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सरकार के इतने वादे और योजनाओं के बाद भी भारत में शहरीकरण व्यवस्था अनियोजित?

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नई दिल्ली, 27 जुलाई। भारत में शहरीकरण किसी योजना के अंतर्गत नहीं हुआ था। अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेजो ने शुरुआत में समुद्र से लगे तीन शहरों का विकास किया और बाकी क्षेत्रो पर कम ध्यान दिया।  लेकिन जैसे जैसे भारत में रेल का जाल बिछता गया, मुग़ल शासन के कई क्षेत्र जैसे पटना और सूरत में भी आधुनिकीकरण होने लगा।  हिमालय के पहाड़ी इलाको को अंग्रेजो ने अपनी सहूलियत के हिसाब से विकासित किया। जहाँ जहाँ खेती होती थी वहां भी कुछ शहर बन गए। और औद्योगीकरण के बाद जमशेदपुर जैसे शहर विकसित हुए और जहाँ छावनी थी वहां मेरठ और अहमदनगर जैसे शहर बने। रेलवे स्टेशन के आसपास लोगो ने रहना शुरू कर दिया और जहाँ जगह मिली वहां बाज़ार लगने लग गए। भारत में बेहद अनियोजित ढंग से शहरीकरण हुआ है। जो कि अब एक क्रम में लाना बहुत मुश्किल है।

आज हमारे देश की कुल जनसँख्या में 34 प्रतिशत लोग शहरों में रहते हैं। और आंकड़ो के अनुसार 2050 तक ये संख्या 84 करोड़ हो जाएगी। फिर भी हमारे शहर बहुत सारी असुविधाओं से ग्रस्त हैं, बहुत ज्यादा गरीबी है, मूलभूत व्यवस्थाएं लगभग न के बराबर हैं। जैसे जैसे शहरी जनसँख्या बढेगी वैसे ही बुनियादी आवश्यकताओं का भी आभाव हो जायेगा। साफ़ पानी, पानी की निकासी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसी समान्य सुविधाओं से भी देश के शहर वंचित हैं।

अभी फिलहाल 90 से ज्यादा स्मार्ट शहरों द्वारा 2864 परियोजनाओं को देखा गया. जिनमें से केवल 148 परियोजना ही पूरी हो पाई हैं, और इनमें से 70 फीसदी परियोजनाएं ऐसी हैं जो अभी शुरू भी नही हुई हैं।  हमारे देश के शहरों में सस्ते (अफोर्डेबल) घरों की बहुत ज्यादा कमी है, शहरों में लगभग एक करोड़ घर चाहिए। लेकिन फिर भी सरकार की इतनी योजनाओं से हम केवल अपना मन भर लेते हैं।

मुंबई में  हर साल बाढ़ आती है लेकिन प्रशासन के द्वारा बाढ़ को रोकने लिए उपयुक्त कदम नहीं उठाये जाते। दिल्ली में हर साल डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों की समस्याएं है लेकिन इस तरफ भी प्रशासन का ध्यान अभी तक पूरी तरह नहीं गया है। बेंगलुरु की झील में प्रदूषण के कारण फोम जमा होने से हर साल आग लगती है लेकिन इसे भी प्रशासन नज़रअंदाज़ किये हुए है. ऐसी तस्वीरें हर साल देखने को मिलती है।

आज शहरों की स्थिति ऐसी है कि लोग विपरीत पलायन करने लगे हैं। जैसे हर साल हरियाणा से किसान दिल्ली और आसपास के इलाके जैसे गुरुग्राम में काम करने के लिए जाते हैं। लेकिन सर्दियों में प्रदुषण की मात्रा ज्यादा होने की वजह से वह वापस अपने गाँव चले जाते हैं। अभी अहमदाबाद से 15 किलोमीटर दूर भवानपुर गाँव को शहर में शामिल किया गया, वहां के लोगो ने इसका विरोध किया। और शहर में शामिल होने से साफ़ इनकार कर दिया। वैसे शहरो में शामिल होने के बहुत सारे फायदे भी होते हैं लेकिन फिर भी गाँव के लोग शहर में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं। ये चीजें हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि गलती अगर है तो कहाँ है? शहरीकरण की प्रक्रिया ठीक से नहीं चल रही है तो हमें ये देखना होगा कि कौनसे वो मुद्दे हैं जो इसके लिए ज़िम्मेदार हैं।

शहरीकरण से जुड़े हुए कई मुद्दे हैं।  जैसे विभिन्न राज्यों की शहरीकरण की परिभाषा में काफी अंतर है। वैसे शहरी विकास राज्य सरकार के अंतर्गत आता है। किसी जगह की जनसंख्या, आबादी, राजस्व की वसूल और खेती न करने वाली जनता के आधार पर राज्यपाल किसी भी क्षेत्र को शहर घोषित कर सकते हैं। ये परिभाषा काफ़ी अस्पस्ट है। अगर राज्यपाल किसी क्षेत्र को शहर घोषित करते हैं तो वहां पर नगरपालिका आ जाएगी, लेकिन क्योंकि परिभाषा अस्पष्ट है तो काफी मनमानी देखने को मिलती है। और हमारे देश के शहरी संस्थानों में कौशल की कमी हैं जिसकी वजह से सही विकास नहीं हो पाता।

दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में देशभर से लोग आकर काम करते हैं। हमारे देश में पलायन को सरकार अच्छा नहीं मानती। सरकार नहीं चाहती कि लोग गाँवों से शहरों में आये। जबकि पलायन अपने आप में काफी फायदेमंद है, गरीबी को रोकती है। गाँव में अगर किसी का गुज़ारा नहीं हो पा रहा होता है तो वो शहर में काम करने से अपना पेट पालता है। लेकिन पलायन के लिए एक विधि होनी चाहिए, फिर भी सरकार पलायन रोकने की योजनायें बनाती है। जैसे 2004 में ‘पूरा’ योजना आई जिसमें शहर की सुविधाओं का गाँवों बंदोबस्त करने का प्रावधान था, ताकि लोगो को पलायन न करना पड़े। और अभी कुछ सालो पहले आई ‘शामा प्रसाद मुख़र्जी नेशनल रूरल मिशन’ योजना का भी मकसद पलायन को रोकना था। सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव लाने की सख्त ज़रूरत है। पलायन के आंकड़ो को देखते हुए सरकार को शहरों में उसके मुताबिक़ सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए ताकि पलायन अगर हो भी, तो शहरों में पलायन से कोई समस्या न हो।

अगर हमें भारत को विश्व के मानचित्र पर चमकाना है तो शहरो में परिवर्तन लाना होगा। नगर पालिका और अन्य स्थानीय शहरी संस्थानों को स्वतंत्रता देनी होगी, ताकि वो अपने हिसाब से शहरो को विकसित कर सकें। क्योकि नगर पालिका जैसे संस्थानों को क्षेत्र के बारे में ज्यादा पता होता है। उनके पास आजादी होनी चाहिए ताकि वो शहरो का बेहतर ढंग से विकास कर सकें। सरकार की नीतियाँ जिस दिशा में हैं, उनसे कई बेहतर तरीके से निकाले जा सकते हैं।

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