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दलितों के लिए पढ़ाई के दरवाजे खोलने वाली मैकाले की एजुकेशन पॉलिसी से नफरत क्यों?

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Priyanshu | Opinion

भारत में उस आदमी से जितनी नफरत की जाती है, उतनी नफरत उसके अलावा सैकड़ों निहत्थे भारतीयों को गोली से उड़वा देने वाले डायर से की ही गई। उसे यहां इतना नापसंद किया गया और हो सकता है आगे भी किया जाता रहे, जितना बादशाह औरंगजेब को छोड़कर किसी को नहीं किया गया। 18वीं सदी का वह अदना सा अंग्रेज अफसर 220 साल बाद भी भारत की हवाओं में भूत की तरह जिंदा है।

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25 अक्टूबर 1800 में पैदा हुआ, कैंब्रिज से ग्रेजुएट और सिर्फ 59 साल जिया वह आदमी जिसे खुद उसका देश कब का भूल गया, भारतीयों का एक वर्ग कभी भूल नहीं पाया। जबकि वह आदमी न वायसराय था, न जनरल डायर की तरह कोई सनकी फौजी और न ही उसने किसी को गोली से उड़वाया। उसकी खता थी एक योजना।

शख्स का नाम था थॉमस बैबिंगटन मैकाले, साल 1854 में आधुनिक भारतीय शिक्षा पद्धति की नींव रखने वाला। इसी दिन से शुरू हुआ उसे भारत में नापसंद किए जाने का सिलसिला जो आज तक चलता आया है।

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जिस आधुनिक भारतीय शिक्षा पद्धति ने दलितों को कानूनी रूप से पहली बार पढ़ने का हक दिलाया उसे कहा गया अंग्रेजी बोलने वालों का ऐसा वर्ग तैयार करने की योजना जिसके तहत लोगों का रंग और खून तो भारतीय हो लेकिन सोच, नैतिकता और बुद्धिमता अंग्रेजों जैसी हो जाए।

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यह बात सच भी थी, लेकिन बात इतनी ही नहीं थी। उसकी योजना में भारतीयों को संस्थागत तरीके से एजुकेट करना था और फिर उनमें से बेहतर को छांटकर अंग्रेजी हुकूमत से जोड़ना था जो दोनों मुल्कों के बीच पुल का काम करता। अनइंटेंशनली मैकाले की मॉर्डन एजुकेशन पॉलिसी ने दलितों के लिए शिक्षा के द्वार खोल दिए जिन्हें मनुस्मृति ने पढ़ाई-लिखाई करने से निषिद्ध कर रखा था।

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कहते हैं इससे धर्मांध वर्ग तिलमिला उठा जिसका शिक्षा पर कायम एकाधिकार टूटने जा रहा था लेकिन उस वर्ग ने इसे उनके धर्म में विदेशी हस्तक्षेप और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने वाले कदम के रूप में प्रचारित किया। वह करोड़ों दलितों को पढ़ाई लिखाई से दूर करने वाली व्यवस्था को ‘सांस्कृतिक विरासत’ बता रहे थे।

‘मैं वो नहीं जो भारतीयों को पीछे धकेल दूं’
हाउस ऑफ कॉमन्स में बोलते हुए मैकाले ने कहा था, ‘ये हम पर निर्भर करता है कि हम भारतीयों के साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहते हैं। क्या हम उन्हें अधीन बनाए रखना चाहते हैं? क्या हम समझते हैं कि हम भारतीयों में जाग्रति पैदा किए बगैर उन्हें ज्ञान दे सकते हैं? क्या हम उनमें महत्वाकांक्षा तो भर दें पर उसे बाहर निकालने का रास्ता न सुझाएं?’

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उसने कहा, ‘बहुत संभव है कि भारतीय जनमानस हमारे द्वारा बनाई गई प्रणाली से पढ़ता हुआ उस प्रणाली से आगे निकल जाए, हमारी प्रणाली से पढ़कर संभव है, कि एक दिन वे यूरोप के जैसे संस्थान बनाने की इच्छा करें। क्या ऐसा दिन भारत में आएगा? मैं नहीं जानता। हां, पर ये जरूर जानता हूं कि मैं वो शख्स नहीं जो भारतीयों को पीछे धकेल दूं। या उस दिन को आने से रोक दूं। और कभी ऐसा दिन आया, तो इंग्लैंड के इतिहास में वो सबसे गौरवशाली क्षण होगा।’

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ज्यादा खराब क्या था?
मैकाले को नहीं पता था कि वह क्या कर रहा है। उसका भाषण मनुस्मृति के इस आदेश के खिलाफ विद्रोह था। ‘शूद्राय मतिम् न दद्यात्, न उच्छिष्टम्, न हविष्कृतम्, न च अस्य धर्मम् उपदिशेत्, न च अस्य व्रतम् आदिशेत्’

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हालांकि जब दलितों ने स्कूलों में दाखिला लेने की कोशिश की तो उन्हें खदेड़ा गया। उनके माता-पिता का पीटा गया, घरों में तोड़फोड़ की गई। 36 साल तक जातिवादी हिंदुओं के साथ चले संघर्ष के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1880 में दलितों के लिए अलग स्कूल खोलने का फैसला किया।

1880 के हंटर आयोग ने अफसोस जाहिर किया कि कैसे एक समाज ने अपने ही लोगों को शिक्षा व्यवस्था से दूर रखा। ज्यादा खराब क्या था, अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का ऐसा वर्ग तैयार करना जिनकी सोच, नैतिकता और बुद्धिमता अंग्रेजों जैसी हो जाए या दलितों को पढ़ाई करने से रोकना? बाद में अंबेडकर खुद ने दलितों से अंग्रेजी अपनाने की अपील करते हुए उसे शेरनी का दूध कहा।

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जुर्म तय करने के लिए तथ्यों को आधार बनाया
मैकाले यहीं नहीं रुका। वह इंडियन पीनल कोड (भारतीय दंड संहिता) ले आया, तमाम कमियों के बावजूद इसके तहत न्यायाधीश अपनी इच्छा के अनुसार सजा नहीं तय कर सकते थे। अब तथ्यों के आधार पर जुर्म तय किए जाने लगे। इससे पहले भारत में सिर्फ राजप्रमुख न्याय करता था। दंड था, लेकिन उसका विधान नहीं। हर वर्ग के हिसाब से दंड विधान तय किए गए थे। एक ही अपराध के लिए शूद्रों के लिए सजा का प्रावधान अलग था और उच्च जाति के लिए अलग।

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(यह लेखक के निजी विचार हैं। वह भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं। अमर उजाला और पत्रिका जैसे मीडिया हाउसों में काम कर चुके हैं।)

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