क्या है पर्यावरण प्रभाव आकलन क़ानून और क्यों ज़रूरी है इसे जानना ?

क्या है पर्यावरण प्रभाव आकलन क़ानून और क्यों ज़रूरी है इसे जानना ?

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

2018_02_01_39915_1517488289._large

मार्च महीने में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। नोटिफिकेशन में भारत में 2006 से लागू पर्यावरण प्रभाव आकलन क़ानून में बदलाव के लिए लोगों की राय मांगी गई। 11 अप्रैल से इस कानून के ड्राफ्ट को लोगों के लिए उपलब्ध करा दिया गया। जिसमें लोगों को राय देने के लिए आमंत्रित किया गया। सामान्यतः ऐसे ड्राफ्ट पर राय देने के लिए दो महीने का समय दिया जाता है। लेकिन कोविड-19 के कारण दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश पर सुझाव की तारीख 11 अगस्त तक बढ़ा दिया गया है।

राममंदिर भूमिपूजन: न्यूज़ रूम बने पूजा पंडाल तो न्यूज़ एंकर पुजारी

लेकिन इस नोटिफिकेशन के आने के बाद से ही पर्यावरण विशेषज्ञ इसका विरोध कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने इस क़ानून को 2006 से भी ज्यादा कमजोर कर दिया है। जिसका बूरा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ना तय है। अब सवाल उठता है कि आखिर क्या है पर्यावरण प्रभाव आकलन क़ानून और क्यों पर्यावरण प्रेमी इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं?

क्या है पर्यावरण प्रभाव आकलन क़ानून ?

भारत में 70-80 के दशक में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून बनाने के काम शुरू हुआ। लेकिन 1984 में हुए भोपाल गैस कांड के बाद महसूस किया गया कि पर्यावरण के लिए एक प्रभावी कानून की जरूरत है। इसके लिए 1986 में पर्यावरण संरक्षण कानून बनाया गया। इस कानून में ही बताया गया कि आने वाले समय में पर्यावरण प्रभाव आxकलन कानून भी बनाया जाएगा।

बिहार में बाढ़ : 7 लाख 66 हज़ार 7 सौ 26 हेक्टेयर में लगी फसल को हुआ भारी नुक़सान

ALSO READ:  कोरोना योद्धाओं की तरह पीपल बाबा के 'पर्यावरण योद्धा' दिन-रात कर रहे हैं पर्यावरण संवर्धन का काम

इस तरह 1994 में पहली बार पर्यावरण प्रभाव आंकलन कानून बना और लागू किया गया। साल 2006 में इस कानून में कुछ सुधार किए गए। इसके बाद 2020 तक यह कानून उसी रूप में लागू रहा। जिसमें एक बार फिर बदलाव किया जा रहा है।

यह क़ानून क्यों है महत्वपूर्ण ?


पर्यावरण प्रभाव आकलन कानून भारत में पर्यावरण संरक्षण को एक कानूनी ढांचा देता है। उदाहरण के लिए कोई बड़ी फैक्ट्री लग रही हो चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट। अब वह किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान ना पहुंचाए या प्राकृतिक संसाधनों का गलत तरीके से दोहन ना करें। इसके लिए वह फैक्ट्री शुरू होने से पहले उसका पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आंकलन कर एक रिपोर्ट बनाया जाता है। रिपोर्ट में कोई बड़ी खामी नहीं मिलने पर ही किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने की अनुमति दी जाती है। फिलहाल 2006 के कानून के मुताबिक 20 हजार वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में शुरू हो रहे सभी प्रोजेक्ट पर्यावरण प्रभाव आंकलन के दायरे में आते हैं।

क्या है बदलाव और क्यों है विवाद?

