काश सरकार ने कोई रोज़गार सेतु एप भी बनाया होता

Unemployment in India amid Lockdown
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विचार । पल्लव जैन

देश का एक ऐसा वर्ग भी है जो चुपचाप लॉकडाउन में खुद को तबाह होते देख रहा है। वह है देश का मध्यमवर्ग, जो प्राईवेट कंपनियों में नौकरी करता है या फिर छोटा-मोटा व्यापार कर अपना घर चलाता है। मज़दूरों की बात हमने की उनका दर्द भी देखा। जब टीवी पर मज़दूरों के कई किलोमीटर पैदल चल गांव जाने की तस्वीरें आई तो सरकार भी जागी और कुछ राहत के ऐलान उनके लिए किये। लेकिन देश के मध्यमवर्ग पर अब तक सरकार का ध्यान नहीं गया, न ही मीडिया का, क्योंकि वह चुपचाप खुद को बर्बाद होता देख रहा है।

कई लोग दुकानों पर काम करते हैं, मॉल में नौकरी करते हैं, कोई सेल्समैन है तो कोई कॉट्रैक्ट बेसिस पर कंपनियों में काम करता है, कोई अपनी छोटी सी कंपनी चलाता है, तो कोई होटल या ट्रैवल एजेंसी के लिए काम करता है। इन सभी पर नौकरी गंवाने का संकट मंडराने लगा है। जैसे-जैसे लॉकडाउन खुलने की संभावना घट रही है कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी करना शुरु कर दी है। कई जगह सैलरी में कटौती कर दी गई है। कितने लोग इस दौरान बेरोज़गार हुए इसका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। काश कोई ऐप ही बना दिया होता जहां जाकर लोग अपने बेरोज़गार होने का स्टेटस अपडेट कर पाते।

अमेरिका में 50 लाख से ज़्यादा लोग बेरोज़गारी भत्ते के लिए रजिस्टर कर चुके हैं। क्योंकि लॉकडाउन की वजह से उनकी नौकरियां चली गई। यूएस सरकार इन सभी लोगों को आर्थिक पैकेज में हुए ऐलान के हिसाब से बेरोज़गारी भत्ता दे रहा है। लेकिन हमारे यहां ऐसी कोई प्रक्रिया है ही नहीं। सरकार यह जानना ही नहीं चाहती कि कितने लोग बेरोज़गार हुए हैं, क्योंकि भारत सरकार द्वारा दिए गए 20 लाख करोड़ के पैकेज में इन बेरोज़गारों के लिए कोई प्रावधान ही नहीं है।

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माय हायरिंग क्लब डॉट कॉम और सरकारी नौकरी डॉट इंफो ने हाल ही में ले ऑफ पर सर्वे करवाया जिसमें 68 प्रतिशत इंप्लॉयर्स ने कहा की उन्होंने अपने यहां लोगों की छंटनी की प्रक्रिया शुरु कर दी है या प्लान कर रहे हैं। स्विगी और जोमैटो जैसी फूड डिलीवरी कंपनियों ने अपना 14 फीसदी तक स्टाफ घटाने का फैसला कर लिया है। वहीं उबर कैब सर्विस ने भी अपने कई कर्मचारियों की छुट्टी कर दी है। ऐसे में देश में कई लोगों के सामने बेरोज़गारी का संकट मंडरा रहा है। ये वे लोग हैं जिन्होंने हमेशा देश की प्रगति के लिए समय पर टैक्स भरा लेकिन आज संकट के समय में वे सभी अकेले खड़े हैं। सरकार द्वारा घोषित किये गए आर्थिक पैकेज में बेरोज़गारों को कोई फौरी मदद का ऐलान नहीं किया गया। सरकार ने कंपनियों को बचाने के लिए बिना ग्यारंटी कर्ज़ का तो ऐलान किया लेकिन इससे भी कर्मचारियों की छंटनी रुक जाएगी इसकी संभावना नहीं है। देश का मीडिया जो अपनी जान जोखिम में डाल कर दिन रात कोरोनावायरस की कवरेज कर रहा है, संकट के दौर का सामना कर रहा है, वहां भी लोगों की छंटनी शुरु हो चुकी है। देश के प्रतिष्ठित अखबार मालिकों ने नुकसान को देखते हुए कर्मचारियों की छंटनी शुरु कर दी है। मीडिया इंडस्ट्री ने सरकार से आर्थिक पैकेज की मांग की थी लेकिन उसपर सरकार की ओर से कोई ऐलान नहीं किया गया।

