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Trolley Times : दलाल और मोदी मीडिया के मुंह पर तमाचा, किसानों ने शुरू किया अपना अख़बार

Trolley Times
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नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन आज 24वें दिन भी जारी है। हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में भी हजारों की संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्श कर रहे हैं।इस बीच शुक्रवार की सुबह सिंधु और टिकरी बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों के बीच ट्रॉली टाइम्स (Trolley Times) नाम के अखबार की 2,000 प्रतियां बांटी गईं।

किसान कहते हैं- ‘हम 26 नवंबर को यहां आए, और जल्दी ही नेशनल मीडिया ने, हमें आतंकवादी या खालिस्तानी बुलाना शुरू कर दिया। लेकिन हम वैसे लोग बिल्कुल नहीं हैं। हम इससे बहुत जुड़े हुए हैं, कि इसे एक शांतिपूर्ण आंदोलन कैसे बनाया जाए’।

किसने शुरू किया ट्रॉली टाइम्स

दि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह समाचार पत्र चार पन्नों का है। इसे हिंदी और पंजाबी भाषा में प्रकाशित किया गया था। किसान आंदोलन में शामिल 46 वर्षीय एक पटकथा लेखक सुरमीत मावी ने शुरु किया है। ट्रॉली टाइम्स (Trolley Times) का पहला संस्करण, 12,000 रुपए की लागत से गुड़गांव में छापा गया। क़रीब 2,000 प्रतियां छापी गईँ, जिनमें 1,200 सिंघू बॉर्डर और 800 टीकरी बॉर्डर के लिए थीं।

सरकार-अडानी की मिलीभगत, एक और बड़ा घोटाला !

किसान आंदोलन के दौरान ही सुरमीत मावी को अपने अन्य साथी और पंजाबी किसान नरिंदर भिंडर की ट्रॉली के अंदर बैठे-बैठे अखबार का आइडिया आया।इसके बाद सुरमीत मावी ने बरनाला स्थित फोटोग्राफर गुरदीप सिंह धालीवाल के साथ ट्रॉली टाइम्स (Trolley Times) की शुरुआत की।

सुरमीत मावी ने बताया कि किसानों को सरकार के सामने अपनी बात रखने के लिए मंच आसानी से नहीं मिलता। इस समाचार पत्र के माध्यम से उन्हें एक ऐसा मंच देने की कोशिश की गई है जिससे किसान अपनी बातों को सरकार तक पहुंचा सकें, साथ ही सरकार की योजनाएं और विचार किसानों तक आसानी से पहुंच सके। उन्होंने यह भी कहा कि अखबार किसानों की बुद्धि को प्रदर्शित करने का एक तरीका है।

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जाने-माने पत्रकार रविश कुमार लिखते हैं-

किसान आंदोलन के बीच एक अख़बार निकलने लगा है। इस अख़बार का नाम है ट्राली टाइम्स (Trolley Times)। पंजाबी और हिन्दी में है। जिन किसानों को लगा था कि अख़बारों और चैनलों में काम करने वाले पत्रकार उनके गाँव घरों के हैं, उन्हें अहसास हो गया कि यह धोखा था। गाँव घर से आए पत्रकार अब सरकार के हो चुके हैं।

किसान आंदोलन के बीच से अख़बार का निकलना भारतीय मीडिया के इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन है। जिस मीडिया इतिहास अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ अख़बार निकाल कर संपादकों के जेल जाने का रहा हो उस मीडिया के सामने अगर किसानों को अख़बार निकालना पड़े तो यह शर्मसार करने वाली बात है।

MSP का झुनझुना और डीज़ल की आड़ में बड़ा धोखा !

भारत का मीडिया नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलताओं की आड़ लेकर झूठ बेचने का धंधा कर रहा है। वह सिर्फ़ किसान विरोधी नहीं है बल्कि हर उसके ख़िलाफ़ है जो जनता बन कर सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं।

सूचनाओं की पवित्रता ज़रूरी है

ट्राली टाइम्स (Trolley Times) का आना एक तरह से सुखद है। जनता के उस विश्वास के बने रहने का सूचक है कि अख़बार भले बिक गए हों, अख़बारों का महत्व है। सूचनाओं की पवित्रता ज़रूरी है।

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पत्रकारिता में जनता का विश्वास एक दिन नए अख़बारों और चैनलों को जन्म देगा। मौजूदा अख़बारों और चैनलों से लड़े बग़ैर भारत में लोकतंत्र की कोई लड़ाई जीती नहीं जा सकती। इसमें कोई शक नहीं कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। दुख की बात है कि जनता का हत्यारा जनता के पैसे ही चलता है।

जनता को अगर अपने इस सुंदर लोकतंत्र को बचाना है तो उसे गोदी मीडिया नाम के हत्यारे से लड़ना ही होगा। यह उसके स्वाभिमान का सवाल है। सही सूचना जनता का स्वाभिमान है। भारत का गोदी मीडिया आपके जनता होने का अपमान है। आख़िर आपने इस दलाल मीडिया को अपने जीवन का क़ीमती वक्त और मेहनत का पैसा दिया ही क्यों? ये सवाल आपसे भी है। आज न कल आपको अपने घरों से इन अख़बारों और चैनलों को बाहर निकाल फेंकना ही होगा।

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