Ayodhya Ram Mandir: राम मंदिर के नीचे रखा जायेगा Time Capsule, जानिये क्या है टाइम कैप्सूल?

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राम मंदिर के 2,000 फीट नीचे जमीन एक टाइम कैप्सूल(Time Capsule) दबाया जाएगा। राम जन्मभूमिक तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने रविवार को न्यूज एजेंसी एनआई से बात करते हुए कहा कि मंदिर के हजारों फीट नीचे एक टाइम कैप्सूल दबाया जाएगा। कैप्सूल में मंदिर का इतिहास और इससे जुड़े तथ्य होंगे। ताकि भविष्य में मंदिर से जुड़े तथ्यों को लेकर कोई विवाद न रहे। राम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए पांच अगस्त के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शामिल होंगे।

टाइम कैप्सूल(Time Capsule) क्या है?

टाइम कैप्सूल एक कंटेनर की तरह होता है। टाइम कैप्सूल हर तरह के मौसम का सामना करने में सक्षम होता है। उसे जमीन के अंदर काफी गहराई में रखा जाता है। टाइम कैप्सूल को न तो कोई नुकसान पहुंचता है और न ही वह सड़ता-गलता है। टाइम कैप्सूल को दफनाने का मकसद किसी समाज, काल या देश के इतिहास को सुरक्षित रखना होता है। स्पेन के बर्गोस में 30 नवंबर 2017 को 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल निकला था। यह ईसा मसीह की मूर्ति के रूप में था। मूर्ति के भीतर 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जानकारियां थीं।

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टाइम कैप्सूल का इतिहास

जेएनयू के प्रोफ़ेसर आनंद रंगनाथन ने एक फ़ोटो ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है कि पंद्रह अगस्त 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लाल किले के पास एक टाइम कैप्सूल ज़मीन में डाला था। इस टाइम कैप्सूल में क्या जानकारी दबाई गई थी। इसकी किसी को जानकारी नहीं है। इंदिरा गांधी की सरकार ने इस टाइम कैप्सूल का नाम कालपात्र रखा था। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कनाईलाल बासु की किताब Netaji: Rediscovered में इस कालपत्र का जिक्र है।

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विपक्षी पार्टियों ने दावा किया कि सरकार बनने के बाद वो बताएंगी कि इस कालपत्र में क्या है। साल 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता पार्टी ने सरकार बनने के बाद यह जानने के लिए कि कालपत्र को जमीन से निकाला। सरकार ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि इस ‘टाइम कैप्सूल’ में क्या है।

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टाइम्स कैप्सूल का मामला खबरों में फिर कब आया था

साल 2012 में मानुशी पत्रिका की संपादक मधु किश्वर ने पीएमओ से टाइम्स कैप्सूल के बारे में जानकारी मांगी थी। पीएमओ ने अपने जवाब में कहा था कि उसके पास कोई जानकारी नहीं है। किश्वर राष्ट्रीय सूचना आयोग के पास भी पहुंची थीं।

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साल 2013 में छपी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय ने टाइम कैप्सूल के बारे में जानकारी होने से इनकार किया था। लेखक मधु पूर्णिमा किश्वर ने इस संबंध में सूचना मांगी थी। पीएमओ के जवाब पर उस समय के मुख्य सूचना आयुक्त सत्यनंद कहना था कि टाइम कैप्सूल के बारे में जब दफनाने की बात कही जा रही है, अखबारों में इस बारे में काफी कुछ छपा था। उसके बावजूद पीएमओ का यह जवाब हैरान करने वाला है। उन्होंने पीएमओ को इसके रेकॉर्ड को नए सिरे से खंगालने का निर्देश दिया था।

यह लेख अश्वनी पासवान द्वारा लिखा गया है। अश्वनी भारतीय जान संचार संसथान दिल्ली से पत्रकारिता के छात्र रह चुके हैं।

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