Udham Singh: शहीद उधम सिंह, जिन्होंने लिया ‘जलियांवाला बाग़’ हत्याकांड का बदला

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उधम सिंह (Udham Singh) का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था. बचपन में उनका नाम शेर सिंह रखा गया था. छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया उठ जाने से उन्हें और उनके बड़े भाई मुक्ता सिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी. यहीं उन्हें उधम सिंह नाम मिला और उनके भाई को साधु सिंह. 1917 में साधु सिंह भी चल बसे. इन मुश्किलों ने उधम सिंह को दुखी तो किया, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताकत भी बढ़ाई. 1919 में जब जालियांवाला बाग कांड हुआ तो उन्होंने पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने का फैसला कर लिया. तब तक वे मैट्रिक की परीक्षा पास कर चुके थे.

जलियांवाला बाग हत्याकांड

13 अप्रैल, 1919 ही वह दिन था, जब पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में हजारों लोग बैसाखी के पावन पर्व को मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे. यह दिन ब्रिटिश क्रूरता का प्रतीक माना जाता है. जनरल ड्वायर ने बाग से निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिए. बाग में जाने का जो एक रास्ता खुला था जनरल डायर ने उस रास्ते पर हथियारबंद गाड़ियां खड़ी करवा दी थीं. जनरल डायर के आदेश पर गोलियां चलाईं गयीं. इस दिन हजारों भारतीय उनकी गोलीयों का शिकार हुए. जलियांवाला बाग में उस दिन 1650 राउंड फायर हुए थे. सरकारी आकड़ो के मुताबिक 379 लोग मारे गए और 1500 लोग घायल हुए. हालांकि मरने वालों की संख्या 1000 के आसपास थी.

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शहीद उधम सिंह(Udham Singh) का बढ़ता आक्रोश

जलियांवाला हत्याकांड वाले दिन सरदार उधम सिंह ने हजारों भारतीयों की हत्या का बदला लेने का प्रण लिया. इसके बाद से वे क्रांतिकारियों के साथ शामिल हो गए. अमेरिका और कनाडा के भारतीयों ने मिलकर 1913 में एक गदर पार्टी बनाई. जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारत में क्रांति लाना था. 1924 में उधम सिंह इस पार्टी से जुड़ गए. और दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और भिन्न-भिन्न देशों में यात्रा करने लगे. इस बीच कई भारतीय और देश के बड़े क्रांतिकारी अंग्रेजो से लड़ते हुए जान दे रहे थे. सरदार उधम सिंह भगत सिंह को अपना गुरु मानते थे. भगत सिंह के कहने पर 1927 में वे भारत लौट आए. अपने साथ कुछ साथी, रिवॉल्वर और गोला बारूद भी लाए. अवैध हत्यार रखने के जुर्म में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनपर मुकदमा चलता रहा और 5 साल की सजा हुई.

डायर की मौत

उधम सिंह जलियांवाला बाग नरसंहार से इतने आक्रोशित थे कि उनके लंदन पहुँचने से पहले ही 1927 में जनरल डायर की ब्रेन हेमरेज से मौत हो गई. लेकिन उधम सिंह ने नरसंहार के वक्त पंजाब के गवर्नर रहे माइकल फ्रेंसिस ओ’ डायर से बदला लेने की ठानी. 13 मार्च, 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी की लंदन के कॉक्सटन हॉल में बैठक थी. जिसमें डायर स्पीकर के रूप में शामिल होने वाले थे. उधम सिंह भी वहां पहुँचे वे अपनी रिवॉल्वर एक किताब में छिपाकर ले गए थे. मोर्चा संभालते हुए डायर पर मौका मिलते ही उधम सिंह ने निशाना साधा और गोलियां चला दी. उधम सिंह की दो गोलियां डायर को लगीं और उनकी मौके पर ही मौत हो गई. और इसके साथ शहिद उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की. उन्होंने वहां से भागने की भी कोशिश नहीं की और अरेस्ट हो गए. 

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सरदार उधम सिंह को फांसी

4 जून,1940 को उन्हें अदालत में दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई, 1940 को उन्हें फांसी दे दी गई. सरदार उधम सिंह की यह कहानी आंदोलनकारियों को प्रेरणा देती रही. इसके बाद अंग्रेजों को 7 साल के अंदर देश छोड़ना पड़ा और भारत आजाद हो गया. उधम सिंह जीते जी भले आजाद भारत में सांस न ले सके, पर करोड़ों हिंदुस्तानियों के दिल में रहकर वो आजादी को जरूर महसूस कर रहे होंगे.

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ये लेख स्वाति गौतम ने लिखा है. स्वाति ग्राउंड रिपोर्ट में शिक्षा, राजनीति व किसानो से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं.

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