एक संयुक्त परिवार टूट जाने के बेहद ही घातक परिणाम होते हैं!

संयुक्त परिवार
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रोज़ रोज़ के मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर आखिरकार रोज़ी ने पति से अलग होने का फैसला कर लिया। इस फैसले में उसके मायके वालों ने उसका साथ दिया और वह अपनी छोटी सी बेटी को लेकर मायके में रहने लगी। मां बाप व भाईयों पर बोझ ना पड़े इसलिए रोज़ी ने खुद एक छोटी नौकरी शुरु कर दी। धीरे धीरे मां बाप गुज़र गए और भाईयों का परिवार बढ़ने लगा तो रोज़ी ने अपनी बेटी के साथ अलग रहने का फैसला किया। उसने अपनी बेटी को पढ़ाया लिखाया और 22 साल बाद एक अच्छे परिवार में शादी कर दी।

आज बेटी बहुत खुश है अपनी फैमिली में, भाई भी अपने परिवार के साथ बहुत खुश हैं, रोज़ी का पति भी दूसरी शादी कर खुश है लेकिन रोज़ी? वह अपना जीवन अकेले गुज़ारने को मजबूर है क्योंकि बेटी की ससुराल में जाकर रह नहीं सकती और भाईयों पर बोझ बनना उसे हमेशा से पसंद नहीं था। नतीजा..रोज़ी अब डिप्रेशन का शिकार है और बेटी सारी खुशियां मिलने के बावजूद खुश नहीं है क्योंकि उसकी मां बीमार है।

15 वर्ष का आहिल आज एक होटल में बर्तन धुल जीवन का गुज़ारा करने को विवश है। जब कोई स्कूल यूनिफॉर्म पहने लड़का उसके सामने से गुज़र जाता है उसका कलेजा मुंह को आ जाता है। क्योंकि वह भी पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनना चाहता था और अपने पिता का सपना पूरा करना चाहता था लेकिन पिता के अचानक मौत से पूरा का पूरा जीवन उलट पलट कर रह गया। उसकी मां किसी लड़के के साथ शादी करना चाहती थी लेकिन घर वालों ने बदनामी के डर से जल्द से जल्द उसे पराया करना बेहतर समझा और उसी जल्दबाज़ी में उसकी उम्र से दोगुनी उम्र के व्यक्ति से शादी कर दी गई। जिसका परिणाम यह हुआ कि केवल 14 साल की उम्र में आहिल एक होटल में काम करने को मजबूर हो गया।

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Hindu woman can give her property to father’s family

हमेशा क्लॉस में फर्स्ट आने वाला समीर आज सबसे कम नंबर लेकर आया। क्योंकि जब से उसकी मां उसे नानी के घर लेकर आयी है उसे अच्छा नहीं लगता। उसका कांफिडेंस लेवल गिरने लगा है और उसे अपने पापा की बहुत याद आती है। लेकिन मां और पापा की लड़ाई के कारण वह डिप्रेशन में चला गया। अब उसका किसी काम में भी मन नहीं करता।

इस प्रकार के टूटते बिखरते परिवार के ढेरों किस्से हमारे समाज में मौजूद हैं और इनकी तादात निरंत्तर बढ़ती जा ही जा रही है और इसका सीधा सीधा प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड्स विमेन 2019-2020 की ‘फेमिलीज़ इन ए चेजिंग वर्ल्ड’ रिपोर्ट के अनुसार बीते दो दशकों में भारत में तलाक की दर दोगुनी हो गई है। वीमेन कमीशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान तलाक की दर तीन गुना बढ़ गई जो कि पिछले दस सालों में सबसे अधिक है। संयुक्त राष्ट्र की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में टूटते परिवार के कारण बच्चों की कुल संख्या के 25 प्रतिशत बच्चे अकेले मां के साथ रहने को विवश हैं।

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परिवार समाज की वह महत्वपूर्ण ईकाई है जिसके ऊपर सभ्यता के विकास की नींव टिकी होती है। यदि परिवार सशक्त होगा तो ही एक सभ्यता व संस्कृति का विकास होगा, नैतिक मूल्यों का उत्थान होगा और एक आदर्श समाज का निर्माण होगा। परिवार के इस महत्व को प्राचीन काल से ही समझा जाता रहा है और इसको महत्वता दी गई तथा परिवार को मजबूत बनाने के लिए मूल आदर्श व संस्कारों का निर्माण किया गया। लेकिन वर्तमान भौतिकवादी युग में नैतिक मूल्यों की अवहेलना के कारण आज तलाक की दर, घरेलू हिंसा व अलगाव इत्यादि की घटनाएं निरंत्तर बढ़ती जा रही है।

टूटते संयुक्त परिवार, गुम होता आदर सम्मान व असीमित इच्छाओं ने व्यक्ति को विनाश की ओर ढकेल दिया है। जिसके परिणामस्वरुप युवा पीढ़ी जो देश के भविष्य की महत्वपूर्ण पूंजी है विनाश के गहरे अंधेरे में गिरती जा रही है। समय है इस अमूल्य पूंजी को सुरक्षित रखने का ताकि देश व समाज का भविष्य उज्जवल हो सके। इसके लिए परिवार को टूटने से बचाना होगा तथा समाज में आदर्श मूल्यों की स्थापना करनी होगी। इसी उद्देश्य के लिए जमात-ए-इस्लामी हिंद की महिला विंग द्वारा ‘सश्क्त परिवार सश्क्त समाज’ अभियान 19 से 28 फरवरी 2021 तक चलाया जा रहा है। इसका लक्ष्य समाज के टूटते परिवारों को बचाना व लोगों को परिवार के महत्व के प्रति जागरुक करना है। आइए हम सब मिलकर अपने परिवार व समाज को दूसरों के लिए आदर्श बनाए व नैतिक मूल्यों को पुनः स्थापित करें।

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पत्रकार सहीफ़ा खान की क़लम से।

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