प लिया है। भारत भी इसके लिए संकल्परत है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस ओर कदम बढ़ा दिए हैं। अमेरिका इस समझौते से बाहर आ चुका है, शायद ट्रम्प अमेरिका को कार्बन युक्त ग्रेट नेशन बनाना चाहते हैं।

हम बात कर रहे हैं ग्रेता तुंबरै की, एक 16 वर्षीय स्कूली छात्रा जो 20 अगस्त 2018 को स्कूल बंक कर निकल पड़ी थी अपने देश की संसद के सामने विरोध करने। वो अपने नेताओं को जलवायु परिवर्तन को लेकर कड़े कदम उठाने के लिये जगाना चाहती थी। आज ग्रेता तुंबरै जलवायु परिवर्तन आंदोलन की मशाल थामे आगे आगे चल रही हैं और पूरा विश्व उनके पीछे पीछे।

कौन हैं ग्रेता तुंबरै?

ग्रेता स्वीडन की नागरिक हैं। उनकी उम्र महज़ 16 वर्ष है। वो पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं। जलवायु परिवर्तन से चिंतित होकर ग्रेता स्कूल बंक कर अपने देश की संसद के आगे प्रदर्शन करने पहुंच गई थी। उनका मानना है कि जब पृथ्वी नहीं बचेगी तो स्कूल भी नहीं बचेंगे। ग्रेता का उठाया छोटा सा कदम बड़ा आंदोलन बन गया। ग्रेता ने कई मंचों से विश्व के नेताओं को जलवायु संकट के लिए ज़िम्मेदार बताते हुए उचित कदम उठाने के लिए कहा। ग्रेता ने कहा कि वह अपनी तारीफ नहीं चाहती वह चाहती हैं नेता जलवायु संकट सुलझाने के लिए प्रयास करें।

ग्रेता तुंबरै का सफर

ग्रेता तुंबरै 26 अगस्त 2018 को ग्रेता तुंबरै को उनके स्कूली साथी और शिक्षकों का समर्थन मिल गया था। यहां तक कि बच्चों के अभिभावक में उनके साथ जुड़ गए। मीडिया की नज़र पड़ते है एक छोटी सी कोशिश आंदोलन बन गयी।

सितंबर 2018 में थंबर्ग ने हर हफ्ते शुक्रवार के दिन जलवायु से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन करना शुरू कर दिया। जिसका नाम फ्राइडे फ़ॉर फ्यूचर दिया गया। एक शुक्रवार पर्यावरण के नाम। स्कूल से शुरू हुई एक कोशिश बड़े बड़ों को प्रेरित कर रही है।

नवंबर 2018 में 24 से ज़्यादा देशों के 17000 से ज़्यादा बच्चों ने फ्राइडे स्कूल स्ट्राइक में भाग लिया। अब ग्रेता तुंबरै का आंदोलन आंतरराष्ट्रीय आंदोलन बन चुका था। थंबर्ग ने कई बड़े बड़े यूरोपीय संस्थानों के मंच से अपनी आवाज़ उठाना शुरू कर दिया। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित वार्ता में भी ग्रेता तुंबरै ने अपना ज़ोरदार भाषण दिया।

फरवरी 2019 को ग्रेता तुंबरै से प्रेरित होकर भारत समेत 30 से ज़्यादा देशों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए।

मार्च 2019 में ग्रेता तुंबरै को नोबल पीस प्राइज़ के लिए नामित किया गया। हड़ताल में भाग लेने वाले छात्रों की संख्या 20 लाख से ऊपर पहुंच चुकी है। 135 से ज़्यादा देश इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं। ग्रेता तुंबरै ने अमेरिकी कांग्रेस में खड़े होकर कहा कि यह दुखद है कि अमेरिका सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश हैं। प्रधानमंत्री मोदी को भी ग्रेता पर्यावरण के लिए उचित कदम उठाने की नसीहत दे चुकी हैं। ग्रेता तुंबरै की लगाई चिंगारी अब आग में बदल चुकी है। और इस आग से दुनिया को फायदा होगा यह तय है। बस ज़रूरत है हर देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों का आगे आना।