यूपी के सरकारी स्कूलों को ऐतिहासिक खंडहर घोषित कर पर्यटन स्थल बना देना चाहिए?

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ग्राउंड रिपोर्ट | नेहाल रिज़वी

भारत जनसंख्या के लिहाज़ से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। यहां की 70 फीसदी आबादी युवा है। हमारा देश विश्व में युवा शक्ति के रूप में उभरता हुआ देश है। किसी भी देश के निर्माण में सबसे बड़ा योगदान उस देश की युवा शक्ति का ही होता है। शिक्षा हमें अपने जीवन के मूल्य समझाती है। शिक्षा का अर्थ सभी के जीवन में बहुत कुछ है क्योंकि यह हमारे सीखने, ज्ञान और कौशल को सुविधाजनक बनाती है। यह हमारे दिमाग़ और व्यक्तित्व को पूरी तरह से बदल देती है और हमें सकारात्मक दृष्टिकोण प्राप्त करने में मदद करती है।

आज हम भारत के उस प्रदेश की शिक्षा स्थिति पर बात करेंगे जिसको हम सभी दिल्ली की सत्ता प्राप्त करने वाले प्रदेश के रूप में ही देखते आए हैं। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। अपनी गंगा- जमुनी तहज़ीब के लिए विश्वभर भर में विख्यात इस प्रदेश में लगभग 22 करोड़ लोग रहते हैं। इस राज्य की गिनती देश के बेहद ग़रीब राज्यों में भी होती है।

आइये जानते हैं क्या है इस राज्य में शिक्षा का हाल ?

एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016-2017 के दौरान स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक में देश के 20 बड़े राज्यों में केरल शीर्ष स्थान पर है जबकि राजस्थान दूसरे और कर्नाटक तीसरे स्थान पर था। वहीं, सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे निचले पायदान पर रहा।

स्त्रोत: नीति आयोग

इस रिपोर्ट का नाम ‘द सक्सेस आफ आवर स्कूल्स-स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स’ है। इसे नीति आयोग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्व बैंक ने संयुक्त रूप से जारी किया है । इसने देशभर के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से मिले आंकड़ों का अध्ययन कर यह रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट: नीति आयोग

वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षाओं में जो तथ्य सामने आए थे, वे वाकई में शर्मसार कर देने वाले थे। दस लाख से अधिक परीक्षार्थियों ने वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाएं छोड़ दी थी और जिस प्रकार उत्तर पुस्तिकाओं को जांचा जा रहा था उसको देख गंभीर सवाल खड़े हुए थे। शिक्षा का अधिकार क़ानून (आरटीई) लागू हुए 9 साल पूरे हो चुके हैं लेकिन आज की स्थिति में 90 फीसदी से अधिक स्कूल आरटीई के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। इस दौरान सरकारी स्कूलों की स्थिति और छवि दोनों ख़राब होती गई है।

‘सबको शिक्षा, अच्‍छी शिक्षा’… क्या है इस योजना का हाल ?

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में पिछले वर्ष नई एकीकृत शिक्षा योजना बनाने के स्‍कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के प्रस्‍ताव को मंजूरी दी गई थी। सरकार यह योजना ‘सबको शिक्षा, अच्‍छी शिक्षा’ के विज़न के परिप्रेक्ष्‍य में लेकर आयी थी। इसका लक्ष्‍य पूरे देश में प्री-नर्सरी से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा सुविधा सबको उपलब्‍ध कराने के लिए राज्‍यों की मदद करना है। मगर इसके बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार इस पर अमल नहीं कर रही है और सरकारी स्कूलों में नामांकन में 60 प्रतिशत की कमी देखी गई। देश को 9 प्रधानमंत्री देने वाला सूबा उत्तर प्रदेश ही है। मगर दुर्भाग्य से इसी प्रदेश में शिक्षा की स्थिति की बेहद ही ख़राब बनी हुई है। देश के मौजूदा प्रधानमंत्री इसी प्रदेश से 2 बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं।

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एक साल में 23 लाख बच्चे शिक्षा से हो गए दूर

हालही में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि उत्तर प्रदेश में लगभग 18000 हज़ार सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ पढ़ाने के लिए एक ही शिक्षक मौजूद है। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ एक शिक्षक उस स्कूल के अन्य सभी कामों को भी करता है। देश में प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकार तमाम तरह की योजनाओं को चला रही है मगर उसके बावजूद भी पिछले वर्ष देशभर में 23 लाख बच्चों कमी देखी गई है जिसमें केवल यूपी से ही 7 लाख बच्चे कक्षाओं से कम हो गए। पिछले साल जारी एक रिपोर्ट में कहा गया कि देशभर में 5 से 8 तक की क्लास में 13.24 करोड़ और 6.64 करोड़ यानि टोटल 19.88 करोड़ बच्चें देश में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं । वहीं यूपी में लगातार प्राथमिक शिक्षा की कक्षाओं से बच्चों में कमी आना एक गंभीर सवाल खड़े करता है।