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यह तो बात नामी कंपनियों की है, देश में कई छोटी-छोटी कंपनियां बंद होने की कगार पर हैं उनके पास कर्मचारियों को सैलरी देने के पैसे नहीं है। आप ही सोचिए लॉकडाउन में अगर लोगों की नौकरी चली गई तो उनके लिए दूसरी नौकरी ढूंढना भी आसान नहीं होगा। ऐसे में सरकार को बेरोज़गार हो चुके लोगों को कुछ समय के लिए आर्थिक सहायता करनी चाहिए। विप्रो के मालिक अजीम प्रेमजी ने भी शहरी गरीब मज़दूरों को प्रति माह 25 दिन के बेरोज़गारी भत्ता देने की वकालत की है। लेकिन सरकार ने 20 लाख करोड़ के पैकेज में कर्ज़ देने पर ज़्यादा जोर दिया है।

कैनेडा, अमेरिका और यूरोप की सरकारों की ओर से दिए गए आर्थक पैकेज में भी बड़ी मात्रा में बेरोज़गारी भत्ते दिए जा रहे हैं। ऐसे में भारत का आर्थक पैकेज निराश करने वाला है। यहां कई लोगों का मानना है कि लोगों को बैठा कर खिलाने की क्या ज़रुरत है। तो मै उनसे कहूंगा कि यह आपातकालीन स्थिति है, इसमें लोगों को सरकार की ओर से बेसिक आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए ताकि उनके सामने भूखा मरने की नौबत न आए।

कई छात्र जिन्होंने सरकारी नौकरियों की सभी परिक्षाएं पास कर ली हैं अपने नियुक्ति पत्र मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। ऐसे कई छात्र रोज़ाना सरकार के मंत्रियों को टैग करके नियुक्ति के लिए गुहार लगाते हैं लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब उन्हें नहीं दिया जा रहा। इन छात्रों का आरोप है कि वे पिछले 5 महीनों से नियुक्ति पत्र मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर उनकी नियुक्ति हो जाती तो वे संकट के इस दौर में अपने परिवार की मदद कर पाते। सालों मेहनत कर जिन छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षा पास कर यह नौकरी पाई वे निराशा के माहौल में घिर चुके हैं। और सरकार मौन हो कर बैठी है।

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बेरोज़गारी एक भीषण समस्या है हमारी सरकारों ने कभी देश में कितने बेरोज़गारी है इसका असल डेटा जुटाने का प्रयास नहीं किया। मोदी सरकार के दौर में तो बेरोज़गारी के आंकड़ों को छुपाया भी गया। हमारी सरकार देश में कितने घुसपैठियें हैं इसका सर्वे कराने के लिए अगर इतनी जी जान से मेहनत कर सकती है तो फिर बेरोज़गारी का आंकड़ा जुटाने का प्रयास क्यों नहीं कर सकती।

सरकार को आरोग्य सेतु की ही तर्ज पर एक पोर्टल या एप जारी करना चाहिए जहां हाल ही में लॉकडाउन की वजह से अपना रोज़गार खो चुका व्यक्ति जाकर रजिस्टर कर सके और सरकार उसकी आर्थिक मदद कर सके। इस कदम से लाखों लोगों को फौरी राहत मिल सकती है।

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