क्या होता है इस्लामिक बैंक, क्या भारत में भी खुलने चाहिए ऐसे बैंक?

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न्यूज़ डेस्क।। इस्लामिक य़ा शरिया बैंकिंग एक प्रकार की वित्तीय व्यवस्था है जो कर्ज़ पर ब्याज़ न वसूलने के सिद्धांत पर आधारित है। इस्लाम में ब्याज़ या सूद देना या लेना हराम माना गया है। इस वजह से कई मुस्लिम, बैंकिंग व्यवस्था से नहीं जुड़ पा रहे हैं।

2008 में वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के लिए बनी एक कमेटी ने ब्याज़ मुक्त ऋण व्यवस्था की संभावना तलाशने पर बल दिया था। इस कमेटी के अध्यक्ष रघुराम राजन थे।

फिलहाल भारत में तो इस्लामिक बैंक खुलने की संभावना नहीं लगती लेकिन दुनिया भर में कई ऐसे देश हैं जहां इस्लामिक बैंक एक सफल मॉडल है। आईए समझते हैं.. इस्लामिक बैंक क्या है? और बिना ब्याज़ लिए यह बैंक कैसे मुनाफा कमाते हैं…?

बीसवी शताब्दी के अंत तक दुनिया भर के कई मुस्लिम देशों ने अपनी इस्लामिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए मुस्लिम समाज के भीतर ही निजी बैंक और म्यूचुअल फंड कंपनियां स्थापित करना शुरु की। धीरे-धीरे यह चलन इतना बढ़ गया की 2009 आते-आते इस्लामिक सिद्धांत पर आधारित 250 म्यूचुअल फंड कंपनियां और करीब 300 बैंक दुनिया भर में कार्यरत हो गए।

इस्लामिक बैंकिंग का उद्देश्य धार्मिक मार्ग पर चलते हुए एक ऐसी व्यवस्था खड़ा करना है जो पश्चिमी देशों के राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव से मुक्त हो। इस व्यवस्था के पक्षकार मानते हैं कि अगर यह व्यवस्था पूरी तरह से लागू हो जाए तो बेरोज़गारी, महंगाई और गरीबी जैसी समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

कैसे काम करते हैं इस्लामिक बैंक?

इस्लामिक बैंक अपने ग्राहक के अच्छे व्यवहार को ध्यान में रख कर कर्ज़ देता है। कर्ज़ लेने वाले को उतनी ही धनराशी बैंक को वापस लौटानी होती है जितनी उसने लोन ली है, मतलब लोन पर ब्याज़ नहीं लगता। लेकिन यहां एक सवाल उठता है की फिर ये बैंक मुनाफा कैसे कमाते हैं

इस्लामिक बैंक अप्रत्यक्ष रुप से कमाई करते हैं। ये बैंक अपने यहां जमा धनराशी से अचल संपत्ति जैसे घर, ज़मीन, फ्लैट आदि खरीदते हैं। बैंक खरीदने के लिए खरीददार को कर्ज़ नहीं देते बल्कि बेचनेवाले से उस चीज़ को खुद खरीदकर अपने ग्राहक को लाभ के साथ बेच देते हैं और उनसे वे ईएमआई या किश्तों में उतना पैसा लौटाने को कहते हैं। अब बैंक जो इस निवेश से फायदा होता है वह ग्राहकों में बांटा जाता है और उसी से बैंक के अपने खर्चे पूरे किये जाते हैं। इस व्यवस्था में बैंक को जो घाटा होता है वह ग्राहक को भी वहन करना होता है।

उदाहरण के लिए- अगर मुझे घर खरीदना है तो मै इस्लामिक बैंक जाकर इसके लिए अर्ज़ी दूंगा तब बैंक मुझे इस काम के लिए पैसे न देकर वह घर खरीदकर देगा जो मैं खरीदना चाहता हूं और किश्तों में मुझे उतनी रकम चुकाने को कहेगा। मान लीजिए उस घर की मौजूदा कीमत 30 लाख है, तो बैंक 15 साल के लिए मेरी किश्ते बना देगा जिससे बैंक को 34-35 लाख रु मिल जाए।

दुनिया भर में इस्लामिक बैंक का कारोबार करीब 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है और हर वर्ष यह दो डिजित में वृद्धी कर रहा है। दुनिया भर के जाने माने बैंक जैसे सिटी बैंक ने भी इस वैकल्पिक बैंकिंग व्यवस्था में जाने की इच्छा जताई है।

भारत में इस व्यवस्था के पक्षकार मानते हैं कि देश में नरेंद्र मोदी सरकार इस व्यवस्था का विरोध केवल इसमें इस्लामिक शब्द जुड़ा होने की वजह से कर रही है। आने वाले समय में अगर भारत में यह व्यवस्था लागू होती है तो इससे मुस्लिम समुदाय के गरीब लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा जा सकेगा और उनके उत्थान और विकास में यह सुविधा कारगर साबित हो सकेगी।