बेटियां

मज़दूरी कर घर संभालने वाली रोशनी हाईस्कूल की परीक्षा में लाई 89 प्रतिशत अंक

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ग्रामीण क्षेत्रों की बेटियों का दिन चूल्हे चौके से शुरू होता है। शहरी लड़ियों की अपेक्षा इन्हें आज भी कम ही सुविधाएं प्राप्त हो पाती हैं। इसके बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों की बेटियां न केवल घर-गृहस्थी में हाथ बांटती है बल्कि परीक्षाओं में भी सफलता का परचम लहरा रही हैं। बात माध्यमिक शिक्षा मंडल, भोपाल मध्यप्रदेश के हाइस्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा की है। इस परीक्षा में पिछले दो सत्रों में अपेक्षाकृत पीछे रहीं बेटियों ने इस बार बेटों को पछाड़ दिया।

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बेटियां रहीं बेटो से आगे

इस साल आए माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश ( एमपीबीएसई) के हाइस्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा के परिणामों में बेटियों का बोलबाला रहा। पिछले दो सत्रों में बेटों से पीछे रहीं बेटियां इस साल जबरदस्त ‘कमबैक’ किया गया है। वर्ष 2019 में 4.93 फीसदी से पीछे रहने वाली बेटियों ने 5.78 फीसदी से आगे रहीं। वर्ष 2018 में बेटियां का रिजल्ट 58.20, वर्ष 2019 में 43.18 और वर्ष 2020 में 65.87 फीसदी रहा ।

जबकि बेटों का क्रमश 62.35, 48.11 और 60.09 फीसदी रहा।माध्यमिक शिक्षा मंडल के आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2020 में 43 हजार 240 बेटे अपेक्षाकृत ज्यादा परीक्षा में शामिल हुए थे। बेटियों की कुल संख्या 4 लाख 25 हजार 48 थी जबकि बेटों की 4 लाख 68 हजार 288। परीक्षा में कुल 8 लाख 93 हजार 3 सौ 36 छात्र-छात्राएं शामिल हुईं थी।

किटहा में अध्ययनरत प्रांजलि रजक का कहना है-

“बड़ी मेहनत से पर्सेंट आए हैं। घर का काम करती थी दिन के चौबीस घंटों में पढ़ाई के लिए भी दो चार घंटे निकालने पड़ते थे। पिता गरीब हैं उनका इस्त्री का व्यवसाय और तीन भाई बहन है जिससे ट्यूशन का खर्च नहीं निकल पा रहा था। इसके अलावा मां के कामकाज में भी हाथ बंटाना पड़ता था और छोटे भाई बहनों का ख्याल भी रखना पड़ता था”। माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश की हाइस्कूल परीक्षा में 84 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं।

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रोशनी कुशवाहा कहती हैं कि-

“पिता बाहर मजदूरी करते हैं, मां को खेत में काम करना पड़ता है जिससे घर चलाने की जिम्मेदारी मेरी थी। इसके बाद भी पढ़ाई के लिए समय निकलना पड़ता था। कई बार मुझे भी खेत का काम करना पड़ता।  इस बार गेंहू की कटाई भी की थी। परिवार का पालन पोषण बमुश्किल हो रहा है।”

माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश की परीक्षा में रोशनी के 89 प्रतिशत अंक आए हैं। ये दोनो बेटियां सतना जिले के मझगवां जनपद के 10 हजार से भी अधिक आबादी वाले गांव किटहा की हैं। यहां का शासकीय विद्यालय सात दशक बाद हाइस्कूल का दर्जा प्राप्त किया।

मात्र 0.25 फीसद से आगे रहे शहर के विद्यार्थी

परीक्षा परिणामों में सबसे ज्यादा लड़ाई गांव और शहर के विद्यार्थियों के बीच है। हाल में जारी हाइस्कूल परीक्षा परिणाम में गांव के विद्यार्थी मामूली अंतर से पीछे रह गए। एमपीबीएसई के आंकड़े बताते हैं कि गांव के विद्यार्थी मात्र 0.25 फीसदी अंकों से पीछे रह गए। शहर के विद्यार्थियों का परिणाम 62.97 और गांव के 62.72 फीसदी रहा।

इस मामले में बेटों ने शहरी को पछाड़ा है जबकि बेटियां थोड़ी पीछे रह गई। शहरी छात्रों का परिणाम 59.74, छात्राओं का 66.73 जबकि ग्रामीण का क्रमश: 60.41 और 65.14 फीसदी रहा। हालांकि 4 लाख 74 हजार 260 ग्रामीण और 4 लाख 19 हजार 76 शहरी छात्र-छात्राओं ने परीक्षा दी थी जिसमें गांव के 2 लाख 42 हजार 7 सौ 51 छात्र, 2 लाख 31 हजार 9 छात्राएं तथा शहर के 2 लाख 25 हजार 5 सौ 37 छात्र और 1 लाख 93 हजार 5 सौ 39 छात्राएं शामिल हुईं।

सर्वाधिक सेकेंड डिवीजन आए गांव के विद्यार्थी

गांव के स्कूलों के विद्यार्थी सर्वाधिक सेकेंड डिवीजन से पास हुए। एमपीबीएसई के आंकड़ों के मुताबिक 1 लाख 27 हजार 4 सौ 64 ग्रामीण विद्यार्थी सेकेंड डिवीजन में पास हुए जबकि 87 हजार 6 सौ 98 शहरी। फर्स्ट क्लास में गांव के 7 हजार 1 सौ 84 विद्यार्थी कम रहे। इनकी संख्या 1 लाख 67 हजार 6 सौ 3 और शहरी की संख्या 1 लाख 74 हजार 7 सौ 87 रही। थर्ड डिवीजन में क्रमश 1939 और 983 रहे।

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इसी तरह सेकेंड डिवीजन में शहरी छात्र-छात्राओं को ग्रामीणों ने पछाड़ दिया। इस श्रेणी में 21 हजार 994 बेटियां और 17 हजार 772 बेटे ज्यादा रहे. शहर के 47 हजार 565 बेटे, 40 हजार 133 बेटियां पास हुईं जबकि गांव के 65 हजार 337 बेटे और 62 हजार 127 बेटियां पास हुईं। फर्स्ट डिवीजन में 79 हजार 919 बेटों, 87 हजार 6 सौ 84 गांव की बेटियों और 86 हजार 2 सौ 35 बेटों व 88 हजार 552 शहरी बेटियों ने जगह बनाई। इसी तरह 1169 बेटे, 770 गांव की बेटियां, 678 शहरी बेटे और 305 बेटियों ने थर्ड डिवीजन में जगह बनाई।

ये लेख मध्य प्रदेश से फ्रीलांस पत्रकार Sachin Tulsa Tripathi ने लिखा है।

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