पर्युषण पर्व: जानिए कैसे जैन धर्म के अहिंसा महापर्व से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है

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न्यूज़ डेस्क।। त्यौहार और रीति रिवाज़ ही भारत की विविध संस्कृति को सुसज्जित करते हैं। दिवाली, दशहरा, नौदुर्गा, गणेश चतुर्थी, रमज़ान और क्रिसमस के बारे में तो हम बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन जैन धर्म के पर्युषण पर्व के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी है। जैन धर्म में पर्युषण पर्व का सबसे अधिक महत्व है, इसीलिए इसे पर्वाधिराज यानी त्योहारों का राजा कहा जाता है। दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व भक्ति में सराबोर होकर अहिंसा के मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। इस दौरान जैन धर्म के अनुयायी तप, त्याग, सयंम और साधना के साथ इस बात का ध्यान रखते हैं की उनके द्वारा छोटे से छोटे जीव, प्रकृति और व्यक्ति को मन, वचन और कर्म से किसी तरह की हानि न पहुंचे। कठिन व्रत चर्या और नियमों का पालन कर लोग अहिंसा के इस महापर्व को खुशी और उल्लास से मनाते हैं।

दिगंबर और श्वेतांबर पंथ में विभाजित जैन धर्म में यह पर्व अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। दिगंबर जैन समाज इस पर्व को दस दिनों तक मनाता है इसलिए इसे दसलक्षण पर्व कहा जाता है, वहीं श्वेतांबर जैन में यह पर्व आठ दिन का होता है। अध्यात्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के विकारों, बुरी आदतों का त्याग कर सहज, सरल और संयमित जीवन जीने का वचन लेता है। जैन धर्म में माना जाता है कि व्यक्ति द्वारा किए गए बुरे कर्म उसके मोक्ष मार्ग में बाधा बनते हैं, और उसे जीवन मरण के इस चक्र से मुक्ति नहीं मिल पाती इसीलिए पर्युषण पर्व के दौरान उन सभी बुरे कर्मों का प्रायश्चित किया जाता है।

दिवाली की तरह ही घरों की सफाई की जाती है, मंदिरों को सजाया जाता है। इस दौरान भोजन बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों को भी शुद्ध किया जाता है। खाने में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ को धोकर या साफ कर ही प्रयोग में लाया जाता है। बहुत ही सात्विक ढंग से रसोई बनाई जाती है, इसका उद्देश्य होता किसी भी क्रिया में छोटे से छोटे जीव की हिंसा से बचना। मंदिरों में भक्तिमय वातावरण में पूजा-अर्चना की जाती है, तो संध्या काल में कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। पर्युषण पर्व के अंतिम दिन सभी एक दूसरे से उत्तम क्षमा बोलकर साल भर में हुई किसी भी तरह की गलती के लिए माफी मांगते हैं। और कहते हैं इस दिन सालों के मन-मुटाव, दुश्मनी और बैर-भाव क्षण भर में खत्म हो जाते हैं, क्योंकि इस दिन माफी मांगने की उर्जा स्वत: ही मिल जाती है।

आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक धर्म दूसरे धर्म का दुश्मन बना बैठा है, लोगों में जाति, धर्म, संप्रदाय को लेकर एक दूसरे के प्रति कटुता का भाव है। मानव ही मानव का दुश्मन बना बैठा है, विश्व में कई देश युद्ध की आंच झेल रहे हैं। धार्मिक हिंसा, जातीय हिंसा आम बात हो गई है, प्रकृति का हम बेतहाशा दोहन कर रहे हैं। अपने सुख के लिए हम बेज़ुबान जानवरों की हत्या कर रहे हैं और उस हत्या के लिए एक दूसरे की हत्या कर रहे हैं। अफवाहों को सच मानकर भीड़ बेगुनाह इंसानों को मारने से भी नहीं हिचक रही। ऐसे में जैन धर्म का यह त्यौहार हमें प्रकृति और जीवों से प्रेम करना सिखाता है। हमें प्रेरणा देता है किस तरह अहिंसा हमारे जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकती है। जियो और जीने दो का विचार अगर हर व्यक्ति अपने जीवन में उतार ले तो यह दुनिया जीने के लिए एक बेहतर जगह बन सकती है। ज़रुरत है तो बस सहिष्णुता, आत्मीयता और हर व्यक्ति को स्वीकारने की।