क्या है यौमे क़ुद्स ? रमज़ान में मुसलमान इसे क्यों मनाते हैं ?

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Ground Report | News Desk

क़ुद्स की तारीख़ समझने के लिए सबसे पहले हमें यह पता होना ज़रूरी है कि ईरान में सन 1979 में इस्लामी इंक़ेलाब के रहबर आयतुल्लाह इमाम ख़ुमैनी ने यह एलान किया था कि माहे रमज़ान के अलविदा जुमे को सारी दुनिया “क़ुद्स दिवस” की शक्ल में मनाएं।

मुसलमानों का क़िब्ल ए अव्वल बैतुल मुक़द्दस

क़ुद्स का सीधा राब्ता मुसलमानों के क़िब्ल ए अव्वल बैतुल मुक़द्दस यानी मस्जिदे अक़्सा जो कि फ़िलिस्तीन में है, उसपर इज़राइल ने आज से 72 साल पहले लगभग सन् 1948 में अवैध क़ब्ज़ा कर लिया था जो आज तक बाक़ी है। इस्लामी तारीख़ के मुताबिक़ ख़ानए काबा से पहले मस्जिदे अक़्सा ही मुसलमानों का क़िब्ला हुआ करती थी और सारी दुनिया के मुसलमान बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ (चौदह साल तक) रुख़ करके नमाज़ पढ़ते थे, उसके बाद ख़ुदा के हुक्म से क़िब्ला बैतुल मुक़द्दस से बदल कर ख़ानए काबा कर दिया गया था जो अभी भी मौजूदा क़िब्ला है।

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इस्लामी तारीख़ के मुताबिक़ मस्जिदे अक़्सा सिर्फ़ पहला क़िब्ला ही नहीं बल्कि कुछ और वजह से भी मुसलमानों के लिए ख़ास और अहम है। पैग़मबर अपनी ज़िंदगी में मस्जिदे अक़्सा तशरीफ़ ले गए थे और वहीं से आप मेराज पर गए थे ( अल्लाह से बात करने आसमान पर )। इसकी शुरुवात सबसे पहले सन् 1917 में हुई जब ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश मंत्री जेम्स बिल्फौर ने फ़िलिस्तीन में एक यहूदी मुल्क़ बनाने की पेशकश रखी और कहा कि इस काम में लंदन पूरी तरह से मदद करेगा और उसके बाद हुआ भी यही कि धीरे धीरे दुनिया भर के यहूदियों को फ़िलिस्तीन पहुंचाया जाने लगा और आख़िरकार 15 मई सन् 1948 में इज़राइल को एक यहूदी देश की शक्ल में मंजूरी दे दी गई और दुनिया में पहली बार इज़राइल नाम का एक यहूदी मुल्क वजूद में आया।

इज़राइल और अरब मुल्क़ों के बीच बहुत सी जंगें

इसके बाद इज़राइल और अरब मुल्क़ों के बीच बहुत सी जंगें हुई मगर अरब मुल्क हार गए और काफ़ी जान माल का नुक़सान हो जाने और अपनी राज गद्दियां बचाने के ख़ौफ़ से सारे अरब मुल्क ख़ामोश हो गए और उनकी ख़ामोशी को अरब मुल्कों की तरफ़ से हरी झंडी भी मान लिया गया। जब सारे अरब मुल्क थक हार कर अपने फ़ायदे के ख़ातिर ख़ामोश हो गए ।

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लगभग सन् 1979 में इमाम ख़ुमैनी ने इज़राइल हुकूमत के मुक़ाबले में बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी के लिए माहे रमज़ान के आख़िरी अलविदा जुमे को “यौमे क़ुद्स” का नाम दिया और अपने अहम पैग़ाम में आपने यह एलान किया और लगभग सभी मुस्लिम और अरब हुकूमतों के साथ साथ पूरी दुनिया को इज़राइल फ़ितने के बारे में आगाह किया और सारी दुनिया के मुसलमानों से अपील की कि वह इस अवैध क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ आपस में एकजुट हो जाएं और हर साल रमज़ान के अलविदा जुमे को “यौमे क़ुद्स” मनाएं और मुसलमानों के इस्लामी क़ानूनों और उनके हुक़ूक़ के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करें।

इसलिए सन् 1979 में इमाम ख़ुमैनी साहब के इसी एलान के बाद से आज तक न सिर्फ़ भारत बल्कि सारी दुनिया के तमाम मुल्कों में जहां जहां भी मुसलमान, ख़ास तौर पर शिया मुस्लिम रहते है, वह माहे रमज़ान के अलविदा जुमे को मस्जिदे अक़्सा और फ़िलिस्तीनियों की आज़ादी के लिए एहतजाज करते हैं और रैलियां निकालते हैं।

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