वहीं बात अगर उत्तर प्रदेश के गांवो में शिक्षा के हाल पर करें तो गांवो में शिक्षा की हालत बहुत ही खराब है। गांवों की साक्षरता दर 58 प्रतिशत के करीब है जबकि शहरों की 80 फीसदी। ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता दर 46 प्रतिशत के करीब और शहरी महिलाओं की 73 प्रतिशत है। सरकारी प्राथमिक स्कूलों में कोई फीस नहीं ली जाती, किताबें मुफ्त मिलती हैं, दोपहर का ताजा भोजन मिलता है, यूनीफार्म और वजीफा भी दिया जाता है। मगर इतनी सुविधाओं के बाद भी लोग बेहतर शिक्षा की प्राप्ती के लिए शहरों में अपने बच्चों को भेजते हैं। मगर हर इंसान अपने बच्चों को शहर में नहीं पढ़ा सकता है क्योंकि पढ़ाई का खर्च उठा पाना ग़रीब किसान के बस की बात नहीं होती है।

प्रदेश में शिक्षकों की है भारी कमी

यूपी में शिक्षको की भारी कमी है। प्राथमिक शिक्षा में अध्यापकों की नियुक्ति के लिए चयन बोर्ड नहीं है और पिछले वर्षों में कैसे नियुक्तियां होती रही हैं यह शिक्षा विभाग के अधिकारियों को खूब पता है। अध्यापकों की अनुशासनहीनता का एक कारण हो सकता है नियुक्तियों में भ्रष्टाचार। अध्यापकों की नियुक्ति में पारदर्शिता होनी चाहिए और यदि कम्प्यूटर, विज्ञान और गणित के अध्यापक नहीं मिल पाते तो खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए। तमाम उपेक्षाओं और आलोचनाओं से घिरे रहने के बावजूद सरकारी स्कूल प्रणाली के हालिया उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। ज़ाहिर है यह सब सरकारी स्कूलों के भरोसे ही संपन्न हुआ है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आज भी क़रीब 50 प्रतिशत शहरी और 80 फीसदी ग्रामीण बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ रहे हैं।

लेकिन विडम्बना देखिये, ठीक इसी दौरान सरकारी स्कूलों पर से लोगों का भरोसा भी घटा है। लंबे समय से असर (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) और कई अन्य सरकारी व ग़ैर सरकारी आंकड़े इस बात को रेखांकित करते आए हैं कि सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था की विश्वशनीयता कम हो रही है और प्राथमिक स्तर पर सरकारी स्कूलों में बच्चों के सीखने की दर में लगातार गिरावट आ रही है। ख़ासकर यूपी के सरकारी स्कूलों में इसका असर साफ़ देखा जा सकता है। सबसे बुनियादी ज़रूरत है कि कैसे सरकारी स्कूलों के विश्वास को बहाल किया जाए और इन्हें उस लेवल तक पहुंचा दिया जाए जहां वे मध्यवर्ग की आकांक्षाओं से जोड़ी बना सकें। दरअसल 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत की बड़ी आबादी की आय में वृद्धि हुई है जिससे उसकी क्रय शक्ति बढ़ने के साथ ही आकांक्षाएं भी बढ़ी हैं।

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कोर्ट का आदेश भी नहीं माना गया

हमारे सरकारी स्कूल इन आकांक्षाओं पर खरे उतरने में नाकाम रहे हैं जिससे इस मुखर आबादी का ध्यान सरकारी स्कूलों से हटकर निजी स्कूलों की तरफ पर केंद्रित हो गया है। इसके लिए स्कूलों के संचालन/प्रशासन, बजट व प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और ढांचागत सुविधाओं की तरफ़ ध्यान देने की ज़रूरत है। यह काम हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए लेकिन बदकिस्मती से शिक्षा न तो हमारे समाज की प्राथमिकता में है और न ही राजनीति की।

ऐसे में थोड़ी-बहुत उम्मीद न्यायपालिका से ही बचती है। पिछले वर्ष (3 फरवरी 2019) सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस भेजा है जिसका सरोकार सीधे तौर पर सरकारी स्कूलों से जुड़ा हुआ था ।

गौरतलब है कि 18 अगस्त 2015 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की ख़राब स्थिति पर चिंता जताते हुए एक अभूतपूर्व आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि सरकारी कर्मचारी, अर्ध सरकारी कर्मचारी, स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि, न्यायपालिका और अन्य सभी लोग जो सरकारी कोष से वेतन या लाभ लेते हैं को अपने बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ना पड़ेगा। अपने आदेश में अदालत ने यह भी कहा था कि इस नियम का उल्लंघन करने वालों के लिए सज़ा का प्रावधान किया जाए। इस आदेश का पालन करने के लिए अदालत ने छह माह का समय दिया था लेकिन इतना लंबा समय बीत जाने के बावजूद भी सरकारों द्वारा इस पर कोई अमल नहीं किया गया।

