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आज़ादी महज़ औपचारिकता नहीं एक एहसास है…

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विचार, हर्षवर्धन सिंह सिसोदिया

71 साल हो गए आज हमें आज़ाद हुए, इतने सालों में एक पीढ़ी पैदा होकर खाक में मिल जाती है। काफ़ी समय से एक सवाल मन में कौंध रहा है, यह आज़ादी चीज़ क्या है? क्यों सारा देश 70 साल पहले हुई एक घटना की याद में जश्न मनाने लगता है? और क्या आज का हमारा आज़ाद सोच वाला ‘युवा’ इस आज़ादी से जुड़ाव महसूस करता है? उनके लिए आज़ादी के क्या मायने हैं?

ये जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं, आज़ादी के बाद के कुछ सालों में.. जब हमारे देश ने नया-नया आज़ादी का स्वाद चखा था। तब 15 अगस्त के दिन सरकारी स्कूल और दफ्तरों में ही नहीं भारत के हर घर में उत्सव का माहौल होता था, उमंग ऐसी मानो ईद या दीवाली हो। होती भी क्यों ना उस पीढ़ी ने इस बहुमूल्य आज़ादी को पाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। ग़ुलामी की घुटन के बाद मिली यह पहली ताज़ी बयार उन्हें बहुत भाती भी थी। नया दौर जैसी फिल्में उन्हें नए सपने देखने के लिए प्रेरित कर रही थी। पर आज का युवा शायद इस अहसास से उतना जुड़ा नहीं है। उसने आज़ाद भारत में जन्म लिया और हमेशा लोकतंत्र की छत्र छाया में खुद को पाया है। तो अगर 15 अगस्त के दिन उसके लिए एक औपचारिकता भर रह जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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वैसे भी आज के युवा की प्राथमिकताएं अलग हैं। कानों में हैडफ़ोन लगाए मेट्रो का इंतज़ार करता यह युवा अपने भविष्य के लिए फिक्रमंद है, लेकिन वह अब देश के निज़ाम की चिंता नहीं करता। अब गांधी, नेहरू और भगत सिंह रोल मॉडल नहीं रहे उनकी जगह स्टीव जॉब्स और अब्दुल कलाम जैसे भविष्योन्मुखी व्यक्तियों ने ले ली है। अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मस्त युवा भुला चुका है कि हम कभी ग़ुलाम भी थे।

स्कूली किताबों आदि से वह आज़ादी के संघर्षों के बारे में जानता है। जलियावाला बाग़ की घटना के बारे में पढ़कर उसे दुख होता है लेकिन अपने ही दौर में आसपास घट रही साम्प्रदायिक घटनाओं, दंगों और आतंकवाद की घटनाओं को देखकर उसकी संवेदनाएं जवाब देने लगती है। तब वह भारत की आज़ादी पर सवाल खड़ा करता है और ज़िम्मेदारों से जवाब मांगता है।

तब बीच में आती है राजनीति, पर उसे राजनीति से नफरत सी है, तब वह एक दोराहे पर आकर खड़ा हो जाता है। आज हम उसी दोराहे पर खड़े हैं। आज राष्ट्रवाद की नई-नई अवधारणाएं गढ़ी जा रही हैं। पाकिस्तान को कोसना देशभक्ति का पर्याय बन गया है। फिल्मी पर्दे पर हम सनी देओल को देशभक्ति के लिए दहाड़ता देखकर हम तालियां बजाते हैं। पाकिस्तान की दुर्गति देखकर हम खुद की समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर संतुष्ट रहते हैं।

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दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में हम कई अहम सवालों को नज़रअंदाज़ करते जाते हैं। अन्याय होता देख आंख मूंद लेते हैं, भरष्टाचार और बेरोज़गारी को कोसकर हम आगे बढ़ जाते हैं। व्यापम जैसी घोटाले भी हमारे सोये ज़मीर को जगा नहीं पाते। सिस्टम के सितम के सामने असहाय होकर या लड़ने की हिम्मत जुटाने से बेहतर हम फिर दोगुनी मेहनत में जुट जाते हैं। क्योंकिं बचपन से यही सीख मिली है… कर्म करो शेष ईश्वर पर छोड़ दो। लेक़िन असल में यहां ईश्वर, गॉड अल्लाह या भगवान नहीं… बल्कि सिस्टम है। वह ठीक चला तो मेहनत का फल मिल जाएगा अगर बेमानी पर उतर आया तो कौआ मोती खायेगा वाली नौबत ले आएगा। और हंस तो मेहनत कर ही रहा है…

मोटे तौर पर आज का युवा कुछ सोया हुआ सा है। उसके पास कोई विवेकानंद नहीं है। उसके गुस्से को दिशा देने के लिए कोई जेपी भी नहीं है। लेकिन फिर भी उसे उठना ही होगा चाहे जो भी हो। क्योंकि आज देश में इतिहास, अस्मिता, पहचान, धर्म सभी जगह नई परिभाषाएं नई अवधारणाएं गढ़ी जा रही हैं। उसे वर्तमान के धर्मनिरपेक्ष बनाम साम्प्रदायिकता के सस्ते संस्करणों से आगे बढ़कर उन मूल्यों को समझना होगा जिनपर चलकर हमने आज़ादी हासिल की है। उसे जानना होगा कि अपनी तमाम असफलताओं के बाद भी आज़ादी एक बड़ी नेमत है, जिसे हमने अपनी उदासीनता के कारण खो दिया है। और जिसे सहेजने के लिए हमे ही प्रयास करने होंगे। तब उसे शायद अहसास होगा कि क्यों सारा विश्व 125 करोड़ के इस चिर युवा लोकतंत्र को आश्चर्य से देखता है। और तब उसे अपनी आज़ादी का असली एहसास होगा। और महसूस होगी वह खुशबू जो आज से 70 साल पहले हमारे पूर्वजों को हुआ करती थी।
…….. जय हिंद……..

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