इस कानून में कौन-कौन से बदलाव किए गए हैं और उन पर क्यों है विवाद इसे बिन्दुवार समझा जा सकता है।

  • इस कानून के नए ड्राफ्ट में किसी भी प्रोजेक्ट को सामरिक महत्व का बता कर सरकार उसके बारे में सूचनाएं गोपनीय रख सकती है। और उसे पर्यावरण प्रभाव आंकलन कानून में छूट दिया सकता है। इससे पहले भी कानून में सामरिक प्रोजेक्ट में छूट का प्रावधान था, लेकिन वह सिर्फ देश की सूरक्षा से जुड़े परियोजनाओं के लिए था। ऐसे में, आशंका जताई जा रही है कि सरकार किसी भी प्रोजेक्ट को सामरिक बता कर अनुमति दे सकती है। इसमें ऐसे प्रोजेक्ट भी हो सकते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचे।
  • कानून के नए रूप में कई उद्योगों को सीधे छूट दे दी गई है। इसमें मुख्य रूप से रोड और गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट, 25 मेगावॉट से ऊपर के हाइड्रोइलेक्ट्रानिक प्रोजेक्ट, 2 हजार से 10 हजार हेक्टेयर की भूमि की सिंचाई परियोजना शामिल है। इसके अलावा देशभर में जलमार्ग बनाने और नेशलन हाईवे के चौड़ीकरण जैसे और भी कई परियोजनाएं को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है।
  • इन परियोजनाओं का पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के आंकलन में छूट देने पर भी सवाल उठाएं जा रहे हैं। इसका उदाहरण है मई महीने में विशाखापट्टनम के एलजी पॉलिमर्स प्लांट से गैस लीक की घटना। पर्यावरण मंत्रालय ने खुद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में जानकारी दी कि प्लांट को पर्यावरण कानूनों के तहत मंजूरी नहीं मिली थी। कुछ इसी तरह की लापरवाही असम के गैस कुंओ में लगी आग में भी सामने आई थी।
  • इसी तरह कानून में एक सबसे बड़ा बदलाव पोस्ट फैक्टो क्लीएरेंस को लेकर किया गया है। उदाहरण के लिए अगर कोई फैक्ट्री प्रदूषण फैला रही है तब भी वह काम करना जारी रख सकती है। बशर्ते वह पर्यावरण प्रभाव आंकलन कानून से स्वीकृति कुछ सालों बाद भी ले सकती है। जबकि इसी साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने एक आर्डर में कहा है कि केन्द्र सरकार कोई पोस्ट फैक्टो क्लीएरेंस नहीं देगी।
  • वहीं इस ड्राफ्ट में जनता द्वारा शिकायत करने का प्रावधान ही हटा दिया गया है। इससे पहले किसी परियोजना को लेकर जनता सरकार से शिकायत कर सकती थी। अब कानून में बदलाव के बाद यह संभव नहीं होगा। इसके उलट शिकायत का अधिकार खुद कानून तोड़ने वाले के हाथ में दे दिया गया है। इसके तहत जिसकी परियोजना है वह खुद सरकार को जानकारी दे सकता है या कोई सरकारी कर्मचारी।
  • इसके बाद विवादित प्रावधान है निर्माण क्षेत्र। पहले 20 हजार वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र पर किसी भी तरह के निर्माण से पहले पर्यावरण मंजूरी लेना जरूरी होता था। लेकिन 2020 के ड्राफ्ट में इसे बढ़ाकर डेढ़ लाख वर्ग मीटर कर दिया गया है।
  • इन सब बिन्दुओं के अलावा ड्राफ्ट को सिर्फ तीन भाषाओं में ही जारी किया गया है। जबकि भारत में अधिकारिक रूप से 22 भाषाएं हैं। ऐसे में, आशंका जताई जा रही है कि पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दे को लोगों की समझ से ही दूर किया जा रहा है।
  • ऐसे समय में जब पर्यावरण दुनिया की सबसे गंभीर समस्यों में से एक है। सरकार का इस कानून को कमजोर करना कई सवाल खड़े करता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण कानूनों की कीमत पर विकास भारत को आगे नहीं ले जा सकता।
ALSO READ:  पीपल बाबा का ये सुझाव अर्थव्यवस्था और पर्यावरण सुधार में लगा सकता है 'चार चांद'


Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।





Email