सीमांचल

बिहार चुनाव : सीमांचल में ओवैसी की जीत का ये है सबसे बड़ा कारण

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बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के नतीजे आ चुके हैं। एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला है। बिहार में एक बार फिर से एनडीए की सरकार बनाने जा रही है । इस बार का बिहार चुनाव बिल्कुल अलग था जहाँ कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन करते हुए जनता ने ईवीएम का बटन दबाया। वहीं, दूसरी ओर 1990 के बाद शायद पहला मौका था जब लालू प्रसाद यादव,शरद यादव, और राम विलास पासवान के बिना चुनाव हुए।

बिहार को गठबंधन का महासागर कहा जाता है। इस बार बिहार में 4 गठबंधन बने। पहला एनडीए (भाजपा ,जदयू ,हम ,वीआईपी ) दूसरा महागठबंधन (राजद , कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, सीपीआई माले ) । तीसरा ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट और चौथा प्रगातिशील गठबंधन । एनडीए और महागठबंधन को छोड़ दिया जाये तो तीसरा गठबंधन ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट कामयाब रहा और उसमें भी एआईएमआईएम (AIMIM) और बीएचपी कामयाब रहीं।जहां एआईएमआईएम(AIMIM) ने 5 सीटें जीती वहीं बीएचपी(BHP) ने 1 सीट जीती

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आपको बताते चलें कि असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम(AIMIM) ने बिहार के सीमांचल इलाके की 5 विधानसभा सीटो पर कब्ज़ा जमाया और आलम ये रहा की अब तक 1 सीट पर रहने वाली पार्टी आज 5 सीटों पर कब्जा ज़मा लिया । ओवैसी का जादू सीमांचल पर चल गया जिसकी बदौलत उनकी पार्टी ने किशनगंज़ की 2 ,पूर्णिया की 2 और अररिया की 1 सीट पर जीत हासिल की ।

एआईएमआईएम (AIMIM) ने बिहार में 2019 में किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में पहली बार इंट्री ली थी और पहली बार उसके उम्मीदवार कमरूल होदा जीते थे । और इस जीत से साफ हो गया कि सीमांचल के मुस्लिमों ने ओवैसी पर जमकर वोट बरसाये हैं । जनता ने जदयू और राजद की काट के रूप में एआईएमआईएम(AIMIM) ढूंढा है

सीमांचल बिहार का बंगाल और नेपाल से सटा मुस्लिम बाहुल्य इलाका है हर साल यहां के लोग बाढ़ और विस्थापन का दर्द झेलते है अशिक्षा और बेरोज़गारी यहां के लोगों के लिए अभिशाप है । सीमांचल में मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में है ।

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 AIMIM के जीतने वाले उम्मीदवार

अख्तरुल इमाम – बिहार की अमौर विधानसभा सीट पूर्णिया जिले में आती है 2015 में कांग्रेस के उम्मीदवार अब्दुल जलील यहां से जीते थे । इस बार अख्तरुल इमाम AIMIM के सीट पर लड़ रहे थे और उन्होनें कांग्रेस के उम्मीदवार को हराया है हिंदू वोटर यहां अल्पसंख्यक की भूमिका में है । 1980 के बाद से ज्यादातर कांग्रेस के उम्मीदवार अब्दुल जलील ही जीतते आये है

मोहम्मद अंज़ार नईमी – किशनगंज जिले की बहादुरगंज विधानसभा सीट वैसे तो कांग्रेस का गढ़ रही है इस सीट से कांग्रेस के तौसीफ आलम लगातार 4 बार विधायक रहे है लेकिन इस बार राजद से एआईएमआईएम में शामिल हुए अंज़ार नईमी भारी पड़े । इस सीट पर भी मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका अदा करते है

सैयद रूकनुद्दीन अहमद – सैयद रूकनुद्दीन वायसी विधानसभा सीट पर कब्ज़ा किया है करीब 6 लाख आबादी वाली वायसी सीट पर अभी राजद का कब्जा था

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इज़हार अस्फी – इज़हार अस्फी ने किशनगंज जिले की कोचाधामन पर कब्जा जमाया है उन्होनें जदयू के मुजाहिद आलम को हराया है । इस सीट पर मुस्लिम के साथ यादव मतदाता भी निर्णायक भूमिका अदा करते  है ।

शाहनवाज़ – अररिया जिले की जोकीहाट सीट पर तस्लीमुद्दीन परिवार सियासी दबदबा करीब पॉच दशकों से कायम है और तस्लीमुद्दीन के राजनीतिक विरासत पर काबिज होने के लिए उनके दोनों बेटे मैदान में थे लेकिन उनके छोटे बेटे AIMIM के प्रत्यासी शाहनवाज़  ने अपने बड़े भाई सरफराज़ आलम RJD को हरा कर जोकीहाट सीट पर कब्जा किया ।

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