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वह भवनियापुर गांव का ‘विकास दुबे’ है, ख़ुद को कहता है पुलिस का दामाद

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  •  वह महिला, पुरुष, गरीब, अमीर, नेता, प्रधान किसी को भी पीट सकता है
  • कथित दुर्दांत की करतूतें बच्चे-बच्चे को पहाड़े की तरह याद
  • वही पुलिस है, वही अदालत और वही कलेक्टर

लखनऊ : बाकी सारी चीजें उस गांव में सामान्य हैं। गांव के एक छोर पर नदी बहती है। कुछ तालाब हैं। तालाब में कुछ मछलियां हैं और एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर रही है। ग्रामीणों के शब्दों में उस मछली का नाम है राकेश। 27 साल का ऐसा निरक्षर कथित दुर्दांत जिसकी करतूतें गांव के बच्चे-बच्चे को पहाड़े की तरह रट गई हैं।

लेकिन न तो वह कोई मंत्री है, न विधायक है, न विधायक का बेटा और न प्रधानमंत्री उसके रिश्तेदार। वह कुछ नहीं है लेकिन वही सब कुछ है। गांव के जर्रे-जर्रे पर उसका एकक्षत्र राज है। वह किसी को भी पीट सकता है। महिला, पुरुष, अधेड़, बुजुर्ग, छोटा, बड़ा, गरीब, अमीर, अकेला, दुकेला, नेता, प्रधान किसी को भी।

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कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के डिस्ट्रिक्ट बहराइच में नानपारा कोतवाली से महज पांच किलोमीटर दूर भवनियापुर में यह निरक्षर ही सब कुछ है। वही पुलिस है, वही अदालत और वही कलेक्टर। यूं समझिए वह भवनियापुर गांव का ‘विकास दुबे’ है।

राकेश की गतिविधयों से मौजे में तीन गांव के लोग परेशान हैं मगर कोई पुलिस के सामने यह सब बताने का हिम्मत नहीं जुटा पाता। देखकर नहीं लगता कि यह गांव इतने ताकतवर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन वाले प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सिर्फ 160 किलोमीटर दूर है और जहां पहुंचने में जिला मुख्यालय से महज 40 मिनट लगते हों।

राकेश हत्या तक कर दे तो उसके खिलाफ कोई गवाही देने वाला न मिले

जहां अपराध रोकने के लिए जिलेभर में 21 पुलिस थाने बनाए गए हों, हर थाने में दर्जनभर से ज्यादा दरोगा, सिपाही, कोतवाल हों उसी जिले के एक ढाई हजार आबादी और 450 घरों वाले गांव में एक थाने में मामूली खाना बनाने वाला बावर्ची कई साल से इतना तांडव कैसे करता आया है, दिल्ली और लखनऊ में बैठे मीडिया से जुड़े लोग, जो भी इस बारे में सुनता है सुनकर दंग है।

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एक बुजुर्ग ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि साहब, आप मामूली झगड़े की बात पूछते हैं, गांव में राकेश का इतना खौफ है कि अगर वह किसी की हत्या तक कर दे तो उसके खिलाफ कोई गवाही देने वाला न मिले।

बहुत खोदने पर गांव के बाहर भैंस चरा रहा राकेश का एक करीबी युवक ठेंठ अवधी में कहता है, ‘आप हमार नाम न छपिहो। राकेश की गुंडई को हम सही नहीं कहित लेकिन ऊ कोई के लिए कुछु होय जस भी है हमरे दोस्त है। हमरे काम आवत है। कबहूं-कबहूं दारू-मुर्गा का भी इंतजाम कराय देत है। सिपाही दरोगा उका खूब मानत हैं। ऊ अकसर कहत है कि येत्ता तो हमरे खुद के ससुर न मानत होइहैं। दमाद हूं ई पुलिसवालेन के।’

(आप मेरा नाम मत छापिएगा। राकेश की गुंडई को मैं जायज नहीं ठहरा रहा लेकिन वह किसी के लिए कुछ भी हो, जैसा भी हो मेरा दोस्त है। मेरे काम आता है। कभी-कभी दारू-मुर्गे का भी इंतजाम कर देता है। सिपाही, दरोगा उसे खूब मानते हैं। वह अक्सर कहता है कि इतना तो मुझे खुद के ससुर नहीं मानते हैं। दामाद हूं इन पुलिसवालों का।)

गांव में महिला को कपड़े फाड़ घुमाया जाता रहा, बाहर चाय पीती रही पुलिस

गांव के ठीक बाहर एक पुलिस बूथ है। जहां दो-एक सिपाही और एक महिला पुलिसकर्मी हमेशा रहते हैं। ऐसी सुविधा आसपास के 10-20 गांव में नहीं, लेकिन यह बूथ और यह पुलिसकर्मी कम से कम राजू जैसे किसी गरीब और असहाय के किसी काम के नहीं हैं।

राजू पत्रकार प्रियांशू के पिता पर अटैक के मामले में गवाह है। उस केस का मुख्य अभियुक्त राकेश तीन दिन पहले राजू की 59 साल की बीमार मां को कपड़े फाड़कर घर से खींच लाया। बाल पकड़कर पीटते हुए गांव में परेड कराई। पूरे गांव में हाहाकार मच गया और 500 मीटर दूर बैठी पुलिस चाय पीती रही।

विधायक कुछ नहीं कर पाए, प्रधान कुछ नहीं कर पाए तुम क्या कर लोगे?

गांव से थोड़ी दूरी पर एक पुलिया है। जहां सूर्यास्त हो रहा है। थोड़ी देर में अंधेरा हो जाएगा। इस दृश्य को हम कैमरे में दर्ज करने के लिए उतरते हैं। दो एक फोटो लेते हैं कि वहां एक अधेड़ उम्र की बुजुर्ग पहुंचती हैं। राकेश के बारे में पूछने पर कहती है कि उसे कौन नहीं जानता। अपना जख्म जो अब भर चुका है उसे दिखाते हुए वह कहती हैं कि साल भर पहले राकेश ने मुझे पीटा था, दरवाजा तोड़कर।

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उस महिला के मुताबिक, राकेश पूर्व प्रधान तक को पीट चुका है। मौजूदा प्रधान को जहां-तहां धमकाता रहता है, बीजेपी के सिटिंग विधायक सुरेश्वर सिंह के पेट्रोल पंप पर उनके लोगों को पीटकर लूटपाट कर ली और कोई एक एफआईआर तक दर्ज नहीं करा सका। गांव के एक युवक पर जलती चाय फेंक दी, खुद अपनी मां का हाथ तोड़ चुका है, पत्नी को आए दिन पीटता है। वह लोगों को पीटकर कहता है कि प्रधान मेरा कुछ नहीं कर पाए, विधायक कुछ नहीं कर पाए तुम क्या कर लोगे?

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सूरज ढल चुका है। अंधेरे ने रोशनी की जगह ले ली। सूरज कल भी निकलेगा रोशनी कल भी होगी लेकिन इस गांव में कई साल से फैला अंधेरा कब छटेगा, कब राजू जैसे लोग सुकून से सो सकेंगे, कब ग्रामीणों के दिलों में बैठ चुके भय से उन्हें मुक्ति मिलेगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

यूपी के भवनियापुर से रजनीश की रिपोर्ट

(रजनीश भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के छात्र रह चुके हैं। वह फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं।)

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