आम आदमी ‘हॉटलाइन’ पर क्यों नहीं कर सकता बात ?

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क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है कि हॉटलाइन का इस्तेमाल आम आदमी क्यों नही कर सकता ? अगर नहीं, तो आइए आज आपको बताते हैं कि हॉटलाइन को कौन लोग इस्तेमाल कर सकते हैं कौन नहीं।

हॉटलाइन एक खास संपर्क सेवा है जिसका उपयोग मुसीबत के समय किया जाता है। इसमें दो टेलीफ़ोन आपस में जुड़े होते हैं जो दो अलग-अलग देशों में होते हैं। जब भी इन दोनों देशों के प्रतिनिधि को आपस में ज़रूरी बात करना होती है तब ये इसके माध्यम से सीधे एक दूसरे से संपर्क करते हैं। अक्सर दो देशों के बीच हो रहे युद्ध के दौरान हॉटलाइन का सबसे ज्यादा प्रयोग किया गया है।

हॉटलाइन को आम बोल-चाल की भाषा में कहे तो ये एक फोन लाइन की तरह ही एक लाइन होती है। आमतौर पर इसका इस्तेमाल दो देशों के सर्वोच्च नेताओं जैसे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या शीर्ष अधिकारी आपस में बातचीत के लिए करते हैं। हॉटलाइन को सबसे सुरक्षित माध्यम माना जाता है।

दो देशों के बीच किसी तरह की समस्या या आपातकालीन स्थिति में इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही हॉटलाइन दो देशों के सैनिकों के बीच एक ‘वन टू वन कम्यूनिकेशन’ का ज़रिया भी है । दो देशों की सीमा पर सैनिकों के बीच जो टुकड़ी तैनात रहती है, उनके बीच बातचीत का ये एक ज़रिया होता है।

टेलिफोन से किस तरह अलग हॉटलाइन है?

टेलिफोन पर जब हम बात करते हैं तो पहले नंबर डायल करते हैं। लेकिन हॉटलाइन में ऐसा नहीं होता है। उसमें नंबर डायल करने की ज़रूरत नहीं होती है। रिसीवर उठाते ही दूसरी तरफ फोन लग जाता है। भारत में इस तरह की हॉटलाइन की पूरी व्यवस्था डायरेक्टर जनरल ऑफ़ मिलिट्री ऑपरेशन्स (डीजीएमओ) देखते हैं।

जैसे ही हॉटलाइन का फोन बजता है, सीमा पर तैनात सैनिकों को पता चल जाता है कि फोन सीमा पार के देश से आया है। दूसरी तरफ़ मैसेज रीसिव करने वाले तक संदेश भेज दिया जाता है। और जब दूसरे पक्ष को उस संदेश का जवाब देना होता है तो वो भी अपनी तरफ़ के हॉटलाइन का इस्तेमाल कर लेते हैं।

ये है हॉटलाइन का इतिहास

इसका का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड और अमेरिका के बीच किया गया। वैसे इसकी शुरुआत साल 1963 में रूस और अमेरिका के बीच हुई। अक्टूबर 1962 में शीत युद्ध के दौरान क्यूबा मिसाइल संकट के समय अमेरिका और सोवियत संघ न्यूक्लियर युद्ध के काफी करीब आ गए थे। वैसे दोनों देशों ने स्थिति को संभाल लिया। इसके बाद दोनों देशों को महसूस हुआ कि गलतफहमी के कारण कोई बड़ा संकट पैदा हो सकता है। उनको लगा कि संकट को टालने के लिए बेहतर संचार व्यवस्था का होना जरूरी है। इसके बाद दोनों देशों के बीच 20 जून, 1963 को हॉटलाइन सेवा शुरू की

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