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खुशवंत सिंह : एक ऐसा पत्रकार जिसने इंदिरा गांधी के इस फैसले पर कर दी थी बगावत

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रिपोर्ट, कार्तिक सागर समाधिया

मीडिया में कॉरपोरेट के बढ़ते दबाव को लेकर सवाल उठते आएं। हाल ही में नया जुमला निकल चुका है कि मीडिया बिकाऊ हो गयी है। भारत मे पीत पत्रकारिता का वो दौर नहीं रहा। हालांकि डर ये भी है कि अगर कोई आलोचनात्मक खबर भी लगाता है तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।

देश के जानेमाने पत्रकार पुण्यप्रसुन वाजपेयी से जुड़ा हाल ही का मामला हो या और कई सवाल। लेकिन हम बताते चले कि समुद्र में एक दो गंदी मछली आने से पूरा समुद्र गंदा नहीं हो जाता। भारतीय लोकतंत्र में कई बार ऐसा वक़्त आया है जब इसी मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने डटकर सामना किया है। इसी कड़ी में लाएं हैं हम इतिहास के पन्नो से खोदकर सरदार खुशवंत सिंह को, एक ऐसा पत्रकार जिसने सरकार के चलाये ब्लू आपरेशन का विरोध करते पद्म भूषण अवार्ड लौटा दिया। बिना किसी देरी बिना किसी सोच समझकर, वो भी तब जब वो राज्यसभा का स्वाद चख लिए थे। भारत पाकिस्तान विभाजन पर उनका नॉवेल भी आया था। नाम था “ट्रैन टू पाकिस्तान”। जिसपर 1998 में फ़िल्म भी बन चुकी है।

आपको बता दें खुशवंत सिंह का जन्म 15 अगस्त 1915 को हदाली(अब पकिस्तान में) पंजाब में हुआ था। उनकी मृत्यु 99 साल की उम्र में सन 2014 को हुई। उनकी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के सेंट स्टीफेन कॉलेज से हुई, फिर लॉ करने लन्दन के किंग्स कॉलेज चले गए। सबसे पहले बतौर ऑल इंडिया रेडियो में पत्रकार के तौर पर नौकरी लगी, यूनेस्को के डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिकेशन में 1956 को पेरिस में पदस्थ हुए। इसके बाद उन्होंने लिट्रेरी (साहित्यिक) कार्यों में अपना योगदान दिया। सत्तर के दशक में भारत लौटने के बाद 2 मैगज़ीन से जुड़े रहे। उनके सेंस ऑफ ह्यूमर सराहा गया। कई किताबें लिखी।

आपको बताते चले जब इंदिरा गाँधी ने ब्लू आपरेशन चलाया और इंडियन आर्मी ने अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में रैड मारी तो इस विरोध में अपना पद्म भूषण लौटा दिया। साल 2007 में उन्हें दूसरा सबसे बड़ा अवार्ड पद्म विभूषण देकर नवाजा गया। हाँ आखिर में जाते जाते अगर आपने उनकी “कंपनी ऑफ वीमेन” नॉवेल नहीं पढ़ी और उसमें भारत पाकिस्तान का जिक्र नहीं पढ़ा तो आप पाकिस्तान पर की गई सबसे बड़ी टिप्पणी को मिस कर जाएंगे।

(ऐसे ही कुछ अच्छे जॉर्नलिस्ट की कहानी आपके सामने लाते रहेंगे। )

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