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Happy Hypoxia: ‘साइलेंट किलर’ हैप्पी हाइपोक्सिया क्या है?

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कोरोना महामारी में हैप्पी हाइपोक्सिया बड़ी समस्या बनकर उभरी है। हैप्पी हाइपोक्सिया का खतरा सबसे ज्यादा युवाओं में देखने को मिल रहा है। इससे युवाओं को पता भी नहीं चलता और उनकी ऑक्सीजन लेवल धीरे-धीरे कम होता चला जाता है और फिर अचानक से ऑक्सिजन लेवल इतना डाउन हो जाता है कि इलाज का समय भी नहीं मिलता।

क्या है हैप्पी हाइपोक्सिया
हैप्पी हाइपोक्सिया कोरोना की विशिष्ट स्टेज मे से एक है। यह बीमारी संक्रमित शरीर में बहुत शांति के साथ घर करती है। इसमें मरीज को हार्टअटैक जैसा धक्का लगता है, जिसके बाद मरीज की मौत हो जाती है। खास बात यह है कि मरीज को पता ही नहीं लगता कि कब यह बीमारी उसे अंदर ही अंदर खत्म कर रही है। इसके शुरुआती स्तर पर कोई लक्षण देखने को नहीं मिलते हैं। यही वजह है कि इसे साइलेंट किलर के नाम से भी जाना जाता है।

हैप्पी हाइपोक्सिया कि स्थिति में क्या होता है
अक्सर इस बीमारी की चपेट में वह युवा आते हैं जिनके खून में ऑक्सीजन का स्तर कम पाया जाता है। इस बीमारी के चलते मरीज का ऑक्सीजन लेवल 30 से 50  फीसदी तक नीचे चला जाता है। खास बात यह भी है कि मरीज इसका अंदाजा भी नहीं लगा पाता। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि इसका प्रमुख कारण फेफड़ों में खून की नसों में थक्के जम जाते हैं। इस कारण फेफड़ों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन ना मिलने से ऑक्सीजन सैचुरेशन की मात्रा कम हो जाती है। एक रिपोर्ट में साबित हुआ है कि इस बीमारी में मरीज का दिल, दिमाग, किडनी जैसे शरीर के प्रमुख अंग चपेट में आ जाते हैं। यही कारण है कि सारे अंग सुचारू रूप से काम करना बंद कर देते हैं।

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हैप्पी हाइपोक्सिया के लक्षण

• इस बीमारी के चलते मरीज के होठों का रंग नीला होने लगता है।

• त्वचा के रंग में भी बदलाव देखने को मिलता है जिससे शरीर पर पल दिखने लगता है।

• मरीज के पसीने में भी अलग रंग का अस्तित्व पाया जाता है।

• ऑक्सीजन लेवल कम होने की वजह से सांस लेने में भी तकलीफ महसूस होती है।

• कई मरीजों में पाया गया कि इनका दिमाग चिड़चिड़ा होने लगता है। इसके पीछे का कारण मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी से कोशिकाओं का क्षतिग्रस्त होना है।

युवाओं को ही क्यों छू रहा है हैप्पी हाइपोक्सिया
अक्सर युवाओं में इम्यूनिटी लेवल अच्छा देखने को मिलता है। इसी कारण युवाओं अपने अंदर कम होने वाले ऑक्सीजन दर को पहचान नहीं पाते इसके फलस्वरूप उनमें लक्षण होते तो हैं पर वह महसूस नहीं कर पाते हैं। समय चलने के साथ ही बीमारी उनके शरीर में कर कर लेती है और मरीज को मौत के मुंह में धकेल देती है।

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