Home » Khalistan movement : क्या था ख़ालिस्तानी आंदोलन और किसने किया था शुरू ?

Khalistan movement : क्या था ख़ालिस्तानी आंदोलन और किसने किया था शुरू ?

Khalistan movement ख़ालिस्तानी आंदोलन
Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

ख़ालिस्तान.. ये नाम आपने ज़रूर पढ़ा या सुना होगा। दशकों से इस नाम की समय-समय पर चर्चा होती रही है। वर्तमान में सरकार द्वारा लाए गए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे किसान आंदोलन को मीडिया और सरकार द्वारा ख़ालिस्तानी आंदोलन (Khalistan movement) भी कहा जा रहा है। आख़िर क्या है ये ख़ालिस्तान और ख़ालिस्तानी आंदोलन ? आइये आज आपको बताते हैं इससे जुड़ी कुछ अहम जानकारियां।

कब शुरू हुआ ख़ालिस्तानी आंदोलन

अंग्रेज़ जब 1947 में भारत को दो टुकड़ों में बांटने की योजना पर काम कर रहे थे। तभी कुछ सिख नेताओं ने अपने लिए अलग देश ख़ालिस्तान बनाने की मांग शुरू कर दी। 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश आज़ाद हुआ और दो हिस्सों में तक़सीम हुआ। देश के बंटवारे के बाद बना पाकिस्तान। बंटवारे के साथ-साथ पंजाब सूबा भी इसकी चपेट में आया। जिसका बड़ा भाग पाकिस्तान के पास चला गया। लाहौर, जो कभी सिख साम्राज्य की राजधानी था वो एक मुस्लिम राष्ट्र में चला गया। इसी के बाद से सिखों ने अलग राष्ट्र ख़ालिस्तानी आंदोलन (Khalistan movement) की मांग पर ज़ोर देने शुरू कर दिया।

MSP का झुनझुना और डीज़ल की आड़ में बड़ा धोखा !

  • देश के बंटवारे के बाद लगातार एक और अलग देश ख़ालिस्तान बनाने की मांग ज़ोर पकड़ती रही। 1950 में अकाली दल ने पंजाबी सूबा आंदोलन के नाम से आंदोलन चलाया। भारत सरकार ने साफ़तौर पर पंजाब को अलग करने से मना कर दिया।
  • ये पहला मौक़ा था जब पंजाब को भाषा के आधार पर अलग दिखाने की कोशिश हुई। अकाली दल का जन्म हुआ। कुछ ही वक़्त में इस पार्टी ने बेशुमार लोकप्रियता हासिल कर ली। अलग पंजाब के लिए ज़बरदस्त प्रदर्शन शुरू हुए।
  • 1966 में भारत सरकार ने पंजाब को अलग राज्य बनाने की मांग मान ली लेकिन भाषा के आधार पर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना हुई।
READ:  Taliban's update : इमरान खान बन रहे थे तालिबान के हमदर्द, तालिबान ने कही ऐसी बात कि इमरान रह गए हक्के-बक्के!

अलग सिख देश की आवाज़ लगातार उठती रही। आंदोलन भी होता रहा। 1970 के दशक में ख़ालिस्तान को लेकर तमाम योजनाएं बनी। 1971 में गजीत सिंह चौहान ने अमेरिका जाकर वहां के अख़बार में ख़ालिस्तान राष्ट्र के तौर पर एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित कराया और इस आंदोलन को मज़बूत करने के लिए चंदा मांगा। बाद में 1980 में उसने ख़ालिस्तान राष्ट्रीय परिषद बनाई और उसका मुखिया बन गया।

Why reservation is still necessary to uplift the depressed classes?

ख़ालिस्तान के तौर पर स्वायत्त राज्य की मांग ने 1980 के दशक में ज़ोर पकड़ा। धीरे-धीरे ये मांग बढ़ने लगी और इसे ख़ालिस्तानी आंदोलन (Khalistan movement) का नाम दिया गया। अकाली दल के कमज़ोर पड़ने और ‘दमदमी टकसाल’ के जरनैल सिंह भिंडरावाला की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही ये आंदोलन हिंसक होता चला गया।’

स्वायत्त राज्य की मांग ने 1980 के दशक में ज़ोर पकड़ा।

  • 80 के दशक में ख़ालिस्तान आंदोलन पूरे उभार पर था। उसे विदेशों में रहने वाले सिखों के ज़रिए वित्तीय और नैतिक समर्थन मिल रहा था। इसी दौरान पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरावाले खालिस्तान के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरा।
  • उसने स्वर्ण मंदिर के हरमंदिर साहिब को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। उसने अपने साथियों के जरिए पूरे पंजाब में इस आंदोलन को खासा उग्र कर दिया। तब ये स्वायत्त ख़ालिस्तान आंदोलन अकालियों के हाथ से निकल गया।
  • तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए सिरदर्द बने इस मुद्दे के कई विकल्प शुरुआत में तलाशे गए। भिंडरवाला को स्वर्ण मंदिर से निकालने की तैयारी की जाने लगी। ‘ऑपरेशन सनडाउन’ बनाया गया, 200 कमांडोज को इसके लिए ट्रेनिंग दी गई। लेकिन बाद में आम नागरिकों को ज्यादा नुकसान की आशंका के चलते इस ऑपरेशन को नकार दिया गया।

आख़िर में इंडियन आर्मी ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को अंजाम दिया गया। 1 से 3 जून 1984 के बीच पंजाब की रेल, रोड और एयर ट्रांसपोर्ट सर्विस को रोक दिया गया। स्वर्ण मंदिर में पानी और बिजली की सप्लाई काट दी गई। स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया, भारी गोलीबारी के बाद जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया गया।

READ:  International news : क्या है हवाना सिंड्रोम? जिसने कोरोना के खत्म होने से पहले ही पसारे अपने पांव!

7 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर पर भारतीय सेना का नियंत्रण हो गया। इस ऑपरेशन के महज़ 4 महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही 2 सिख सुरक्षाकर्मियों ने कर दी ।

“Mulakaram” Tax for Breast: If Never Paid, Let them Bare

आज भी ख़ालिस्तान की मांग को लेकर कुछ सिख संगठन सामने आया करते हैं। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इसका ख़ामयाज़ा सिखों को उठाना पड़ा। देश भर सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़क गई और सिखों का सरेआम क़त्लेआम किया जाने लगा। देश की राजधानी में सिख समुदाए को सबसे अधिक हिंसा का सामना करना पड़ा था।

Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।