यूपी का शिक्षक-छात्र अनुपात (पीटीआर) भारत में सबसे बद्तर

एकीकृत जिला सूचना शिक्षा प्रणाली (यू-डीआईएसई) फ्लैश सांख्यिकी 2015-16 के अनुसार, भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का शिक्षक-छात्र अनुपात (पीटीआर) भारत में सबसे बद्तर है। राज्य में प्राथमिक स्तर पर प्रति 39 छात्रों के लिए एक शिक्षक है। इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 23:1 है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश की साक्षरता दर 69.72 फीसदी है, जो कि देश में नीचे से आठवें स्थान पर है। सरकारी शिक्षा आंकड़ों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2015-16 में, उत्तर प्रदेश में  2.53 करोड़ छात्रों ने प्राथमिक स्कूलों में नामांकन कराया है। यह संख्या निजी और सरकारी स्कूलों को जोड़कर है।2.53 करोड़ छात्रों को 665779 शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है। इसमें ऐसे स्कूल भी शामिल है, जहां प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक सह-अस्तित्व में हैं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) द्वारा प्राथमिक स्तर पर प्रति 30 छात्र पर एक शिक्षक निर्धारित किया गया है। हमारे विश्लेषण के अनुसार, इस अनुपात के साथ राज्य में 840000 शिक्षक होने चाहिए, लेकिन अब भी वहां 21 फीसदी या 176,000 शिक्षकों की कमी है। वर्ष 2011 के जनगणना के आधार पर ‘बाल अधिकार संरक्षण राष्ट्रीय आयोग’द्वारा किए गए गणना के अनुसार, किसी भी अन्य राज्य की तुलना में उत्तर प्रदेश में ज्यादा बच्चे काम करते हैं। आंकड़ों के अनुसार 5 से 14 साल के बीच 624,000 बच्चे बाल श्रम करते हैं।इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में बच्चे, स्कूल की पूरी पढ़ाई नहीं करते हैं। देश में उत्तर प्रदेश का प्राथमिक से उच्च प्राथमिक में जाने वाले बच्चों का दर सबसे कम है। एकीकृत जिला सूचना शिक्षा प्रणाली (यू-डीआईएसई) फ्लैश सांख्यिकी 2015-16 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के लिए ये आंकड़े 79.1 फीसदी हैं।

2020-21 के बजट में शिक्षा को मिली राशि से क्या बदल पाएगा ?

2019 को जारी सरकार की नई शिक्षा नीति के मसौदे में 2030 तक, कुल सरकारी खर्च के 10 फीसदी से 20 फीसदी तक शिक्षा पर खर्च बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। हालांकि, भारत के वर्तमान शिक्षा बजट में इतनी वृद्धि के लिए कोई धन उपलब्ध नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य और केंद्रीय शिक्षा के वित्त के विश्लेषण के अनुसार, 2015 के बाद से, मुद्रास्फीति के सुधार के बाद स्कूली शिक्षा पर सरकारी खर्च वास्तव में कम हो गया है।

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भले ही सरकार शिक्षा पर खर्च में वृद्धि का वादा करती है, लेकिन शिक्षा के लिए आवंटित केंद्रीय बजट का हिस्सा 2014-15 में, जिस अवधि के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र सरकार का नेतृत्व किया, 4.14 फीसदी था, जो गिरकर 2019-20 में 3.4 फीसदी हो गया,जैसा कि 2014 से 2020 तक बजट दस्तावेजों से पता चलता है। 2019-20 के बजट में, शिक्षा को आवंटित केंद्रीय बजट का हिस्सा 3.4 फीसदी पर बना हुआ है, जिसका मतलब है कि, इस वित्तीय वर्ष में, सरकार शिक्षा के लिए अधिक धन आवंटित नहीं कर रही है जैसा कि नई शिक्षा नीति को आवश्यकता है।

क्या मिशन प्रेरणा से शिक्षा के स्तर में कोई बदलाव आ पाएगा ?

यह केवल वह हिस्सा नहीं है, जिसमें गिरावट आई है। स्कूली शिक्षा के मामले में, बजट निरपेक्ष रूप से कम हो गया है। बजट के संशोधित अनुमानों के आधार पर, स्कूली शिक्षा को आवंटित कुल धनराशि 2014-15 में 38,600 करोड़ रुपये से घटकर 2018-19 में 37,100 करोड़ रुपये हो गई है। 2016-17 में यूपी में बेसिक शिक्षा का बजट 38,066.06 करोड़ रुपए था, जबकि वर्ष 2017-18 का बजट 50,142 करोड़ रुपए था।  पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे प्रदेश में शिक्षक-छात्र अनुपातको सुधारते हुए तार्किक बनाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि मिशन प्रेरणा से शिक्षा के स्तर में बड़ा बदलाव आएगा। उन्होंने बेसिक शिक्षा के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम की विसंगतियां दूर करने को भी कहा।

सीएम ने कहा कि अगर प्रारंभिक स्तर पर बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध हो तो उन्हें माध्यमिक व उच्चस्तर की शिक्षा में कोई कठिनाई नहीं होगी। मुख्यमंत्री शनिवार को अपने सरकारी आवास पर ‘मिशन प्रेरणा’ के संबंध में प्रस्तुतीकरण देखने के बाद बोल रहे थे। मिशन प्रेरणा के तहत 75 जिलों में 1.1 लाख से अधिक विद्यालय, साढ़े तीन लाख से अधिक शिक्षक और 1.2 करोड़ छात्र होंगे।

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