राजनीति+काला धन=इलेक्टोरल बॉन्ड ?

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इलेक्टोरल बॉन्ड यानी चुनावी चंदा हासिल करने वाले बॉन्ड। साल 2018 में भारत सरकार ने बॉन्ड की शुरूआत की थी। सरकार ने बॉन्ड की शुरूआत करते हुए ये दावा किया था कि बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता आएगी। इस बॉन्ड प्रक्रिया में व्यक्ति, कॉरपोरेट और संस्थाएं बॉन्ड खरीदकर राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में दे देती हैं। राजनीतिक दल इस बॉन्ड को बैंक के माध्यम से प्राप्त कर लेते हैं। भारतीय स्टेट बैंक की 29 शाखाओं को इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने और उसे भुनाने के लिए अधिकृत किया गया।

इसे टैक्स से भी छूट प्राप्त है

कोई भी डोनर अपनी पहचान छुपाते हुए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से एक करोड़ रुपए तक मूल्य के इलेक्टोरल बॉन्ड्स खरीद कर अपनी पसंद के राजनीतिक दल को चंदे के रूप में दे सकता है। ये व्यवस्था दानकर्ताओं की पहचान नहीं खोलती और इसे टैक्स से भी छूट प्राप्त है। आम चुनाव में कम से कम 1 फीसदी वोट हासिल करने वाले राजनीतिक दल को ही इस बॉन्ड से चंदा हासिल हो सकता है।

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मोदी सरकार ने 2 जनवरी 2018 को इलेक्टोरल बॉन्ड की शुरूआत करते हुए ये दावा किया था कि इससे चुनावी फंडिंग की व्यवस्था में सुधार आएगा। यह बॉन्ड साल में चार बार जारी किए जाते हैं। जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में इनको जारी किया  जाता है। ग्राहक बैंक की शाखा में जाकर या उसकी वेबसाइट पर ऑनलाइन जाकर बॉन्ड खरीद सकता है। सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड को फाइनेंस एक्ट 2017 के तहत ज़रिए लाई थी।

चुनाव आयोग की जांच के दायरे में नहीं आता बॉन्ड

जनप्रतिनिधित्व कानून (RP Act) की धारा 29 सी में बदलाव करते हुए कहा गया है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के द्वारा हासिल चंदों को चुनाव आयोग की जांच के दायरे से बाहर रखा जाएगा। चुनाव आयोग ने इसे प्रतिगामी कदम बताया है। चुनाव आयोग ने कहा कि इससे यह भी नहीं पता चल पाएगा कि कोई राजनीतिक दल सरकारी कंपनियों से विदेशी स्रोत से चंदा ले रही है या नहीं, जिस पर कि धारा 29 बी के तहत रोक लगाई गई है।

चंदा देने वाली की गोपनीयता और राजनीतिक फंडिंग में अपारदर्शिता बनी रहती है और यह सब चुनाव आयोग की जांच के दायरे से भी बाहर है। केवाईसी होने के बाद भी चंदा देने वाले के बारे में सिर्फ बैंक या सरकार को जानकारी हो सकती है, चुनाव आयोग या किसी आम नागरिक को नहीं।

KYC नॉर्म की होती है अहम भूमिका

इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने वाले व्यक्तियों की पैसे देने वालों के आधार और एकाउंट की डिटेल मिलती है। इलेक्टोरल बॉन्ड में योगदान ‘किसी बैंक के अकाउंट पेई चेक या बैंक खाते से इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सिस्टम’ के द्वारा ही किया जाता है। सरकार ने जनवरी 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड के नोटिफिकेशन जारी करते समय यह भी साफ किया था कि इसे खरीदने वाले को पूरी तरह से नो योर कस्टमर्स (केवाईसी) नॉर्म पूरा करना होगा और बैंक खाते के द्वारा भुगतान करना होगा ।

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सरकार का कहना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड में योगदान ‘किसी बैंक के अकाउंट पेई चेक या बैंक खाते से इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सिस्टम’ के द्वारा दिया जाता है। सरकार का यह भी तर्क है कि इन बॉन्ड को एक रैंडम सीरियल नंबर दिए गए हैं जो सामान्य तौर पर आंखों से नहीं दिखते। बॉन्ड जारी करने वाला एसबीआई इस सीरियल नंबर के बारे में किसी को नहीं बताता।

किस तरह काम करते हैं ये बॉन्ड

एक व्यक्ति, लोगों का समूह या एक कॉर्पोरेट बॉन्ड जारी करने वाले महीने के 10 दिनों के भीतर एसबीआई की निर्धारित शाखाओं से चुनावी बॉन्ड खरीद सकता है। जारी होने की तिथि से 15 दिनों की वैधता वाले बॉन्ड 1000 रुपए, 10000 रुपए, एक लाख रुपए, 10 लाख रुपए और 1 करोड़ रुपए के गुणकों में जारी किए जाते हैं। ये बॉन्ड नकद में नहीं खरीदे जा सकते और खरीदार को बैंक में केवाईसी (अपने ग्राहक को जानो) फॉर्म जमा करना होता है।

सियासी दल एसबीआई में अपने खातों के जरिए बॉन्ड को भुना सकते हैं। यानी ग्राहक जिस पार्टी को यह बॉन्ड चंदे के रूप में देता है वह इसे अपने एसबीआई के अपने निर्धारित एकाउंट में जमा कर भुना सकता है। पार्टी को नकद भुगतान किसी भी दशा में नहीं किया जाता और पैसा उसके निर्धारित खाते में ही जाता है।

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