एक दलित की लाश ही पुल से नहीं उतरी बल्कि भारत का ‘विश्वगुरू’ बनने का सपना भी उसी पुल से गिर कर मर गया.

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हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं. दुनियां में भारत का डंका बजाने की बात करते हैं. हम सभ्य होने का ढिंढोरा पीटते फ़िरते हैं. मगर अपने ही देश में एक इंसान की लाश को सिर्फ़ इस लिए पुल से उतार नदी के रास्ते से ले जाने के लिए मजबूर करते हैं कि वो दलित है और ऊंची जाति के लोगों की ज़मीन के ऊपर से नहीं गुज़र सकता है.

ताज़ा घटना तमिलनाडु के वेल्लोर ज़िले के वानियाम्बड़ी का है, जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है. वेल्लोर ज़िले के वानियाम्बड़ी दलितों को अंतिम संस्कार के लिए एक शव पुल से नीचे लटकाकर उतारना पड़ा, क्योंकि खुद को अगड़ी जाति मानने वाले लोगों ने आगे जाने की इजाजत नहीं दी. उनका कहना था कि दलित उनकी ज़मीन से नहीं गुज़र सकता है.

घटना शनिवार, 17 अगस्त की है. घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही मामले ने तूल पकड़ लिया है. वीडियो के चर्चा में आते ही वेल्लोर जिला प्रशासन ने मामले की जांच के तुरंत आदेश जारी कर दिए हैं .वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ लोग स्ट्रेचर पर एक शव को रस्सी की मदद से 20 फुट ऊंचे पुल से नीचे लटका रहे हैं. शव को पकड़ने के लिए पुल के नीचे भी कुछ लोग मौजूद हैं. इसके बाद लोग शव को अंतिम संस्कार के लिए लेकर जाते दिखते हैं.

वीडियो को बनाने वाला व्यक्ति कहते सुनाई देता है कि ये सब वेल्लोर के वानियाम्बड़ी में हो रहा है, जहां गांव में दलितों के पास अपना श्मशान गृह नहीं है. ‘यही हमारा श्मशान गृह है. हम हर बार इसी तरह से शव को नीचे लटकाकर उतारते हैं. हमारे पास श्मशान गृह नहीं है.’

55 वर्षीय कुप्पन की 16 अगस्त को एक एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. कुप्पन के रिश्तेदारों का आरोप है कि दलितों के शवों को ले जाने के लिए जिस रास्ते का इस्तेमाल किया जाता था, वहां हिंदू जाति ने अतिक्रमण कर लिया है. रिश्तेदारों ने बताया कि हिंदुओं ने रास्ते के आसपास की जमीनें खरीद लीं और वो नहीं चाहते कि शव को इसके बीच से लेकर जाया जाए.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस गांव में दलितों को उन सड़कों का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है जहां ऊंची जाति के लोगों के घर हैं. ये शव रोकने का पहला मामला नहीं,इससे पहले भी दलितों के शवों को पुल के रास्ते से ही उतार कर ले जाया जाता रहा है.

कुप्पन के रिश्तेदार विजय ने द न्यूज मिनट को बताया, ’20 सालों से, हमें उस जमीन का इस्तेमाल करने में परेशानी हो रही है, जिसे हम पारंपरिक रूप से श्मशान के रूप में इस्तेमाल करते थे. अब वो जमीन खुद को अगड़ी जाति मानने वाले लोगों के पास है और वो हमें शव के साथ उस जमीन पर घुसने नहीं देते. पुल के बनने से पहले, हम शव को पानी में ही छोड़ देते थे, लेकिन अब हम अंतिम संस्कार के लिए शव को पुल से नीचे लटकाते हैं. हम सालों से अलग-अलग जिला प्रशासन मदद मांग रहे हैं, लेकिन किसी ने हमारी मदद नहीं की.’

वीडियो वायरल होने के बाद हरकत में आया प्रशासन

वीडियो के वायरल होने के बाद वेल्लोर जिला प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश के साथ दलितों को श्मशान गृह के लिए आधा एकड़ जमीन दी है. तिरुपत्तूर की सब-कलेक्टर प्रियंका ने द न्यूज मिनट को बताया कि जिला प्रशासन ने दलित समुदाय को, शव दफनाने और श्मशान के रूप में आधा एकड़ जमीन आवंटित की है.

‘हमने दलित समुदाय के लोगों और रास्ता रोकने वाले जमीन मालिकों से पूछताछ की. शनिवार को, जमीन के मालिकों और शव ले जाने वाले लोगों के बीच में किसी तरह का कोई विवाद या कोई टकराव नहीं था.’ ….      प्रियंका, सब-कलेक्टर, तिरुपत्तूर

इस घटना के तूल पकड़ते ही प्रशासन जांच में जुट गया है. मगर सबसे बड़ा सवाल ये है कि 21वीं सदी में आने के बावजूद भी हमारा समाज जात-पात, छुआ-छूत से बाहर नहीं आ पा रहा है. सरकार लाख दावे करती हो, मगर सच ये है कि दलितों के साथ हो रहे भेदभाव में कमी  होने का नाम नहीं ले रही.

तमिलनाडु वेल्लोर ज़िले के वानियाम्बड़ी की ये घटना ने हमारे सामने फ़िर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या भारत विश्व गुरु बनने के लायक है भी या नहीं? हम सभ्य होने का झूठा नाटक कब तक करते रहेंगे. क्या मोदी सरकार ऐसी मानसकिता वाले लोगों पर रोक लगाने में असफल है या फिर ये ताकतें अब मुखर हो चुकी हैं.